- भाजपा को दो और कांग्रेस को एक सीट मिली
- भाजपा के डॉ सतीश पूनियां और डॉ अलका गुर्जर पहली बार तथा कांग्रेस के नीरज डांगी दूसरी बार राज्यसभा पहुँचेंगे
एन जी भट्ट
राजस्थान की तीन राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव प्रक्रिया अपेक्षा के अनुरूप गुरुवार को निर्विरोध संपन्न हो गई। भारतीय जनता पार्टी के दो और कांग्रेस के एक उम्मीदवार के निर्विरोध निर्वाचित घोषित होने के साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि विधानसभा में दलों की मौजूदा संख्या-शक्ति का ही प्रतिबिंब राज्यसभा चुनाव में दिखाई देगा।
भाजपा की ओर से डॉ. सतीश पूनियां और डॉ. अलका गुर्जर तथा कांग्रेस की ओर से नीरज डांगी राज्यसभा पहुंचे हैं। इनमें पूनियां और अलका गुर्जर पहली बार उच्च सदन के सदस्य बने हैं, जबकि नीरज डांगी दूसरी बार राज्यसभा में राजस्थान का प्रतिनिधित्व करेंगे। भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा राज्यसभा चुनाव के लिए नियुक्त रिटर्निंग ऑफिसर राजस्थान विधानसभा के सचिव भारत भूषण शर्मा ने गुरुवार को तीन बजे नाम वापसी का निर्धारित समय निकलने के बाद तीनों प्रत्याशियों के निर्वाचित होने की घोषणा की। रिटर्निंग ऑफिसर शर्मा ने विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी डॉ. अलका सिंह और डॉ. सतीश पूनिया एवं इण्डियन नेशनल कांग्रेस के प्रत्याशी नीरज डांगी को निर्विरोध निर्वाचित घोषित करते हुए तीनों प्रत्याशियों को प्रमाण पत्र प्रदान किये। उस अवसर पर भाजपा और कांग्रेस के नेताओं के साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी मौजूद थे।
राज्यसभा चुनावों को अक्सर राजनीतिक दलों की संगठनात्मक शक्ति और रणनीतिक क्षमता की कसौटी माना जाता है। हालांकि इस बार राजस्थान में किसी प्रकार के राजनीतिक रोमांच, क्रॉस वोटिंग या संख्या जुटाने की कवायद देखने को नहीं मिली। भाजपा और कांग्रेस दोनों के पास अपने-अपने उम्मीदवारों को निर्वाचित कराने के लिए पर्याप्त संख्या बल था, इसलिए चुनाव निर्विरोध होना तय माना जा रहा था। नामांकन वापसी के बाद यही स्थिति औपचारिक रूप से स्पष्ट हो गई।
भाजपा के लिए डॉ. सतीश पूनियां का राज्यसभा पहुंचना विशेष राजनीतिक महत्व रखता है। राजस्थान भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे और हरियाणा में भाजपा के प्रभारी पूनियां लंबे समय से संगठन और भाजपा की वैचारिक राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं। पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजकर यह संदेश दिया है कि संगठन में लंबे समय तक कार्य करने वाले नेताओं को उचित सम्मान और अवसर दिया जाएगा। पूनियां का अनुभव, संगठनात्मक समझ और राजनीतिक सक्रियता उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भी उपयोगी बना सकती है।
दूसरी ओर भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में सचिव का दायित्व देख रहीं डॉ. अलका गुर्जर का राज्यसभा के लिए चयन भाजपा की सामाजिक और राजनीतिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। राजस्थान में गुर्जर समाज का प्रभाव कई विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों में निर्णायक माना जाता है। ऐसे में अलका गुर्जर को उच्च सदन भेजकर भाजपा ने सामाजिक प्रतिनिधित्व को मजबूत करने का प्रयास किया है। यह निर्णय पार्टी की उस रणनीति के अनुरूप है, जिसके तहत विभिन्न सामाजिक वर्गों को संगठन और सत्ता संरचना में उचित भागीदारी देने पर जोर दिया जा रहा है। साथ ही पार्टी ने महिला सशक्तिकरण और प्रतिनिधित्व का सन्देश भी दिया है।
इधर कांग्रेस के नीरज डांगी का दूसरी बार राज्यसभा पहुंचना भी महत्वपूर्ण है। डांगी ने अपने पहले कार्यकाल में संसद में राजस्थान के मुद्दों को उठाने के साथ-साथ कांग्रेस के पक्ष को प्रभावी ढंग से रखने का प्रयास किया। पार्टी नेतृत्व ने उन पर दोबारा विश्वास जताकर यह संकेत दिया है कि अनुभवी और सक्रिय सांसदों को प्राथमिकता दी जाएगी। कांग्रेस के लिए यह सीट केवल संसदीय प्रतिनिधित्व का विषय नहीं, बल्कि राज्य में अपने राजनीतिक आधार को बनाए रखने की रणनीति का भी हिस्सा है।
इन चुनाव परिणामों का एक बड़ा संदेश यह भी है कि राजस्थान की राजनीति में फिलहाल भाजपा का संगठनात्मक और विधायी प्रभुत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। विधानसभा में 118 सीटों के बहुमत और भाजपा विचारधारा के निर्दलीय विधायकों के समर्थन के आधार पर भाजपा को दो सीटें मिलना स्वाभाविक था। वहीं कांग्रेस ने भी अपने 67 विधायकों की संख्या के अनुरूप एक सीट सुरक्षित रखी। क्योंकि दोनों दलों के उम्मीदवारों के अलावा अन्य कोई प्रत्याशी मैदान में नहीं था इसलिए तीनों उम्मीदवारों के निर्विरोध निर्वाचन में किसी प्रकार की रुकावट नहीं रही। इस प्रकार राज्यसभा चुनाव ने किसी राजनीतिक समीकरण को बदला नहीं, बल्कि वर्तमान शक्ति संतुलन को ही पुष्ट किया है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो भाजपा ने डॉ सतीश पूनियां और डॉ. अलका गुर्जर नामों के माध्यम से संगठन, सामाजिक संतुलन और भविष्य की राजनीति को साधने का प्रयास किया है। डॉ सतीश पूनियां के रूप में संगठन को सम्मान और डॉ अलका गुर्जर के रूप में सामाजिक एवं महिला प्रतिनिधित्व का संदेश देने की कोशिश स्पष्ट दिखाई देती है। वहीं कांग्रेस ने नीरज डांगी को पुनः अवसर देकर उनके अनुभव और निरंतरता पर भरोसा जताया है। साथ ही दलित समाज को भी एक सन्देश दिया है ।
कुल मिलाकर राजस्थान की तीनों राज्यसभा सीटों पर निर्विरोध निर्वाचन ने यह साबित किया है कि जब राजनीतिक गणित स्पष्ट हो तो चुनावी मुकाबले की आवश्यकता नहीं रह जाती। भाजपा को दो और कांग्रेस को एक सीट मिलना विधानसभा की मौजूदा तस्वीर का स्वाभाविक परिणाम है। अब राज्यसभा में राजस्थान का प्रतिनिधित्व करने वाले ये तीनों सदस्य प्रदेश के विकास, जनहित और राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी भूमिका किस प्रकार निभाते हैं ? इस पर राजनीतिक पर्यवेक्षकों और जनता की नजर रहेगी।





