भारतीयता की मिसाल पेश करती सद्भावपूर्ण कारगुज़ारियां

Harmonious deeds that exemplify the spirit of Indianness

निर्मल रानी

दुनिया में भारत की पहचान अनेकता में एकता रखने वाले देश के रूप में बनी हुई है। विविधता ही हमारे देश की एक ऐसी सबसे बड़ी विशेषता है जो पूरे विश्व को भारत की ओर आकर्षित करती है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक हमारा देश विविधताओं से भरा हुआ है। अनेक तरह की भाषाएं,अलग अलग रंग, अलग खानपान, विभिन्न प्रकार की पोशाकें,अनेक क़िस्म के धर्म,जातियां,रीति रिवाज,मान्यताएं तथा विश्वास आदि हमारे देश को एक रंग बिरंगे ख़ुशबूदार गुलदस्ते के रूप में दुनिया के सामने पेश करते हैं। परन्तु पिछले एक दशक में एक ऐसी साम्प्रदायिकतावादी विचारधारा ने सत्ता पर नियंत्रण हासिल कर लिया है जिसे शायद हमारे देश की यह विविधता व सर्वधर्म समभाव रास नहीं आता। यह विचारधारा पूरे देश को एक ही रंग में रंगना चाहती है। और अपने इस मक़सद को पूरा करने के लिये यह शक्तियां पूरे देश में सांप्रदायिकता व जातिवाद का ज़हर घोलने के प्रयास हो रहे हैं। दुःख की बात तो यह है कि इन दुष्प्रयासों में लगे लोग इंसानियत को भी भूल चुके हैं।

भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के मध्य तो जैसे नफ़रती एजेंडे पर तेज़ी से अमल करने की प्रतिस्पर्धा लगी हुई है। उत्तर प्रदेश,आसाम,राजस्थान,मध्यप्रदेश,बंगाल जैसे राज्यों में कौन मुख्यमंत्री कितनी मस्जिदें गिराता है कितनी दरगाहों व मदरसों पर बुलडोज़र चलता है,कितने मुसलमानों के घर ज़मींदोज़ करता है, इसे लेकर इनमें गोया होड़ लगी हुई है। सैकड़ों मस्जिदों व मदरसों को धराशायी करने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में ही अभी पिछले ही दिनों संभल के नख़ासा थाना क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम-कसेरुआ में स्थित ऐतिहासिक ‘मुस्तफ़ा क़ादरी मस्जिद’ को प्रशासन द्वारा दुर्भावनापूर्ण तरीक़े से बुलडोज़र से ध्वस्त कर दिया गया। जबकि बताया जा रहा है कि यह मस्जिद उत्तर प्रदेश सरकार के सरकारी गज़ट में बाक़ायदा वक़्फ़ जायदाद के तौर पर दर्ज है। सवाल यह उठता है कि जो इबादतगाह राज्य सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड्स में दर्ज हो, उसे रातों-रात एक सोची-समझी साज़िश के तहत ‘अवैध’ कैसे घोषित किया जा सकता है? इस तरह की कार्रवाई सीधे तौर पर मस्जिद को ध्वस्त करने की एक गहरी राजनीतिक साज़िश का हिस्सा है। साफ़ है कि भाजपा सरकार मुसलमानों को निशाना बनाते हुये दमनकारी, पक्षपातपूर्ण और अलोकतांत्रिक तरीक़े से अपनी ‘बुलडोजर नीति’ लागू कर रही है।

सत्ता संरक्षित व पोषित इस नफ़रत में कुछ लोग तो इतने अंधे हो गए हैं कि लंगर भंडारा लगाते समय किसी का धर्म पूछकर उस के हाथों से प्रशाद की थाली तक वापस छीने ले रहे हैं ? धर्म जाति देखकर सार्वजनिक प्याऊ से पानी पीने तक के लिये मना कर रहे हैं ? किसी दाढ़ी टोपी वाले को लंगर की थाली देकर उसके खाने से पहले ‘जयश्रीराम ‘ बोलने का दबाव डाला जा रहा है ? परन्तु हक़ीक़त में यह सब कुछ हो तो ज़रूर रहा है परन्तु इसके लिये सत्ता व संबंधित संगठनों को योजनाबद्ध तरीक़े से काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ रही है। इसके लिये सत्ता का दुरूपयोग भी हो रहा है और लाखों निठल्ले बेरोज़गार व अपराधी क़िस्म के लोग सत्ता का संरक्षण पाकर बेलगाम होकर धर्म व जाति विशेष के लोगों के साथ अमानवीय तरीक़ों से पेश आ रहे हैं। परन्तु जिस देश की रगों में राम रहीम कबीर रसखान जायसी नानक फ़रीद बुल्लेशाह चिश्ती औलिया जैसे महापुरुषों संतों व फ़क़ीरों के संस्कार सीख व शिक्षाएं प्रवाहित हो रही हों उस देश पर यह संगठित नफ़रती गिरोह लंबे समय तक अपनी एकरंगी नफ़रती विचारधारा हरगिज़ नहीं थोप सकते।

उदाहरणार्थ पिछले दिनों भारत सहित पूरे विश्व में करबला के शहीदों के नाम पर मुहर्रम संबंधी आयोजन किये गये। जगह जगह ताज़िये रखे गये। इस मौक़े पर पूरे देश में सैकड़ों जगह ऐसे दृश्य देखे गये जबकि हिन्दुओं ने ताज़ियादारी की और मुहर्रम मनाया। कुछ जगहें तो ऐसी भी थीं जहाँ एक भी मुसलमान नहीं रहते परन्तु दशकों से केवल हिन्दू समाज के लोग ही ताज़िया व अलम उठाते व मुहर्रम मनाते आ रहे हैं। सैकड़ों जगहों पर हिन्दू व मुसलमान बिना किसी भेदभाव के लंगर बांटते व ग़रीबों की मदद करते दिखाई दिये। बिहार में तो मुहर्रम को केवल धार्मिक आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि लोक एवं साझा सामाजिक संस्कृति के रूप में मनाया जाता है। अनेक हिन्दू बाहुल्य इलाक़ों में ताज़िया-जुलूस के साथ मजलिस, फ़ातिहा पढ़ने और कर्बला की घटना को याद करने की परंपरा है। बिहार के संदर्भ में तो यह भी उल्लेखनीय है कि मुहर्रम की परंपरा को कई जगह “वादा, वफ़ा और विरासत” के रूप में याद किया जाता है। यानी यह केवल शोक का आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव, परस्पर सम्मान और साझा इतिहास का प्रतीक बन चुका है। बिहार में ही मुहर्रम का एक ख़ास ऐतिहासिक पक्ष यह भी है कि कई गांवों में हिंदू समुदाय पीढ़ियों से ताज़िया, मातम और जुलूस की परंपरा निभाता आ रहा है। उदाहरण के तौर पर कटिहार के महमदिया हरिपुर गांव में पिछले सौ साल से अधिक समय से हिंदू लोग मुहर्रम मनाते आ रहे हैं, जिसे स्थानीय लोग पूर्वजों के वादे और गंगा-जमुनी तहज़ीब की विरासत से जोड़ते हैं।

इसी बीच राजस्थान में कई जगहों से साम्प्रदायिक एकता व सद्भाव की ऐसी मिसालें देखने को मिलीं जिसने यह साबित कर दिया कि सत्ता की तमाम कोशिशों के बावजूद देश में हिन्दू मुस्लिम एकता व भाईचारे को दुनिया की कोई भी ताक़त मिटा नहीं सकती। ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों राजस्थान सरकार के निर्देश पर राज्य के बाड़मेर व जैसलमेर जैसे सीमावर्ती ज़िलों में अनेक मस्जिदों को बुलडोज़र से ध्वस्त कर दिया गया। ज़ाहिर है इससे मुस्लिम समाज में भय व शोक व्याप्त हो गया। परन्तु इसके विरोध में भारी संख्या में स्थानीय हिन्दू समाज के पुरुष महिलाएं बुज़ुर्ग व युवा सभी ने इकट्ठे होकर सर्व धर्म शांति मार्च निकले व सभाएं आयोजित कीं। राजस्थान के हिन्दू समाज ने न केवल इन धर्मस्थलों के ध्वस्तीकरण का विरोध किया बल्कि मुसलमानों के साथ अपनी एकता व एकजुटता का भी प्रदर्शन किया। कई जगह राष्ट्रपति को संबोधित ज्ञापन स्थानीय ज़िला कलेक्टर को सौंपे गए जिसमें सरकार की इस धर्मस्थल ध्वस्तीकरण कार्रवाई का विरोध किया गया। लोगों ने इसे धार्मिक आस्था और सामाजिक सौहार्द से जुड़ा मुद्दा मानते हुए शांति, भाईचारे को क़ायम रखने और ध्वस्तीकरण की इस कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाने की मांग की। निश्चित रूप से नफ़रत फैलाने के अफ़सोसनाक राजकीय प्रयासों के बीच प्रेम,शांति व सद्भाव की ऐसी कारगुज़ारियां भारतीयता की सच्ची मिसाल पेश करती हैं।