प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
हर नए सत्र के साथ बच्चों के हाथों में किताबें आती हैं, लेकिन इस बार जिम्मेदारियों की एक नई पुस्तक माता-पिता के सामने भी खुल रही है। वर्षों तक शिक्षा को विद्यालय की सीमा में बांधकर देखा गया, जबकि अभिभावकों की भूमिका फीस और परिणाम तक सिमट गई। नई शिक्षा व्यवस्था ने यह दृष्टिकोण बदल दिया है। अब शिक्षा का केंद्र केवल कक्षा नहीं, घर भी है। माता-पिता दर्शक नहीं, बच्चे के भविष्य के शिल्पकार हैं। प्रश्न यह नहीं कि बच्चा क्या सीख रहा है, बल्कि यह है कि उसके निर्माण में परिवार कितना सहभागी है। 2026 का शिक्षा सत्र ऐसे दस महत्वपूर्ण दायित्वों की याद दिलाता है, जिनके बिना किसी भी पीढ़ी का भविष्य सशक्त नहीं बन सकता।
पहला कर्तव्य
बच्चे को समझे बिना उसका भविष्य नहीं गढ़ा जा सकता। हर बच्चा अंकों का जोड़ नहीं, संभावनाओं का संसार है। उसकी जिज्ञासा, कल्पना और सपने ही उसकी पहचान हैं। विडंबना है कि आज कई अभिभावक केवल परिणाम देखते हैं। स्क्रीनों के दौर में माता-पिता का दायित्व है कि वे बच्चे को खेल, पुस्तकों और प्रकृति से जोड़ें। यह काम परिवार ही कर सकता है। बच्चे की प्रतिभा पहचानने वाले माता-पिता ही उसके भविष्य के शिल्पकार बनते हैं।
दूसरा कर्तव्य
विद्यालय की दिशा तय करने में अभिभावकों की आवाज़ महत्वपूर्ण है। विद्यालय प्रबंधन समिति में 75 प्रतिशत भागीदारी केवल नियम नहीं, जिम्मेदारी है। बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षकों की जवाबदेही में उनकी भूमिका आवश्यक है। यदि वे मौन रहेंगे, तो बदलाव की उम्मीद कमजोर पड़ेगी। शिक्षा अभिभावकों की सहभागिता से आकार लेती है। आज की निष्क्रियता, भविष्य की उपेक्षा है।
तीसरा कर्तव्य
बच्चे की पहली कक्षा घर से शुरू होती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का 5+3+3+4 ढांचा बताता है कि शिक्षा की नींव शुरुआती वर्षों में घर पर पड़ती है। कहानियां, प्रश्न पूछने की आज़ादी, असफलता स्वीकारने का साहस और सीखने का आनंद—ये पाठ कोई पाठ्यपुस्तक नहीं सिखा सकती। संवादपूर्ण घर बच्चों को केवल जानकारी नहीं, समझ देता है। शिक्षा का पहला पाठ मां की गोद और पिता के आचरण से शुरू होता है।
चौथा कर्तव्य
बच्चे को सबसे अधिक जरूरत समझे जाने की होती है। आज का बच्चा सुविधाओं के बीच भी अकेलेपन से जूझ रहा है। उसके भीतर डर, असुरक्षाएं और अनकहे सवाल हैं। इसलिए माता-पिता को केवल समझाने वाला नहीं, सुनने वाला बनना होगा। बच्चे की चुप्पी, गुस्से और सपनों को समझना ही सच्चा अभिभावकत्व है। जिस घर में विश्वास होता है, वहां बच्चे बड़ी चुनौतियों का सामना भी आत्मविश्वास से करते हैं। भावनात्मक सुरक्षा हर उपलब्धि की नींव है।
पांचवां कर्तव्य
बच्चे के विकास की नींव घर और विद्यालय की एकजुटता है। शिक्षक और अभिभावक एक ही लक्ष्य के साझेदार हैं। नियमित संवाद, ईमानदार प्रतिक्रिया और परस्पर सम्मान से शिक्षा सार्थक बनती है। घर का छोटा व्यवहारिक बदलाव भी शिक्षक के लिए महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। जब घर और विद्यालय साथ चलते हैं, तभी बच्चे का विकास तेज़ होता है। शिक्षा में प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग सबसे प्रभावी सूत्र है।
छठा कर्तव्य
बच्चे की सबसे बड़ी विरासत संस्कार हैं। ज्ञान पुस्तकें दे सकती हैं, पर चरित्र का निर्माण परिवार ही करता है। ईमानदारी, अनुशासन, सहानुभूति, परिश्रम और नैतिक साहस पाठ्यक्रम नहीं, घर के वातावरण की देन हैं। यदि माता-पिता केवल करियर पर ध्यान देंगे और चरित्र को भूल जाएंगे, तो समाज डिग्रीधारियों से भर जाएगा, जिम्मेदार नागरिकों से नहीं। राष्ट्र का भविष्य पाठ्यक्रम नहीं, संस्कार तय करते हैं।
सातवां कर्तव्य
स्वस्थ बच्चा ही बेहतर सीख सकता है। पर्याप्त नींद, पौष्टिक भोजन, नियमित खेलकूद और स्क्रीन-मुक्त समय अब विकल्प नहीं, आवश्यकता हैं। थका शरीर और तनावग्रस्त मन कभी श्रेष्ठ शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकता। जब मानसिक स्वास्थ्य वैश्विक चुनौती बन चुका है, तब माता-पिता की सजगता सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। स्वस्थ शरीर और संतुलित मन ही शिक्षा की मजबूत नींव हैं।
आठवां कर्तव्य
बदलते समय के साथ अभिभावकों का सीखते रहना जरूरी है। नई शिक्षा नीति, बदलते पाठ्यक्रम, तकनीकी बदलाव और डिजिटल चुनौतियों को समझे बिना सही मार्गदर्शन संभव नहीं। जो अभिभावक सीखना छोड़ देते हैं, वे बच्चों की दुनिया से दूर हो जाते हैं। बच्चे को आगे बढ़ाने का सरल उपाय है—स्वयं भी सीखते रहना। शिक्षित अभिभावक ही समय की दिशा पहचान पाते हैं।
नवां कर्तव्य
बच्चों को दबाव नहीं, भरोसे की जरूरत है। प्रतिस्पर्धा के इस दौर में उन्हें आलोचक नहीं, सहारा चाहिए। तुलना, अपेक्षाएं और दबाव अनेक प्रतिभाओं को समय से पहले तोड़ देते हैं। माता-पिता को असफलताओं को भी सफलताओं जितनी सहजता से स्वीकार करना चाहिए। अपने सपनों का बोझ बच्चे पर डालना प्रेम नहीं, अन्याय है। उसे अपनी राह चुनने की स्वतंत्रता देना ही सच्चा समर्थन है।
दसवां कर्तव्य
बच्चे के साथ निरंतर खड़े रहना ही सच्ची अभिभावकता है। शिक्षा किसी सत्र, कक्षा या परीक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया है। माता-पिता का साथ केवल परिणामों तक नहीं होना चाहिए। संघर्ष, सफलता, भ्रम और उपलब्धि—हर मोड़ पर उनका सहयोग जरूरी है। यही निरंतरता विश्वास जगाती है, और वही विश्वास बच्चे को ऊंचाइयों तक पहुंचाता है।
नया शिक्षा सत्र केवल शैक्षणिक कैलेंडर का नया पृष्ठ नहीं, बल्कि माता-पिता का दायित्व-पत्र है। आने वाली पीढ़ी का निर्माण केवल स्कूलों में नहीं, घरों में भी होगा। समय का संदेश स्पष्ट है—जागिए, भागीदारी कीजिए, मार्गदर्शक बनिए और अपने इन दस कर्तव्यों का निर्वहन कीजिए। क्योंकि भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण कक्षा घर में लगती है, और उसके प्रथम शिक्षक माता-पिता होते हैं।





