संजय सक्सेना
अयोध्या के रामलला मंदिर में चढ़ावे और दान की राशि में कथित गड़बड़ी का मामला अब केवल आस्था और आपराधिक जांच का विषय नहीं रह गया, बल्कि यह अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सबसे बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में उभरता दिख जरूर रहा है, लेकिन ऐसा हो पायेगा, यह समय बतायेगा। 07 जून को समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मामले को सार्वजनिक करते हुए योगी सरकार पर सीधा हमला बोला था। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा था कि अयोध्या में मंदिर के चढ़ावे को लेकर जो जानकारी सामने आई है, वह गंभीर चिंता का विषय है। इसके साथ ही यह मामला राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया और सत्ता पक्ष व विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तेजी दिखाते हुए 13 जून को राम मंदिर ट्रस्ट की सिफारिश पर तीन सदस्यों वाली एसआईटी का गठन कर दिया। जांच टीम ने मंदिर परिसर पहुंचकर सीसीटीवी फुटेज, बैंक रिकॉर्ड और दान गिनने वाले कर्मचारियों से पूछताछ शुरू की। शुरुआती जांच में ही चौंकाने वाले खुलासे सामने आए। करीब 2 करोड़ रुपये नकद, एक कार और तीन आईफोन बरामद होने का दावा किया गया, जबकि कुछ कर्मचारियों से पूछताछ जारी रही। बाद में एसआईटी की 20 पन्नों की रिपोर्ट में और भी गंभीर तथ्य सामने आए। रिपोर्ट के मुताबिक, सीसीटीवी फुटेज में चढ़ावा चोरी की 70 घटनाएं दर्ज हुईं और यह कथित रैकेट पिछले दो से तीन वर्षों से सक्रिय था। जांच में यह भी सामने आया कि मुख्य आरोपी टिन्नू यादव के पास बिना किसी आदेश के हुंडियों की चाबियां मौजूद थीं, और पूछताछ में कुछ सरकारी बैंक कर्मचारियों की संलिप्तता के संकेत भी मिले।
रिपोर्ट आने के बाद योगी सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 26 जून को मामले में एफआईआर दर्ज कर आठ आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। इस घटनाक्रम के दबाव में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्ट सदस्य अनिल मिश्रा ने अपने-अपने पदों से इस्तीफा दे दिया। मुख्यमंत्री योगी ने इस पूरे प्रकरण पर सख्त लहजे में कहा, एसआईटी रिपोर्ट आते ही कार्रवाई शुरू हो गई। हम सच्चाई और झूठ को अलग-अलग कर देंगे। सनातन धर्म के विश्वास के साथ छेड़छाड़ करने वालों को परिणाम भुगतना पड़ेगा। किसी को भी छूट नहीं दी जाएगी। कई सार्वजनिक मंचों से उन्होंने बार-बार यही संदेश दोहराया कि एसआईटी की रिपोर्ट आते ही कार्रवाई शुरू हो गई है और जन आस्था के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, दूध का दूध और पानी का पानी होगा। लेकिन सियासी पिच पर यह मामला अब सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा। अखिलेश यादव के आरोपों के बाद योगी और भाजपा ने भी पलटवार में देर नहीं की। सीएम योगी ने याद दिलाया कि सपा सरकार के दौरान ही थानों और जेलों में जन्माष्टमी मनाने पर रोक लगाई गई थी और कांवड़ यात्रा प्रतिबंधित थी। साथ ही कारसेवकों पर गोली चलाने के अतीत को दोहराकर बीजेपी ने सपा को बैकफुट पर धकेलने की कोशिश की। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह त्वरित और कठोर कार्रवाई अखिलेश के उस आरोप की धार कुंद करने की रणनीति है कि सरकार भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रही है। देवरिया की एक सभा में सीएम योगी ने और तीखा रुख अपनाते हुए कहा, अयोध्या पर आक्षेप मत करो, प्रभु श्रीराम की मर्यादा का पालन करना सीखो।
इस पूरे विवाद में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और असदुद्दीन ओवैसी सहित लगभग सभी विपक्षी दल सक्रिय हो गए हैं। आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह ने भी योगी सरकार को घेरते हुए कहा था कि राम मंदिर जैसे आस्था के केंद्र में दान राशि की कथित चोरी बेहद गंभीर मामला है और इसकी निष्पक्ष व पारदर्शी जांच होनी चाहिए, दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। दिल्ली से अरविंद केजरीवाल भी अयोध्या पहुंचे, जिस पर सीएम योगी ने तीखा तंज कसते हुए भाजपा की डबल इंजन सरकार की तुलना आम आदमी पार्टी शासन से कर डाली। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे पर हर दल की रणनीति अलग-अलग समीकरणों से जुड़ी है। सपा के लिए यह मामला सॉफ्ट हिन्दुत्व की छवि गढ़ने का मौका है, ताकि हिन्दू मतदाताओं के एक हिस्से को यह संदेश दिया जा सके कि पार्टी आस्था के मुद्दों पर उदासीन नहीं है। लेकिन इसका एक जोखिम भरा पहलू भी है कि अगर यह रणनीति ज्यादा आक्रामक हुई, तो पार्टी के परंपरागत मुस्लिम वोट बैंक में भ्रम की स्थिति बन सकती है, खासकर तब, जब असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी भी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश में जुटी है। कांग्रेस के लिए यह मामला भाजपा शासित राज्य में भ्रष्टाचार के आरोप को उठाने और राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में बने रहने का एक अवसर भर है, जिसका सीधा चुनावी आधार उत्तर प्रदेश में उतना मजबूत नहीं माना जाता। दूसरी ओर, भाजपा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की रणनीति साफ नजर आती है। जांच में तेजी दिखाकर और कड़ी कार्रवाई करके यह संदेश देना कि सरकार आस्था के मुद्दों पर किसी को बख्शने वाली नहीं है, और साथ ही विपक्षी दलों के पुराने इतिहास को उभारकर बहस की दिशा मोड़ना। मथुरा और लोहिया जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल करके बीजेपी ने मंडल के साथ कमंडल की राजनीति को भी साधना शुरू कर दिया है। कुल मिलाकर, अयोध्या का यह प्रकरण अब केवल एक आपराधिक जांच नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आस्था, पहचान और जातीय समीकरणों की एक बड़ी सियासी लड़ाई का केंद्र बिंदु बन चुका है, जिसका असर आने वाले महीनों में और गहराता दिख सकता है।





