क्या सोने में फिर लौटेगा 1970 के दशक जैसा महाबुल रन?

Will gold see a massive bull run like the one in the 1970s?

के. पी. मलिक

सोना सदियों से केवल एक धातु नहीं, बल्कि आर्थिक अनिश्चितता के समय निवेशकों का सबसे भरोसेमंद आश्रय माना जाता रहा है। जब दुनिया युद्ध, महंगाई, मंदी या वित्तीय संकटों से घिरती है, तब निवेशकों का रुझान सोने की ओर बढ़ जाता है। आज भी वैश्विक परिस्थितियां कुछ ऐसी ही दिखाई देती हैं। ईरान-इज़राइल तनाव, भू-राजनीतिक अस्थिरता, बढ़ती सरकारी देनदारियां, मुद्रास्फीति की चिंताएं और वैश्विक अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार के बीच यह सवाल फिर उठ रहा है कि क्या सोना 1970 के दशक जैसी ऐतिहासिक तेजी दोहरा सकता है?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में सोना पहले ही असाधारण प्रदर्शन कर चुका है। भारत में जहां 2023 के आसपास सोना लगभग 63 हजार रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर था, वहीं 2026 तक यह करीब 1.8 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गया। यानी तीन वर्षों में लगभग तीन गुना वृद्धि। लेकिन हाल के महीनों में, जब मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ा और वैश्विक अनिश्चितताएं बनी रहीं, तब भी सोना अपने उच्चतम स्तर से लगभग 20 प्रतिशत तक फिसल गया। इससे निवेशकों के मन में यह दुविधा पैदा हो गई है कि क्या यह केवल अस्थायी गिरावट है या फिर बड़ी कमजोरी की शुरुआत?

1970 का दशक सोने के इतिहास का सबसे चर्चित दौर माना जाता है। उस समय अमेरिकी डॉलर और सोने के बीच का स्थायी संबंध टूट गया था। 1971 में ब्रेटन वुड्स व्यवस्था समाप्त हुई और डॉलर पूरी तरह फिएट मुद्रा बन गया। इसके बाद तेल संकट, ऊंची महंगाई और आर्थिक अस्थिरता ने निवेशकों को सोने की ओर धकेला। परिणामस्वरूप सोने की कीमत लगभग 35 डॉलर प्रति औंस से बढ़कर 850 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई। यह वृद्धि केवल एक बुल रन नहीं थी, बल्कि आधुनिक वित्तीय इतिहास की सबसे बड़ी कमोडिटी रैलियों में से एक थी।

आज कई विश्लेषक वर्तमान परिस्थितियों की तुलना उसी दौर से कर रहे हैं। अमेरिका सहित कई देशों पर रिकॉर्ड स्तर का कर्ज है। केंद्रीय बैंक लगातार सोना खरीद रहे हैं। डॉलर के विकल्प खोजने की चर्चाएं बढ़ रही हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से अनेक देशों ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने का हिस्सा बढ़ाया है। चीन, भारत और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंक भी लगातार सोना खरीद रहे हैं। यह मांग कीमतों को दीर्घकालिक समर्थन प्रदान करती है।

लेकिन इतिहास का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। 1970 के दशक की ऐतिहासिक तेजी के बाद सोने ने लंबा और दर्दनाक सुधार देखा था। 1980 में शिखर पर पहुंचने के बाद अगले दो दशकों तक सोने की कीमतें लगभग स्थिर रहीं और कई निवेशकों को वास्तविक रिटर्न भी नहीं मिला। यही वह चेतावनी है जिसे विशेषज्ञ आज बार-बार दोहरा रहे हैं। किसी भी परिसंपत्ति में लगातार तेज वृद्धि के बाद सुधार या ठहराव स्वाभाविक होता है।

वर्तमान समय में सोने की कीमतों को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारक अमेरिकी ब्याज दरें हैं। जब ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तब निवेशकों को बॉन्ड और अन्य निश्चित आय वाले साधनों में बेहतर रिटर्न मिलता है। ऐसे में सोने का आकर्षण कुछ कम हो जाता है क्योंकि सोना कोई ब्याज या लाभांश नहीं देता। यदि अमेरिकी फेडरल रिजर्व आने वाले समय में ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा बनाए रखता है, तो सोने पर दबाव बना रह सकता है। दूसरी ओर यदि आर्थिक मंदी की आशंका बढ़ती है और दरों में कटौती शुरू होती है, तो सोना फिर मजबूत उछाल दिखा सकता है।

ईरान-इज़राइल तनाव भी सोने की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण तत्व है। सामान्यतः युद्ध और भू-राजनीतिक संकट सोने के लिए सकारात्मक माने जाते हैं। लेकिन बाजार केवल घटनाओं पर नहीं, बल्कि उनकी संभावित अवधि और प्रभाव पर प्रतिक्रिया देता है। यदि तनाव सीमित रहता है तो उसका प्रभाव अस्थायी हो सकता है। वहीं यदि संकट व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष में बदलता है और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होती है, तो सोना फिर से सुरक्षित निवेश के रूप में बड़ी मांग आकर्षित कर सकता है।

भारत के संदर्भ में स्थिति थोड़ी अलग है। भारतीय निवेशकों के लिए सोने की कीमत केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार से नहीं, बल्कि रुपये की विनिमय दर से भी प्रभावित होती है। यदि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतें स्थिर रहने के बावजूद भारत में सोना महंगा हो सकता है। इसलिए भारतीय निवेशकों को केवल वैश्विक कीमतों पर नहीं, बल्कि मुद्रा विनिमय दरों पर भी नजर रखनी चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सोने को लेकर अति उत्साह और अति निराशा, दोनों से बचना चाहिए। इतिहास बताता है कि सोना लंबी अवधि में संपत्ति संरक्षण का अच्छा माध्यम है, लेकिन यह हमेशा एकतरफा ऊपर नहीं जाता। कई बार वर्षों तक कीमतें स्थिर रह सकती हैं और कई बार तेज गिरावट भी आ सकती है। इसलिए केवल भय, युद्ध या अफवाहों के आधार पर निवेश निर्णय लेना जोखिमपूर्ण हो सकता है।

बहरहाल, 1970 के दशक जैसा महाबुल रन दोहराया जाएगा या नहीं, इसका निश्चित उत्तर किसी के पास नहीं है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि दुनिया एक बार फिर आर्थिक और राजनीतिक अनिश्चितताओं के दौर से गुजर रही है। यही कारण है कि सोना निवेशकों के रडार पर बना हुआ है। फिर भी इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि जब हर कोई केवल तेजी की बात करने लगे, तब सावधानी बरतना सबसे बुद्धिमानी भरा कदम होता है। सोना भविष्य में नई ऊंचाइयों को छू सकता है, लेकिन उसके रास्ते में उतार-चढ़ाव और जोखिम भी उतने ही बड़े होंगे। इसलिए निवेशकों को भावनाओं के बजाय तथ्यों, संतुलन और दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ निर्णय लेना चाहिए।

(लेखक दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक हैं)