अनाथ बच्चों की मां, कैनवास पर आशा के रंग भरने वाली पेंटर

A mother to orphaned children, a painter who fills the canvas with the colors of hope

बीते दिनों जयपुर में जाना हुआ तो एक बेहद खास जगह को भी देखा। इस खास जगह में 127 निराश्रित और परित्यक्त बच्चे रहते हैं। इन्हें मां का प्रेम और दुलार मनन चतुर्वेदी देती हैं। वो इन बच्चों को छत के साथ शिक्षा की व्यवस्था भी मीडिया की सुर्खियों से दूर रहकर करती हैं। वो सुरमन संस्थान नामक की संस्था की फाउंडर हैं। मनन पेंटर भी हैं।

विवेक शुक्ला

जयपुर की गलियों में जहां कई बच्चे सड़कों पर भटकते नजर आते हैं, वहां एक महिला ने अपना घर, अपना जीवन और अपनी सारी ऊर्जा इन निराश्रितों को समर्पित कर दी है। मनन चतुर्वेदी इन बच्चों की मां बनकर उन्हें न सिर्फ छत, बल्कि शिक्षा, प्यार और एक बेहतर भविष्य दे रही हैं। मीडिया की सुर्खियों से दूर रहकर चल रही उनकी सुरमन संस्थान आज 127 बच्चों की जिंदगी का सहारा बन चुकी है। एक फैशन डिजाइनर से सामाजिक कार्यकर्ता और कलाकार बनने की उनकी कहानी प्रेरणा से भरी है।

मनन चतुर्वेदी बताती हैं कि एक बार सुबह वो अपनी कार के पास गईं तो देखा कि एक टायर के पास एक कुछ घंटे पैदा हुआ बच्चा लेटा हुआ था। उस बच्चों को देखते ही उन्होंने उसे उठाया और छाती से लगा लिया। उसे उन्होंने अपना बच्चा ही माना। इस घटना के बाद उनके जीवन की दिशा ही बदल गई।

उन्होंने 1998 में सुरमन संस्थान की नींव रखी। ‘सुरमन’ शब्द का अर्थ ही गहरा है-समता,, उम्मीद, राह, मन, आहान। जयपुर के वैशाली नगर में शुरू हुई यह संस्था आज एक परिवार का रूप ले चुकी है। यहां अनाथ, परित्यक्त, नशीले पदार्थों के शिकार, यौन शोषण से बचाए गए और समाज द्वारा ठुकराए गए बच्चे रहते हैं। मनन इन्हें सिर्फ आश्रय नहीं, बल्कि मां का प्यार देती हैं। बच्चे उन्हें ‘मां’ या ‘दीदी’ कहकर पुकारते हैं। वो अपने 750 से ज्यादा बच्चों को विभिन्न परिवारों के साथ जोड़ चुकी है।

मनन चतुर्वेदी का जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में हुआ। शुरू में उनका नाम ‘मुक्ति’ रखा गया था, लेकिन उनकी गहरी सोच और चिंतनशील स्वभाव को देखते हुए उन्हें ‘मनन’ नाम दिया गया। टैगोर पब्लिक स्कूल से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने महारानी कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई पूरी की। एक मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाली मनन का जीवन आरामदायक हो सकता था, लेकिन 19 साल की उम्र में एक अनाथ बच्ची की पीड़ा ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। मौत से जूझ रही उस बच्ची को देखकर मनन ने फैसला किया कि वे बच्चों के लिए कुछ करेंगी।

आरंभिक दिनों में चुनौतियां कम नहीं थीं। फंड की कमी के कारण मनन ने अपने गहने बेचे। उन्हें किराए के मकान से निकाल दिया गया। लेकिन हार नहीं मानी। उन्होंने बच्चों को पढ़ाई, स्वास्थ्य, कपड़े और पोषण की व्यवस्था की। वो कहती हैं कि उनके मिशन में उनके पत्रकार पति सुरेन्द्र चतुर्वेदी, तीनों बच्चों और बहुत सारे शुभचिंतकों ने भरपूर साथ दिया।

उनके संस्थान में बच्चे एक परिवार की तरह रहते हैं। सभी उम्र के बच्चे एक छत के नीचे। यहां शिक्षा पर विशेष जोर है। वो बताती हैं कि उनके कई बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर और आत्मनिर्भर नागरिक बन चुके हैं।

उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता सिर्फ संस्थान तक सीमित नहीं रही। वे राजस्थान राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की पूर्व अध्यक्ष रह चुकी हैं। बाल अधिकारों के मुद्दों जैसे बाल श्रम, तस्करी, शिक्षा का अधिकार और बाल संरक्षण पर वे लगातार आवाज उठाती रही हैं। शायद ही राजस्थान की कोई आला शख्यिसत हो जिसने सुरमन संस्थान का दौरा ना किया हो। सभी मनन ने के कार्यों की सराहना की है। उन्हें वीर सावरकर पुरस्कार, प्रो. यशवंतराव केलकर यूथ अवॉर्ड समेत कई सम्मान मिल चुके हैं।

मनन चतुर्वेदी सिर्फ सामाजिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि एक समर्पित पेंटर भी हैं। उन्होंने फैशन डिजाइनिंग का करियर छोड़कर कैनवास पर बच्चों की पीड़ा और उम्मीद को रंग दिया। उनका कहना है, “मैं कपड़ों को रंगने की बजाय बच्चों की आंखों में रंग भरना चाहती हूं।” वे यूनिफॉर्म में पेंटिंग करती हैं, जो उनके काम के प्रति सच्चाई दर्शाता है। उन्होंने 72 घंटे की नॉन-स्टॉप पेंटिंग का विश्व रिकॉर्ड बनाया है, जिससे संस्थान के लिए फंड जुटाया।

अब 30 जून और 1 जुलाई को दिल्ली के कनॉट प्लेस, पालिका बाजार गेट नंबर 6-7 पर वे 24 घंटे लगातार पेंटिंग करेंगी। 50 से अधिक पेंटिंग्स बनाकर बेची जाएंगी, जिनकी आय सुरमन संस्थान के बच्चों के भरण-पोषण, शिक्षा और अन्य परियोजनाओं पर खर्च होगी। यह इवेंट सिर्फ आर्ट शो नहीं, बल्कि बच्चों की आवाज बनने का माध्यम है। मनन कहती हैं, “कोई बच्चा सड़क पर या फैक्ट्री में नहीं, बल्कि स्कूल और प्यार भरे घर में होना चाहिए।”

सुरमन संस्थान की परियोजनाएं जैसे ‘पालना’ (आश्रय), ‘तपस्या’, ‘जीवन’, ‘कन्यादान’ और ‘कोशिश’ (महिलाओं के सशक्तिकरण) बच्चों और जरूरतमंदों के जीवन को छू रही हैं।

मनन चतुर्वेदी की शख्सियत बहुआयामी है। वे लेखिका, वक्ता और युवा मेंटर भी हैं। उनकी कहानी बताती है कि एक व्यक्ति कितना बड़ा बदलाव ला सकता है। मीडिया से दूर रहकर उन्होंने जो कार्य किया, वह निस्वार्थ सेवा का उदाहरण है। दिल्ली में उनका 24 घंटे का पेंटिंग मैराथन हजारों लोगों को प्रेरित भी करेगा।

आज जब समाज में बाल अधिकारों की चर्चा होती है, तो मनन चतुर्वेदी जैसे लोग प्रेरित करते हैं जो शब्दों से आगे बढ़कर काम करते हैं। उनकी ममता ने सैकड़ों बच्चों को नई जिंदगी दी है। सुरमन संस्थान न सिर्फ एक आश्रम है, बल्कि उम्मीद की किरण है। मनन की ब्रश से निकलने वाले हर रंग में एक बच्चे की मुस्कान छुपी है।