गृहिणी: नौकरानी नहीं, घर की मालकिन

Homemaker: Not a maid, but the mistress of the house

वन्दना शर्मा

नारी के जीवन में तो बचपन से ही संघर्ष होता है। पहले पढ़ाई, समाज से लड़ो अपनी पहचान बनाओ।लड़कों को बचपन से ही सिखाया जाता है कि वो खास हैं। उन्हें लाड़-प्यार, आजादी की आदत डाली जाती है।

पर लड़की? उसे सिखाते हैं – समझौता करना, चुप रहना, सबको खुश रखना। अच्छी इज्जत, अच्छी नौकरी के फैसले भी अक्सर उसके नहीं होते।

आज समाज बड़ी उदारता दिखाता है। कहता है – ‘गृहिणी का काम भी काम है’। कोर्ट ने भी माना कि घर संभालने वाली औरत की कीमत कम से कम 30,000 रुपए महीना है।

रुको। यहीं तो गलती हो रही है।

30,000 रुपए महीना देकर क्या हम गृहिणी पर अहसान कर रहे हैं? क्या वो नौकरानी है जिसे ‘तनख्वाह’ दे दी तो हिसाब बराबर?

नहीं। वो नौकरानी नहीं है। वो घर की मालकिन है।

और मालकिन को सैलरी नहीं दी जाती। मालकिन सैलरी देती है।

सोचो, एक कंपनी का CEO क्या करता है? कंपनी की पूरी कमाई पहले उसके पास आती है। फिर वो तय करता है – कितना स्टाफ की सैलरी में जाएगा, कितना कच्चे माल में, कितना मालिक की जेब में।

गृहिणी भी घर की CEO है।

तो इंसाफ ये नहीं कि पति 1 लाख कमाए और पत्नी को घर खर्च के लिए 30,000 पकड़ा दे। इंसाफ ये है कि पति की पूरी 1 लाख की सैलरी पत्नी के हाथ में आए। फिर वो घर की वित्त मंत्री बनकर बजट बनाए। राशन, बिल, बच्चों की फीस, दवाई, सेविंग – सब वो तय करे।

और हाँ, उसके बाद पति को ऑफिस की चाय, पेट्रोल, दोस्तों के साथ मूवी के लिए पैसे चाहिए? वो अपनी मालकिन से माँगे। शर्म नहीं, हक से। क्योंकि कमाने वाला बड़ा नहीं होता, घर चलाने वाला बड़ा होता है।

यह सच है कि एक गृहिणी बिना छुट्टी, बिना वेतन, बिना ओवरटाइम के 24 घंटे सेवा करती है। रातों की नींद खराब करके बच्चों को पालती है। अपने शरीर को तोड़कर बच्चों को जन्म देती है। पति की टेंशन में उसकी बीमारी में रात दिन एक कर देती है उसकी सेवा करती है और एक बच्चे की तरह उसकी देखभाल करती है। अपने सपनों को मारकर परिवार को प्राथमिकता देती है।

घर की दीवारों को सजाकर, बच्चों को संस्कार देकर वो एक अनजानी पीढ़ी के लिए, देश के भविष्य के लिए अपनी जिंदगी खर्च कर देती है। उसकी इस कुर्बानी की कीमत 30,000 क्या, 3 लाख भी नहीं हो सकती। क्योंकि वो अनमोल है।

कामकाजी महिला की जिंदगी भी आसान नहीं। उसे घर और बाहर, दोहरा तनाव झेलना पड़ता है। क्योंकि हमारे समाज की संरचना ही ऐसी है जहाँ परिवार सँभालना, घर के काम काज महिलाओं का कर्तव्य समझा जाता है। कुछ घरों में पुरुष पानी भी खुद से लेकर नहीं पीते, चाहे बीवी कामकाजी हो या गृहिणी।

पर आज के समय में सभी पुरुष एक जैसे नहीं होते। कुछ तो अपनी पत्नी का पूरा सम्मान करते हैं। घर के कार्यों में सहायता करते हैं और पत्नी की सोच को प्राथमिकता देते हैं।

एक लड़के की जिंदगी भी आसान कहाँ होती है। शादी के बाद वो भी दो घरों को खुश करने में पिसता है। अपनी सारी कमाई पत्नी और बच्चों पर खर्च करता है। खुद के शौक मारकर परिवार को प्राथमिकता देता है।

परिवार नामक गाड़ी पुरुष और महिला दोनों के सहयोग से चलती है। पर गाड़ी का स्टीयरिंग किसके हाथ में है? जो घर चलाता है, उसके हाथ में। और वो गृहिणी है।

संघर्ष का नाम ही जिन्दगी है। सिर्फ मुर्दों को ही कष्ट नहीं होता। सुख-दुख लगे रहते हैं। बस अपनी प्राथमिकता पता होनी चाहिए।

मैंने कुछ महिलाओं को अमीर घरों में भी दुखी देखा है। सोने-चाँदी से सजी, करोड़ों की मालकिन होते हुए भी आँसू बहाते देखा है। क्योंकि समस्या पैसे की नहीं, सम्मान की है।

तो बहनों, अपने कार्य को पैसों से मत तौलो। पर अपना हक जरूर पहचानो। अपनी आत्मा को पहचानो, अपनी क्षमताओं को पहचानो। खुद से प्यार करना भी जरूरी है। अपने सम्मान के लिए आवाज उठाना भी जरूरी है।

एक स्त्री क्या चाहती है? सिर्फ स्वतंत्रता – अपनी मर्जी से जीने की। अपने फैसले स्वयं करने की। अपना आसमान खुद ढूंढने की। आजादी के नाम पर घरों में क्लेश करने की जरूरत नहीं है। आज के पुरुष समझदार हैं। एक-दूसरे का साथी बनिए। एक दूसरे पर हावी न हो।

प्यारी बहनों, आप घर की नौकरानी नहीं हो जिसे 30,000 की सैलरी सुनकर खुश हो जाना है।

आप घर की मालकिन हो। वित्त मंत्री हो। CEO हो।

पूरी सैलरी आपके हाथ में होनी चाहिए। आप तय करो कि घर कैसे चलेगा। पति कमाकर लाए, आप चलाकर दिखाओ।

महत्वपूर्ण है खुद को जानो, न कि परिवार तोड़ने में भूमिका निभाओ।

तुम दुर्गा भी, तुम लक्ष्मी भी। अपनी शक्ति को जानो। ना किसी पर अन्याय करो, ना किसी का अन्याय सहो।

और पुरुषों से बस एक विनती है – अगली बार सैलरी आए तो पूरी बीवी के हाथ में देना। और फिर उससे 500 रुपए माँगकर देखना चाय के लिए। जिस दिन तुम बिना शर्म माँग लोगे, और वो बिना ताना दिए दे देगी – समझ लेना तुम्हारा घर स्वर्ग बन गया।

क्योंकि मालकिन वो नहीं जो कमाती है, मालकिन वो है जिसके बिना घर नहीं चलता।