उपहारों की कूटनीति से वैश्विक मंच पर भारतीय संस्कृति का उत्कर्ष

Gift Diplomacy Promotes Indian Culture on the Global Stage

विगत दिनों पाँच देशों की यात्रा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विश्व को दिया भारतीय आत्मीयता, संस्कृति,सभ्यता व “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश

विनोद कुमार सिंह “तकियावाला “

भारत केवल एक राष्ट्र नहीं,बल्कि हजारों वर्षों पुरानी संस्कृति, सभ्यता,दर्शन और मानवीय मूल्यों की जीवंत धारा है।यहाँ राजनीति केवल सत्ता संचालन का माध्यम नहीं रही,बल्कि समाज,संस्कृति और विश्व बंधुत्व की सम्पूर्ण चेतना से भी जुड़ी रही है।भारतीय परंपरा ने सदैव दुनिया को यह संदेश दिया कि संबंध शक्ति से नहीं,संवेदना से स्थायी बनते हैं।हमारी संस्कृति में अतिथि का स्वागत केवल औपचारिकता नहीं,बल्कि आत्मीयता और सम्मान का प्रतीक माना गया है।वर्तमान दौर मे जब वैश्विक राजनीति लगातार बदल रही है,दुनिया आर्थिक प्रतिस्पर्धा, युद्ध,सामरिक तनाव और वैचारिक संघर्षों के दौर से गुजर रही है,तब भारत “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना के साथ विश्व मंच पर एक संतुलित और मानवीय शक्ति के रूप में उभर रहा है। विगत दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हालिया पाँच देशों-संयुक्त अरब अमीरात,नीदरलैंड,स्वीडन,नॉर्वे और इटली – की यात्रा इसी बदलते भारत की नई तस्वीर बनकर सामने आई।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यह यात्रा केवल राजनीतिक बैठकों, व्यापारिक समझौतों या रणनीतिक साझेदारियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि भारतीय संस्कृति,लोक जीवन,कला,कृषि और सभ्यतागत मूल्यों की सुगंध को भी दुनिया तक पहुँचाने का माध्यम बनी।मोदी ने इस पूरे दौरे के दौरान विदेशी नेताओं को जो सप्रेम भारतीय उपहार भेंट किए,वे केवल स्मृति- चिन्ह नहीं थे,बल्कि भारत की आत्मा,उसकी विविधता और उसकी सांस्कृतिक चेतना के जीवंत प्रतीक थे।भारतीय कूटनीति का इतिहास सदैव सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ा रहा है।प्राचीन काल में जब भारत से व्यापारी समुद्री मार्गों से दक्षिण-पूर्व एशिया,अरब और यूरोप की ओर जाते थे,तब वे केवल वस्तुएँ ही नहीं ले जाते थे,बल्कि भारतीय संस्कृति,दर्शन,भाषा, संगीत,योग और जीवन शैली भी अपने साथ लेकर जाते थे।यही कारण है कि आज भी इंडोनेशिया, थाईलैंड,कंबोडिया,वियतनाम और कई अन्य देशों की सांस्कृतिक परंपराओं में भारतीय सभ्यता की झलक दिखाई देती है।मोदी ने इस सांस्कृतिक कूटनीति को एक नई दिशा दी है।उन्होंने यह समझा कि दुनिया केवल आर्थिक शक्ति से प्रभावित नहीं होती,बल्कि सांस्कृतिक पहचान और मानवीय जुड़ाव भी देशों के बीच स्थायी संबंध बनाते हैं।यही वजह है कि उनकी विदेश यात्राओं में भारतीय विरासत,परंपरा और सांस्कृतिक प्रतीकों की विशेष भूमिका दिखाई देती है।

इस पाँच देशों की यात्रा में सबसे अधिक चर्चा उन उपहारों की हुई, जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी अपने विदेशी मेहमानों और नेताओं के लिए स्वयं भारत से लेकर गए।सर्वविदित रहे कि इन उपहारों में भारत की पवित्र मिट्टी की खुशबू थी,अन्नदाता किसानों की मेहनत थी,बुनकरों की कला थी,लोक कलाकारों की कल्पना थी और भारतीय समाज की आत्मीयता थी।

संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति को मोदी ने गुजरात का प्रसिद्ध केसर आम और मेघालय का अनानास भेंट किया।सर्वविदित रहे कि भारतीय परंपरा में फल केवल स्वाद या उपभोग की वस्तु नहीं माने जाते,बल्कि समृद्धि,प्रेम और शुभकामनाओं के प्रतीक होते हैं। फलों का राजा आम का भारतीय साहित्य और लोक संस्कृति में विशेष स्थान रखता है।संस्कृत साहित्य से लेकर हिंदी कविता तक आम को ऋतु,प्रेम और मधुरता का प्रतीक माना गया है।भारतीय गाँवों में आम का पेड़ केवल फल देने वाला वृक्ष नहीं,बल्कि सामाजिक जीवन और पारिवारिक संस्कृति का हिस्सा होता है।

वही मेघालय का अनानास पूर्वोत्तर भारत की प्राकृतिक समृद्धि और जैव विविधता का प्रतीक है।लंबे समय तक पूर्वोत्तर भारत राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में कम दिखाई देता था,किंतु प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी विदेश नीति और विकास योजनाओं में पूर्वोत्तर को विशेष महत्व दिया है। उनके उपहारों में भी पूर्वोत्तर की झलक लगातार दिखाई देती है।यह केवल प्रतीकात्मक नहीं,बल्कि यह संदेश भी है कि भारत की असली शक्ति उसकी विविधता में निहित है।

नीदरलैंड की महारानी को भारतीय लोककला से सुसज्जित हस्तनिर्मित उपहार भेंट किए गए।भारतीय लोककलाएँ केवल रंगों और आकृतियों का संसार नहीं होतीं, बल्कि वे समाज की स्मृतियों, परंपराओं और सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति होती हैं। बिहार की मधुबनी,कलमकारी,पट्टचित्र, वारली और मिथिला जैसी लोककलाएँ भारतीय समाज की आत्मा को दर्शाती हैं।इनमें गाँवों का जीवन,प्रकृति से जुड़ाव,स्त्री संवेदना और लोक संस्कृति की सहजता दिखाई देती है।जब ऐसी कलाएँ विश्व नेताओं तक पहुँचती हैं, तो वे केवल सजावटी वस्तुएँ नहीं रहतीं,बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान का दर्पण बन जाती हैं। यह भारत की “सॉफ्ट पावर” का प्रभावी उदाहरण है। दुनिया के कई विकसित देशों ने अपनी सांस्कृतिक शक्ति को वैश्विक प्रभाव का माध्यम बनाया है।स्वीडन के प्रधानमंत्री को मणिपुर की प्रसिद्ध लोकटक चाय भेंट की गई। यह केवल चाय नहीं,बल्कि पूर्वोत्तर भारत की प्रकृति,श्रम और सांस्कृतिक जीवन का प्रतीक है। लोकटक झील मणिपुर की पहचान मानी जाती है और उसके आसपास की संस्कृति भारत की जैव विविधता और पारंपरिक जीवन शैली का अद्भुत उदाहरण है।भारतीय कूटनीति की यह खूबी रही है कि वह संबंधों में भावनात्मक जुड़ाव को भी महत्व देती है।दुनिया के कई देशों की राजनीति केवल हितों पर आधारित दिखाई देती है, लेकिन भारत ने हमेशा “मानवता” को अपने वैश्विक दृष्टिकोण का केंद्र बनाया है।यही कारण है कि भारत की विदेश नीति में “विश्व बंधुत्व” और “साझा विकास” जैसे विचार लगातार दिखाई देते हैं।इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को असम का प्रसिद्ध मूंगा रेशम स्टोल भेंट किया गया।मूंगा रेशम भारतीय बुनकरों की कला और परंपरा का अनुपम उदाहरण है।असम के बुनकरों की मेहनत और कौशल इस रेशम में दिखाई देते हैं।इसकी सुनहरी चमक केवल वस्त्र की सुंदरता नहीं,बल्कि भारतीय श्रम संस्कृति और लोकजीवन की गरिमा का प्रतीक है।इसके साथ प्रधानमंत्री मोदी द्वारा “मेलोडी” टॉफी भेंट करना कूटनीति के उस मानवीय और सहज पक्ष को सामने लाता है, जो संबंधों को औपचारिकता से ऊपर उठाकर आत्मीयता में बदल देता है।राजनीति और कूटनीति अक्सर गंभीर और औपचारिक दिखाई देती है,लेकिन भारतीय संस्कृति में हास्य,अपनापन और मानवीय गर्माहट को भी विशेष महत्व दिया जाता है।यही कारण है कि यह छोटा-सा उपहार भी दुनिया भर के मीडिया और सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बन गया।मोदी की विदेश यात्राओं की एक विशेषता यह भी रही है कि वे भारत की क्षेत्रीय विविधता को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करते हैं।कभी काशी की संस्कृति,कभी तमिल सभ्यता, कभी पूर्वोत्तर भारत की परंपराएँ और कभी राजस्थान या गुजरात की लोककलाएँ – हर क्षेत्र को वैश्विक पहचान दिलाने का प्रयास दिखाई देता है।इससे यह संदेश जाता है कि भारत केवल महानगरों का देश नहीं,बल्कि गाँवों,लोक परंपराओं, किसानों,बुनकरों और कारीगरों की भी जीवंत सभ्यता है।भारत की विदेश नीति में यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास पिछले कुछ वर्षों में और मजबूत हुआ है।पहले वैश्विक मंचों पर भारत अक्सर विकासशील देशों की चुनौतियों तक सीमित दिखाई देता था,लेकिन अब भारत अपनी सभ्यतागत पहचान के साथ आत्मविश्वास से खड़ा दिखाई देता है। जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान “ वन अर्थ , वन फैमली वन प्यूचर ” का संदेश इसी भारतीय दर्शन की आधुनिक अभिव्यक्ति था।

भारतीय संस्कृति का मूल भाव संघर्ष नहीं,सहअस्तित्व है।यहाँ प्रकृति को भी पूजनीय माना गया, नदियों को माँ कहा गया,वृक्षों को जीवन का आधार माना गया और संपूर्ण विश्व को परिवार की दृष्टि से देखने की परंपरा विकसित हुई। यही कारण है कि भारत जब दुनिया से संवाद करता है, तो उसके पीछे केवल सामरिक या आर्थिक सोच नहीं होती, बल्कि मानवीय मूल्यों की भी भूमिका होती है।मोदी की इस यात्रा के दौरान व्यापार,रक्षा, हरित ऊर्जा,तकनीकी सहयोग और निवेश से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण समझौते हुए।यूरोप के देशों के साथ भारत के आर्थिक संबंध और मजबूत हुए।खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा सुरक्षा और निवेश के क्षेत्र में नई संभावनाएँ बनीं।इन सबके बीच भारतीय संस्कृति की उपस्थिति लगातार दिखाई देती रही।

दरअसल,किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसकी सैन्य क्षमता या आर्थिक प्रगति में नहीं होती, .बल्कि उसकी सांस्कृतिक पहचान और सभ्यतागत आत्मविश्वास में भी निहित होती है। जापान आज तकनीक के साथ अपनी संस्कृति के लिए जाना जाता है।चीन अपनी सभ्यता और उत्पादन क्षमता दोनों का उपयोग करता है।यूरोप अपनी विरासत को वैश्विक पहचान का हिस्सा बनाता है।भारत भी अब अपनी सांस्कृतिक शक्ति को विश्व संबंधों का आधार बना रहा है।भारतीय उपहारों में यह संदेश स्पष्ट दिखाई देता है कि भारत आधुनिकता और परंपरा दोनों को साथ लेकर चलना चाहता है।एक ओर भारत डिजिटल तकनीक,अंतरिक्ष, रक्षा और आर्थिक विकास में आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर वह अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा हुआ भी दिखाई देता है।यही संतुलन भारत को दुनिया के अन्य देशों से अलग बनाता है।

नरेन्द्र मोदी की यह यात्रा इस बात का भी संकेत है कि आने वाले समय में भारत की विदेश नीति केवल राजनीतिक या आर्थिक दायरे तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि संस्कृति,सभ्यता,विरासत और लोकजीवन भी उसकी महत्वपूर्ण ताकत बनेंगे।भारतीय हस्तशिल्प,वस्त्र,कृषि उत्पाद, पारंपरिक खान-पान और लोककलाएँ अब वैश्विक मंच पर भारत की नई पहचान बनती जा रही हैं।यह केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन नहीं,बल्कि भारत के ग्रामीण अर्थतंत्र और स्थानीय कारीगरों को वैश्विक पहचान देने का माध्यम भी है।जब किसी विदेशी नेता को भारत का हस्तनिर्मित वस्त्र,लोककला या कृषि उत्पाद भेंट किया जाता है,तो उसके पीछे लाखों किसानों, बुनकरों और कारीगरों की मेहनत भी दुनिया तक पहुँचती है।यह “लोकल टू ग्लोबल” की उस सोच का हिस्सा है,जिसे भारत आज नई दिशा दे रहा है।

आज विश्व ऐसे दौर में खड़ी है जहाँ तकनीकी प्रगति तो तेज़ है,लेकिन मानवीय संवेदनाएँ कमजोर पड़ती दिखाई देती हैं।ऐसे समय में भारत अपनी सांस्कृतिक चेतना के माध्यम से दुनिया को संतुलन का संदेश दे रहा है।भारतीय दर्शन सदैव यह कहता आया है कि विकास केवल आर्थिक समृद्धि तक सीमित नहीं होना चाहिए,बल्कि उसमें मानवता, नैतिकता और सांस्कृतिक मूल्यों का भी समावेश होना चाहिए।

प्रधानमंत्री की पाँच देशों की यह यात्रा वस्तुतः उसी भारतीय दृष्टि का विस्तार थी।भारतीय उपहारों के माध्यम से दुनिया ने महसूस किया कि भारत केवल उभरती हुई आर्थिक शक्ति नहीं,बल्कि एक ऐसी सभ्यता भी है,जो संबंधों में आत्मीयता,सम्मान और संवेदनशीलता को सबसे ऊपर रखती है।जब भारत का केसर आम अरब की धरती तक पहुँचता है, मूंगा रेशम इटली के राजनयिक मंच पर दिखाई देता है,लोकटक चाय यूरोप की मेजों तक पहुँचती है और भारतीय लोककलाएँ विश्व नेताओं के हाथों तक जाती हैं,तब वास्तव में भारत अपनी संस्कृति के माध्यम से दुनिया के दिलों तक पहुँच रहा होता है।निस्संदेह, प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा भारत की विदेश नीति के उस नए अध्याय का संकेत है, जहाँ कूटनीति केवल समझौतों और दस्तावेजों में नहीं,बल्कि संस्कृति, संवेदना,सभ्यता और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की आत्मीय भावना में भी लिखी जा रही है।यही भारत की पहचान है,यही उसकी ताकत है और यही उसकी वैश्विक भूमिका का भविष्य भी।