सुशासन 2.0 के दौर में जन शिकायतों की सुनवाई

Hearing of public grievances in the era of Good Governance 2.0

प्रेम प्रकाश

सुशासन की दरकार के साथ प्रशासनिक जवाबदेही और व्यवस्थागत चुस्ती का जो दौर देश में तीन दशक पहले शुरू हुआ था, वह अब डिजिटल दौर में पहुंच चुका है। इसलिए डिजिटल टूल अपडेशन की शैली में इसे सुशासन 2.0 कहा जा रहा है। सुशासन 2.0 के प्रयोग में आने की वजह यह है आज सरकारों पर इस बात का दबाव काफी बढ़ गया है कि वह जन शिकायतों को कितनी तीव्रता और पारदर्शिता के साथ सुनती है। इसी का नतीजा है कि पिछले एक दशक में डिजिटल तकनीक ने देश में लोक शिकायत निवारण की पूरी व्यवस्था बदल दी है। केंद्र सरकार के केंद्रीय लोक शिकायत निवारण पोर्टल पर लाखों शिकायतें हर वर्ष दर्ज हो रही हैं। प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग का डैशबोर्ड बताता है कि 2024-25 के दौरान केंद्र के स्तर पर 12.7 लाख से अधिक और राज्यों के स्तर पर 7.5 लाख से अधिक शिकायतों का निपटान किया जा चुका है।

इस दौरान राज्यों ने अलग से अपने लोक शिकायत निवारण मॉडल विकसित किए हैं। उत्तर प्रदेश का जनसुनवाई-समाधान पोर्टल, मध्य प्रदेश की सीएम हेल्पलाइन, राजस्थान का जनसुनवाई पोर्टल, केरल की ई-डिस्ट्रिक्ट व्यवस्था और आंध्र प्रदेश की स्पंदना जैसी प्रणालियां देश में डिजिटल गवर्नेंस के महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर उभरी हैं। इसी क्रम में अब बिहार सरकार ने सहयोग पोर्टल के जरिए इन सभी मॉडलों से आगे बढ़कर एक अधिक एकीकृत और जवाबदेह व्यवस्था तैयार की है।

बात करें राज्यों के लोक शिकायत मॉडलों की तो उत्तर प्रदेश का समाधान पोर्टल देश के सबसे सक्रिय शिकायत प्लेटफॉर्मों में शुमार है। भारत सरकार के प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग की दिसंबर 2024 रिपोर्ट के अनुसार केवल एक महीने में उत्तर प्रदेश से 22,637 शिकायतें दर्ज हुईं, जो देश में सर्वाधिक थी। इसकी कार्यप्रणाली पूरी तरह डिजिटल मॉनिटरिंग पर आधारित है। शिकायत दर्ज होते ही वह संबंधित विभाग तक पहुंच जाती है और समाधान की समय-सीमा तय हो जाती है। जिलों और विभागों की रैंकिंग भी शिकायत निस्तारण के आधार पर तय की जाती है। हाल के वर्षों में कई जिलों ने 80 प्रतिशत से अधिक संतुष्टि दर हासिल की है।

वैसे यूपी के इस मॉडल की कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं। कई बार अधिकारियों पर शिकायतें जल्द बंद करने का दबाव इतना अधिक होता है कि वास्तविक समाधान प्रभावित होता है। इसका ही नतीजा है कि नोएडा में खराब निस्तारण पर अधिकारियों के वेतन रोकने तक की कार्रवाई करनी पड़ी। सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर भी नागरिकों ने कई बार शिकायत की है कि कुछ मामलों में केवल औपचारिक जवाब देकर शिकायतें बंद कर दी जाती हैं। फिर भी यह सच है कि यूपी ने बड़े पैमाने पर डिजिटल शिकायत प्रबंधन की एक मजबूत संरचना खड़ी की है।

मध्य प्रदेश की सीएम हेल्पलाइन 181 को भी देश के चर्चित नागरिक फीडबैक आधारित मॉडलों में माना जाता है। इसकी खासियत है कि शिकायत बंद करने से पहले शिकायतकर्ता से पूछा जाता है कि वह समाधान से संतुष्ट है या नहीं। यदि शिकायतकर्ता असंतुष्ट है, तो मामला दोबारा खोला जा सकता है। इस मॉडल ने प्रशासनिक जवाबदेही को मजबूत किया है। बिजली, स्वास्थ्य, पंचायत और राजस्व विभागों से जुड़ी शिकायतें इसमें सबसे अधिक आती रही हैं। अलबत्ता शिकायतों की बड़ी संख्या और बहुस्तरीय प्रक्रिया के कारण समाधान में देरी भी इसकी प्रमुख चुनौती रही है।

राजस्थान सरकार का जनसुनवाई पोर्टल पंचायत स्तर तक पहुंच बनाने के लिए जाना जाता है। राज्य सरकार ने इसे ई-मित्र केंद्रों से जोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में सुलभ बनाने का प्रयास किया। यहां केवल शिकायतें ही नहीं, बल्कि सुझाव और जनहित से जुड़े आवेदन भी दिए जा सकते हैं। जिला कलेक्टर स्तर पर इसकी नियमित समीक्षा होती है। हालंकि विभागीय समन्वय की कमी और इंटरनेट पहुंच की समस्या कई बार इसके प्रभाव को सीमित कर देती है। केरल का मॉडल तकनीकी रूप से काफी सशक्त है। वहां ई-डिस्ट्रिक्ट और स्थानीय निकाय आधारित डिजिटल सेवाओं के जरिए शिकायत और सेवा वितरण को एकीकृत किया गया है। आंध्र प्रदेश की स्पंदना और तेलंगाना की प्रजावाणी प्रणाली ने शिकायत निवारण को नियमित प्रशासनिक समीक्षा से जोड़ा है। इन राज्यों ने यह दिखाया कि तकनीक तभी सफल होती है जब उसके साथ प्रशासनिक अनुशासन और राजनीतिक इच्छाशक्ति जुड़ी हो।

इन सभी मॉडलों के बीच बिहार का सहयोग पोर्टल इसलिए अलग दिखाई देता है क्योंकि यह केवल शिकायत दर्ज करने का मंच नहीं, बल्कि एक व्यापक गुड गवर्नेंस इकोसिस्टम के रूप में विकसित किया गया है। बिहार पहले ही लोक सेवा अधिकार अधिनियम (आरटीपीएस), जनता दरबार और ऑनलाइन सेवा वितरण जैसे प्रयोगों के जरिए प्रशासनिक सुधार की दिशा में कार्य करता रहा है। सहयोग पोर्टल उसी प्रक्रिया का अगला और अधिक उन्नत चरण है। इस पोर्टल की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बहुस्तरीय जवाबदेही प्रणाली है। शिकायत दर्ज होते ही उसकी डिजिटल ट्रैकिंग शुरू और प्रत्येक स्तर पर अधिकारी की जिम्मेदारी तय हो जाती है। यदि तय समय-सीमा में समाधान नहीं होता तो मामला स्वतः उच्च स्तर तक पहुंच सकता है। यह व्यवस्था कई अन्य राज्यों की तुलना में अधिक मजबूत एस्केलेशन मैकेनिज्म प्रदान करती है। बिहार सरकार इसे विभागीय डेटा, प्रदर्शन मूल्यांकन और प्रशासनिक मॉनिटरिंग से भी जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रही है। यह भी कि ज्यादातर राज्यों में शिकायत पोर्टलों का उपयोग अपेक्षाकृत शहरी और तकनीकी रूप से सक्षम वर्ग तक सीमित रहा है, जबकि बिहार का प्रयास इसे गांवों तक ले जाने का है।

राज्य और केंद्र के स्तर पर किए गए ऐसे तमाम प्रयासों का एक अनुभव यह भी रहा है कि किसी भी शिकायत निवारण प्रणाली की सफलता केवल तकनीक पर नहीं, बल्कि उसकी निरंतर मॉनिटरिंग और प्रशासनिक प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है। केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण एवं निगरानी प्रणाली की 2025 रिपोर्ट के अनुसार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लंबित शिकायतों की संख्या अभी भी लगभग दो लाख के आसपास बनी हुई है।

इन तमाम प्रयासों और अनुभवों के बीच जो बात अहम है, वह यह कि सत्ता और राजनीति की आपाधापी के बीच भारत में लोक शिकायत निवारण जिस तरह सुशासन का केंद्रीय आधार बना है, वह प्रशंसनीय है। इसका ही नतीजा है कि इस क्षेत्र में आगे कदम बढ़ाते हुए जहां उत्तर प्रदेश ने बड़े पैमाने की डिजिटल मॉनिटरिंग दिखाई और मध्य प्रदेश ने नागरिक फीडबैक को प्राथमिकता दी, वहीं केरल ने विकेंद्रीकरण का सफल मॉडल बनाया और राजस्थान ने पंचायत स्तर तक पहुंच सुनिश्चित करने की कोशिश की है। इस कड़ी में बिहार के सहयोग पोर्टल ने तमाम अनुभवों को समाहित करते हुए अधिक एकीकृत, डेटा आधारित और जवाबदेह मॉडल बनने की संभावनाओं पर खरा उतरने के सुनिश्चय के साथ लांच हुआ है। कह सकते हैं कि सुशासन 2.0 जिस तरह जिम्मेदार और पारदर्शी व्यवस्था का पर्याय बनता रहा है, वह लोक कल्याणकारी सरोकारों पर खरा उतरने की भारतीय लोकतंत्र की मूल प्रतिबद्धता को दिखाता है।