सत्य भूषण शर्मा
कभी भारत की पहचान समय पर आने वाले मानसून से होती थी। किसान आकाश में उमड़ते-घुमड़ते बादलों को देखकर भविष्य की समृद्धि का अनुमान लगा लेते थे। गाँवों की चौपालों से लेकर शहरों की गलियों तक वर्षा का स्वागत उत्सव की तरह होता था। लेकिन अब मौसम का यह भरोसा लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है। कभी बादल आते हैं पर बरसते नहीं, कभी बिना चेतावनी के मूसलाधार वर्षा सब कुछ बहा ले जाती है और कभी लंबे समय तक आसमान सूना पड़ा रहता है। ऐसा लगता है मानो बादल भी इंसान से पूछ रहे हों—क्या तुमने प्रकृति के साथ न्याय किया है?
आज जलवायु परिवर्तन केवल वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाओं का विषय नहीं रह गया, बल्कि आम आदमी के जीवन का कठोर यथार्थ बन चुका है। ऋतुओं का क्रम बदल रहा है, तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है और वर्षा का स्वभाव असामान्य होता जा रहा है। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया। यह वर्षों से प्रकृति के साथ किए गए हमारे असंतुलित व्यवहार का परिणाम है।
मनुष्य ने विकास की दौड़ में जंगलों को काटा, नदियों को प्रदूषित किया, तालाबों को पाट दिया और शहरों को कंक्रीट के जंगल में बदल दिया। प्राकृतिक जल निकासी के मार्ग समाप्त हो गए। परिणाम यह हुआ कि जहाँ वर्षा कम होती है वहाँ सूखा पड़ता है और जहाँ अधिक होती है वहाँ बाढ़ विनाश का कारण बन जाती है। दोनों ही स्थितियाँ मानव निर्मित असंतुलन की कहानी कहती हैं।
सबसे अधिक चिंता का विषय किसान है। खेती आज भी वर्षा पर बहुत हद तक निर्भर है। जब बादल समय पर नहीं आते, तो बीज मिट्टी में दम तोड़ देते हैं। किसान की मेहनत, उम्मीद और पूँजी तीनों दाँव पर लग जाती हैं। दूसरी ओर, यदि अत्यधिक वर्षा हो जाए तो तैयार फसल खेतों में ही नष्ट हो जाती है। ऐसे में कृषि केवल पेशा नहीं, बल्कि जोखिम का पर्याय बनती जा रही है।
जल संकट भी तेजी से गहराता जा रहा है। भूजल स्तर निरंतर नीचे जा रहा है। शहरों में पानी की आपूर्ति चुनौती बन रही है, जबकि गाँवों में कुएँ और तालाब सूखने लगे हैं। यदि वर्षा का जल सुरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में पानी को लेकर सामाजिक और आर्थिक संघर्ष बढ़ सकते हैं।
इस चुनौती का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं होगा। प्रत्येक नागरिक को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। वर्षा जल संचयन, वृक्षारोपण, जल स्रोतों का संरक्षण, प्लास्टिक का सीमित उपयोग और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील जीवनशैली अपनाना समय की आवश्यकता है। छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़े परिवर्तन ला सकते हैं।
विद्यालयों और महाविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। विद्यार्थियों को पौधारोपण, जल संरक्षण और स्थानीय पर्यावरण के संरक्षण से जोड़ना होगा। मीडिया, सामाजिक संगठन और जनप्रतिनिधि भी जन-जागरूकता की इस मुहिम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
भारतीय संस्कृति सदैव प्रकृति को पूजनीय मानती रही है। हमारे पर्व, व्रत और परंपराएँ जल, वृक्ष और धरती के संरक्षण का संदेश देती हैं। आधुनिक विकास तभी सार्थक होगा, जब उसमें पर्यावरणीय संतुलन भी शामिल हो। केवल आर्थिक प्रगति भविष्य की सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकती।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बादलों से शिकायत करने के बजाय अपने व्यवहार का आत्ममंथन करें। यदि हम प्रकृति के साथ संतुलित संबंध स्थापित करेंगे, तो मौसम भी अपना स्वाभाविक स्वरूप पुनः प्राप्त करेगा। अन्यथा आने वाली पीढ़ियों को जल, अन्न और स्वच्छ वातावरण के लिए गंभीर संघर्ष करना पड़ेगा।
समय की पुकार स्पष्ट है—प्रकृति के साथ सहयोग ही मानव सभ्यता की सबसे बड़ी सुरक्षा है। यदि आज हमने यह संदेश नहीं समझा, तो आने वाला कल केवल मौसम का नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का भी सबसे कठिन इम्तिहान बन सकता है।





