एनडीए कुनबे में सांसद बढ़े पर बढ़ गया अंदरूनी असंतोष

Number of MPs in the NDA fold has risen, but so has internal discontent

दिलीप कुमार पाठक

भारतीय राजनीति में इस समय एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। विपक्ष के सांसदों की टूट-फूट से सत्ताधारी एनडीए का कुनबा लगातार बड़ा हो रहा है। ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि सरकार पहले से कहीं अधिक मजबूत और सुरक्षित हो चुकी है। लेकिन जब हम दिल्ली के राजनीतिक गलियारों और संसद के आंकड़ों की गहराई में जाते हैं, तो कहानी कुछ और ही नजर आती है। बाहर से ताकतवर दिख रही इस सरकार के भीतर तनाव की एक नई लहर दौड़ गई है।

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा अपने दम पर बहुमत का जाजुई आंकड़ा नहीं छू सकी थी। तब एनडीए ने 293 सीटों के साथ सरकार का गठन किया था। सरकार को टिकाए रखने के लिए 272 सांसदों की जरूरत होती है। हाल के दिनों में विपक्षी खेमे, खासकर टीएमसी और शिवसेना, जैसे दलों से सांसदों के पाला बदलने के कारण अब एनडीए का आंकड़ा 313 के पार पहुंच चुका है। सीधे गणित से देखें तो अविश्वास प्रस्ताव के जरिए इस सरकार को गिराना विपक्ष के लिए पूरी तरह असंभव है। सरकार गिरने का कोई तात्कालिक खतरा नहीं है, इसलिए सरकार के पूरी तरह अस्थिर होने का दावा तकनीकी रूप से गलत साबित होता है। लेकिन असली पेंच सरकार के बने रहने का नहीं, बल्कि उसके कामकाज और आंतरिक तालमेल का है। सरकार का कुनबा तो बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ ही गठबंधन के भीतर तनाव भी चरम पर पहुंच गया है। इस समय सबसे बड़ी अटकलें मंत्रिमंडल में बड़े फेरबदल को लेकर लगाई जा रही हैं। बाहर से आए दिग्गज नेताओं को संतुष्ट करने के लिए उन्हें सरकार में जगह देनी होगी। इसकी वजह से मौजूदा कई मंत्रियों पर भारी दबाव देखा जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि नए चेहरों को एडजस्ट करने के लिए कई पुराने और कद्दावर मंत्रियों की छुट्टी की जा सकती है या उनसे भारी-भरकम मंत्रालय छीने जा सकते हैं। इस संभावित फेरबदल की वजह से मंत्रियों और मूल पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष की आग सुलगने लगी है। पुराने नेताओं को लगने लगा है कि बरसों तक पार्टी के लिए खून-पसीना बहाने के बाद भी, ऐन मौके पर दलबदलुओं को तवज्जो दी जा रही है। तनाव का दूसरा बड़ा कारण गठबंधन की छोटी और क्षेत्रीय पार्टियों में देखा जा रहा है। नीतीश कुमार की जेडीयू और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी जैसे दल अब अपने राजनीतिक अस्तित्व को लेकर गहरे संकट और चिंता में हैं। दरअसल, जब एनडीए के पास 293 सीटें थीं, तब इन छोटे दलों की बैसाखियों के बिना सरकार एक कदम भी नहीं चल सकती थी। लेकिन अब विपक्ष से आए सांसदों के कारण सरकार का अपना आंकड़ा 313 पार कर गया है। इस नए समीकरण ने छोटे दलों की सौदेबाजी की ताकत को लगभग खत्म कर दिया है। उन्हें डर है कि भाजपा अब उनके क्षेत्रीय हितों को नजरअंदाज कर सकती है, जिससे उनके राज्यों में उनका वजूद ही खतरे में पड़ जाएगा।इस राजनीतिक उठापटक के बीच, हालिया विवादों ने सरकार की सुशासन की छवि पर भी दबाव बना दिया है। अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी का बड़ा मामला सामने आने से जहां एक तरफ धार्मिक और राजनीतिक बहस छिड़ गई है, वहीं दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव से जुड़ा भूमि आवंटन का ताजा प्रकरण भी विपक्ष के हाथों में बड़ा मुद्दा बन गया है। इन दोनों ही गंभीर मामलों ने भाजपा को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है, जिससे संगठन के भीतर का आपसी तनाव और अधिक गहरा गया है। इस पूरे दलबदल के पीछे सरकार की अपनी एक बड़ी रणनीति भी छिपी है। सरकार संसद में मनमाने और कड़े बिल पारित कराना चाहती है। भाजपा का मुख्य एजेंडा सिर्फ सरकार चलाना नहीं, बल्कि परिसीमन और ‘एक देश, एक चुनाव’ जैसे बड़े संवैधानिक सुधारों को लागू करना है। इन ऐतिहासिक बदलावों के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत यानी 362 सीटों की जरूरत होती है। सरकार इसी जादुई आंकड़े को छूने के लिए विपक्ष में तोड़फोड़ कर रही है। हालांकि, इतने सांसदों को जोड़ने के बाद भी सरकार अभी दो-तिहाई के आंकड़े से दूर है, जिससे विधायी स्तर पर उसकी राह अब भी आसान नहीं दिखती। कुल मिलाकर देखें तो यह दावा पूरी तरह सही है कि सांसदों के आने से एनडीए का संख्या बल तो बढ़ा है, लेकिन सरकार के भीतर आंतरिक तनाव और असंतोष अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया है। सरकार की उम्र भले ही लंबी हो गई हो, लेकिन मंत्रियों की कुर्सी छिनने का डर, पुराने नेताओं की नाराजगी, क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व का संकट और हालिया भ्रष्टाचार के आरोप इस सरकार की राजनीतिक स्थिरता को अंदर ही अंदर खोखला कर रहे हैं।