जितना सामर्थ्य उतना परिवार

As much family as possible

संजय स्वामी

लगभग दो दशक पूर्व सरकार ने आह्वान किया था कि जिन परिवारों की आय एक लाख से अधिक है तथा जिनको आवश्यकता नहीं वे अपने राशन कार्ड सरेंडर कर दें। देश में लाखों नागरिकों ने अपने उपभोक्ता राशन कार्ड वापस कर दिए। इसी प्रकार मोदी सरकार ने समर्थ नागरिकों से रसोई गैस सिलेंडर की सब्सिडी छोड़ने की अपील की हजारों लाखों लोगों ने गैस सिलेंडर पर मिलने वाली सरकारी रियायत(सब्सिडी) छोड़ दी।

भारत को स्वाधीन हुए 78 वर्ष हो चुके हैं। इस अगस्त में 79 होने जा रहे हैं। हम भारतीयों ने इतनी मेहनत की है कि आज भारत विश्व की पांचवी अर्थव्यवस्था बन चुका। तकनीकी, विज्ञान, शिक्षा, चिकित्सा, इन्फ्रास्ट्रक्चर आदि सभी क्षेत्रों में हमने विकास किया है। फिर भी विश्व बैंक की दृष्टि में भारत अल्प विकसित राष्ट्र है।स्वराज के अठहत्तर वर्षों के बाद भी विश्व के विकासशील देशों में ही गिना जाता है। वैश्विक निर्धनता सूचकांक में भारत छियांसठवे स्थान पर है।

स्वतंत्र भारत में पहली बार किसी राजनेता ने महत्वपूर्ण बिंदु पर सबका ध्यान आकर्षित किया है तथा मुखर रूप से कहा है कि सामर्थ्य नहीं तो परिवार क्यों बढ़ाते हो जनसंख्या वृद्धि क्यों कर रहे हैं ? निश्चित रूप से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी का यह कथन उनकी कथनी करनी की एकरूपता को सम्यक रूप से प्रस्तुत करता है। सभी को पता है कि वे सन्यासी हैं। उन्होंने स्वयं के परिवार के स्थान पर समाज, राष्ट्र को अपना परिवार माना है। विडंबना, आजादी के बाद से ही राजनीतिक महत्वाकांक्षा तथा तुष्टिकरण की राजनीति ने देश में समस्याओं को समाप्त करने के स्थान पर बढ़ावा ही दिया है।

जहां एक और देश ने तीव्र गति से विकास किया वहीं दूसरी ओर देश में एक वर्ग ने दिन दूनी रात चौगुनी जनसंख्या वृद्धि की। कुछ राजनीतिक दलों ने उन्हें अपना वोट बैंक बनाकर छोटी-मोटी रियायतें देकर कमजोर, पिछड़े, निर्धन बने रह कर सरकारी संपदा लूटने का भरपूर अवसर प्रदान किया। साथ-साथ राष्ट्र विरोधी शक्तियों ने विदेशी मदद से युवाओं को भटकाकर असामाजिक कृत्यों में संलग्न नाकारा, अपराधी उत्पन्न करने का प्रच्छन्न काम भी किया।

एक और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी देश के महानगरों को स्मार्ट सिटी बनाने में जुटे हैं तो दूसरी ओर दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों के चौराहों पर सैकड़ो परिवार वर्षों से जीवन यापन कर रहे हैं। वहीं उन्होंने विकसित भारत हेतु डेरा जमाया हुआ है। जैसे-जैसे देश विकास की ओर अग्रसर हो रहा है उसी परिमाप में देश में नकारा, भिखारी तथा मुफ्तखोरों की भीड़ भी बढ़ती जा रही है।

अब समय आ गया है कि सरकार को मुफ्त बिजली, पानी, राशन, झुग्गी के बदले मुफ्त मकान आदि मुफ्त की सुविधाओं का गंभीरता से विचार करना चाहिए। आखिर किसको देनी है कितनी देनी है कब तक देनी है? यह चिंतन व आंकलन ही विकसित भारत 2047 के स्वप्न को साकार करेगा।