मान ने बढ़ाया भारतीय राजनीति का मान

सीता राम शर्मा ‘चेतन’

निःसंदेह भारतीय राजनीति के आकाश में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सूर्य की भांति चमक दमक रहे हैं । उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के आगे फिलहाल कोई भी राजनेता नहीं टिक सकता । पिछले आठ वर्ष के उनके नेतृत्व में देश की दशा और दिशा में जो क्रांतिकारी सुधार, बदलाव और विकास हुआ है, वह अत्यंत महत्वपूर्ण, प्रसंशनीय, अनुकरणीय और मुक्त कंठ, हृदय तथा विवेक से स्वागत योग्य है, पर फिलहाल भारतीय राजनीति की भलाई और उसके उच्चतम आदर्श को स्थापित करने का जो एक काम पंजाब के महज दो माह के छोटे से कार्यकाल को पूरा करने वाले मुख्यमंत्री भगवंत मान ने किया है, उसकी अपेक्षा मोदी जी से भी नहीं की जा सकती । स्पष्ट कर दूं कि इसे मोदी से मान की तुलना कदापि ना समझा या माना जाए क्योंकि कम से कम वर्तमान में इन दोनों नेताओं की तुलना हो ही नहीं सकती । इसका कोई आधार भी नहीं है । मोदी का अतीत और वर्तमान, व्यक्तित्व और कृतित्व मान से कई गुणा ज्यादा स्वच्छ, समृद्ध, शानदार और प्रेरक है और किसी भी दो व्यक्ति की तुलना का आधार किसी के द्वारा किए गए किसी एक काम या एक सीमित कालखंड की कुछ उपलब्धियों से नहीं की जा सकती । फिलहाल जिक्र मान के मुख्यमंत्री बनने के बाद पिछले दिनों भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए उनकी अपनी ही सरकार के स्वास्थ्य मंत्री विजय सिंगला को हटाने के साथ उन्हें गिरफ्तार करवाने का, ऐसा काम व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति करने के बावजूद अभी तक अपने शानदार और लंबे राजनीतिक कार्यकाल में मोदी ने भी कभी नहीं किया । जबकि यह बिल्कुल असंभव है कि उन्हें अपने लंबे राजनीतिक जीवन में मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री रहते हुए अपने कई मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों के भ्रष्टाचार की पुख्ता जानकारी ना हो या उपलब्ध नहीं हो सकती हो । इसे लेकर निराधार और बेवजह तर्क दिये जा सकते हैं कि एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में उनकी कुछ या कई विवशताएं थी या रही होगी । तर्क यह भी दिया जा सकता है कि दीर्घकालीन राष्ट्रीय भलाई और लक्ष्यों को साधने के लिए वर्तमान अर्थयुग में कुछ घोर अनैतिक समझौते करने पड़ते हैं । प्रथम दृष्टया यह सच भी है पर ऐसा बिल्कुल नहीं है कि इसका कोई ईमानदार और असरदार वैकल्पिक मार्ग दूसरा नहीं हो सकता है । कम से कम भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति के तो कई मार्ग संभव हैं क्योंकि ऐसे नियम कानून सिर्फ एक दल के लिए नहीं सबके लिए बनाए जा सकते हैं । जरूरत भ्रष्टाचार को लेकर उस दर्जे की इच्छाशक्ति, दृढता और ईमानदारी की चाहिए, जो मान ने दिखाई है । भारतीय राजनीति, शासन-प्रशासन और सामाजिक व्यवस्था की सबसे बड़ी बीमारी, सबसे बड़े दोष, भ्रष्टाचार पर जो प्रहार फिलहाल मान ने किया है, उसके लिए उन्हें एक सौ पैतींस करोड़ भारतियों का तहे दिल से सैल्यूट है ! अच्छा होगा कि मान की इस राजनीतिक पहल को भारतीय राजनीतिक दल और उनके मुखिया वर्तमान राजनीति का एक आदर्श समझें और उस पर चलने, आगे बढ़ने की ईमानदारी दिखाएं । गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में उसके पहले की दस वर्षीय युपीए सरकार के भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाकर ही मोदी के नेतृत्व में जीत हासिल कर जो सरकार बनी थी वह इसी महिने अपने लगातार दूसरे कार्यकाल के तीन वर्ष पूर्ण कर रही है । अर्थात भ्रष्टाचार के खिलाफ बनी मोदी सरकार के आठ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं पर दुर्भाग्य से राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ यह सरकार अब तक वैसा सख्त और प्रभावी कदम नहीं उठा पाई है, जैसा साहसिक कदम अभी पंजाब के नए मुख्यमंत्री भगवंत मान ने उठाया है । पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सहित तीन राज्यों में मिली जीत से उत्साहित होकर भी प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाने का संदेश दिया था, पर अब तक केंद्र सरकार के द्वारा सत्ता और शासन को भ्रष्टाचार के कोढ़ से मुक्ति दिलाने का, पुराने भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाने का, या फिर भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने का कोई बड़ा और सकारात्मक काम या फिर उसकी पहल का प्रयास भी अभी तक सामने नहीं आया है । सर्वविदित है कि राजनीतिक भ्रष्टाचार पर कठोर प्रहार के लिए सबसे पहले राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले चंदे के पूर्ण पारदर्शी और कठोर नियम कानून बनाने की जरूरत है । राजनेता भ्रष्टाचार करने का साहस ना कर पाएं इसके लिए भी पूर्व और वर्तमान सांसदों तथा विधायकों के लिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध बेहद सख्त नियम कानून बनाए जाने चाहिए और ऐसे मामलों के निपटारे की समय सीमा भी अधिकतम एक वर्ष ही हो, तभी कुछ बेहतर होने की संभावना हो सकती है । फिलहाल बहुत सोचने समझने और विचारने के बाद इस मुद्दे पर अंतिम बात यही लिखी या कही जा सकती है कि भगवंत मान ने इस दिशा में जो बड़ा काम किया है, वह निःसंदे ह भारतीय राजनीति का मान और भरोसा बढ़ाने वाला है, पर यह महज शुरुआत है और बहुत जल्दी इसका कोई बड़ा असर भारतीय राजनीति और राजनीतिक व्यवस्था पर पड़ेगा, इसकी संभावना शून्य है । रही बात आम जनता या लेखक की, तो फिलहाल उसे इस शून्य को सौ में बदलने का सपना देखने के साथ भगवंत मान जैसे नेता के ऐसे प्रयासों को प्रोत्साहित भी करना ही चाहिए, क्योंकि भ्रष्टाचार की इस रात का भी कभी तो सवेरा होगा ही ।