संजय सक्सेना
भारतीय राजनीति के सबसे पुराने दल कांग्रेस के भीतर इन दिनों एक खामोश लेकिन बेहद गहरा बदलाव आकार ले रहा है। यह बदलाव अचानक नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे दो दशकों की एक लंबी राजनीतिक तपस्या और जिद छिपी है। साल 2004 में जब राहुल गांधी ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा था, तब से उनका एक सबसे बड़ा और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट था कांग्रेस का सांगठनिक कायाकल्प और ‘जनरेशन चेंज’ यानी पीढ़ीगत बदलाव। वह कांग्रेस को पार्टी के उन बुजुर्ग और ‘ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स’ करने वाले नेताओं के चंगुल से बाहर निकालना चाहते थे, जो सिर्फ बंद कमरों में नीतियां बनाते थे। राहुल का सपना एक ऐसी युवा, आक्रामक और जमीन पर चौबीसों घंटे लड़ने वाली पार्टी तैयार करना था, जो सीधे जनता के बीच खड़ी दिखे। शुरुआती दौर में राहुल गांधी का यह सियासी प्रयोग पुराने दिग्गजों (ओल्ड गार्ड) के कड़े विरोध, अंदरूनी खींचतान और सोनिया गांधी के दरबार में बुजुर्ग नेताओं के वीटो पावर के चलते परवान नहीं चढ़ सका था। लेकिन आज की तारीख में कांग्रेस के भीतर जो फैसले लिए जा रहे हैं, उससे साफ जाहिर होता है कि राहुल गांधी का 20 साल पुराना यह सपना अब हकीकत में बदलने लगा है।
इस पीढ़ीगत बदलाव की सबसे ताजा और दमदार बानगी हालिया राज्यसभा चुनावों के टिकट वितरण में देखने को मिली है। कांग्रेस ने राज्यसभा के लिए अपने जिन उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया है, उनमें पुराने और पारंपरिक चेहरों को दरकिनार कर पूरी तरह संगठन और राहुल गांधी के करीबियों पर भरोसा जताया गया है। कर्नाटक से स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ पवन खेड़ा और मंसूर अली खान को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाना इसी रणनीति का हिस्सा है। मध्य प्रदेश से मीनाक्षी नटराजन, राजस्थान से नीरज डांगी, तमिलनाडु से प्रवीण चक्रवर्ती और झारखंड से प्रणव झा को राज्यसभा का टिकट दिया गया है। ये सभी नाम किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं और इन्हें राहुल गांधी की कोर टीम का हिस्सा माना जाता है। प्रवीण चक्रवर्ती को राहुल का बेहद करीबी रणनीतिकार माना जाता है, जो पार्टी के ‘प्रोफेशनल कांग्रेस’ और डेटा विभाग के प्रमुख के तौर पर आर्थिक व तकनीकी मामलों को देखते हैं। अभिनेता से नेता बने सी जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके के साथ तमिलनाडु में कांग्रेस का गठबंधन कराने में भी उनकी अग्रणी भूमिका रही थी। इसी तरह, राष्ट्रीय सचिव प्रणव झा कांग्रेस अध्यक्ष कार्यालय का कामकाज संभालते हैं, जबकि पवन खेड़ा अपनी मुखर आवाज से टीवी डिबेट्स में सरकार को फ्रंटफुट पर घेरने के लिए जाने जाते हैं। राहुल गांधी ने पवन खेड़ा को कर्नाटक जैसी सुरक्षित सीट से उच्च सदन भेजकर पूरे कैडर को एक साफ संदेश दिया है कि जो जमीन पर लड़ेगा, उसे उसका हक और इनाम जरूर मिलेगा।
यह बदलाव सिर्फ दिल्ली के गलियारों या राज्यसभा के टिकटों तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्यों की सत्ता और कमान सौंपने में भी राहुल गांधी की पसंद साफ दिखाई दे रही है। केरल में कांग्रेस ने 69 साल के रमेश चैन्निथला और 64 साल के केसी वेणुगोपाल जैसे कद्दावर नेताओं को नजरअंदाज कर 61 साल के वीडी सतीशन को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी। इतना ही नहीं, केरल की नई सरकार के मंत्रिमंडल में 50 फीसदी मंत्रियों की उम्र 50 साल से कम रखकर युवाओं को तरजीह दी गई। इसी तरह का एक बड़ा और साहसिक प्रयोग कर्नाटक में देखने को मिला। वहां 77 साल के सिद्धारमैया की जगह 64 साल के आक्रामक और संकटमोचक नेता डीके शिवकुमार की ताजपोशी की गई। कर्नाटक जैसे राज्य में जहां सामाजिक और जातीय समीकरण बेहद जटिल हैं, वहां नेतृत्व परिवर्तन करना एक बड़ी चुनौती थी। सिद्धारमैया ओबीसी (कुरुबा) समुदाय से आते हैं, जिन्हें नाराज करने का जोखिम कोई दल नहीं उठाना चाहता। लेकिन कांग्रेस ने राजनीतिक रूप से ताकतवर वोक्कालिगा जाति के डीके शिवकुमार पर दांव लगाया और संतुलन बनाए रखने के लिए ओबीसी समुदाय से आने वाले जी परमेश्वर को डिप्टी सीएम और बीके हरिप्रसाद को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी। साथ ही, कैबिनेट में मल्लिकार्जुन खरगे और सिद्धारमैया के बेटों को जगह देकर भविष्य की लीडरशिप की राह भी खोल दी गई। इसी फेहरिस्त में तेलंगाना की कमान 56 साल के युवा और ऊर्जावान नेता रेवंत रेड्डी को सौंपना और हिमाचल प्रदेश में 62 साल के सुखविंदर सिंह सुक्खू को मुख्यमंत्री बनाना यह साबित करता है कि अब राज्यों में ‘ओल्ड गार्ड’ को राष्ट्रीय भूमिकाओं में भेजकर नई पीढ़ी को आगे किया जा रहा है।
देखा जाए तो कांग्रेस में यह जेनरेशनल शिफ्ट करीब दो दशक बाद देखने को मिल रहा है। कुछ समय पहले जब बीजेपी में पीढ़ीगत बदलाव के तहत नेतृत्व में नए चेहरे सामने आए थे, तब कांग्रेस के बुजुर्ग नेतृत्व को लेकर काफी आलोचनाएं होती थीं। लेकिन अब कांग्रेस अपनी राजनीतिक सीमाओं के भीतर रहते हुए इस ढर्रे को पूरी तरह बदल चुकी है। पहले राज्यों के बड़े फैसले वहां के क्षत्रप लिया करते थे, लेकिन अब हाईकमान ने संगठन के लोकतांत्रीकरण की प्रक्रिया को तेज कर दिया है। प्रादेशिक और जिला संगठनों में राहुल गांधी की ‘यूथ कांग्रेस’ वाली मूल टीम के नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां दी जा रही हैं। सैयद नसीर हुसैन को जम्मू-कश्मीर, कृष्ण अल्लावरु को बिहार और सप्तगिरी उलाका जैसे युवा चेहरों को अहम राज्यों का प्रभारी बनाया गया है। पंजाब में कमान 48 साल के अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के हाथों में है, बिहार में 56 साल के राजेश कुमार प्रदेश अध्यक्ष हैं, उत्तर प्रदेश में अजय राय और महाराष्ट्र में 58 साल के हर्षवर्धन सपकाल जैसे जमीनी नेताओं को आगे बढ़ाया गया है। इन तमाम नियुक्तियों से राजस्थान में सचिन पायलट समेत अन्य राज्यों के उन युवा नेताओं की उम्मीदें भी बढ़ गई हैं, जो लंबे समय से अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। मल्लिकार्जुन खरगे के अध्यक्ष बनने और राहुल गांधी के ‘नेता प्रतिपक्ष’ के रूप में मजबूत होकर उभरने के बाद पार्टी में चाटुकारिता और परिक्रमा की राजनीति खत्म हो रही है। ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद कांग्रेस बंद कमरों से निकलकर सड़कों पर संघर्ष करती दिखने लगी है, जो कि राहुल गांधी के इसी नए प्रयोग और दूरगामी विजन का नतीजा है।





