राज्य विधान सभाओं के परिणाम परिवर्तन के प्रतीक

State Assembly results mark change

प्रो नीलम महाजन सिंह

हाल ही मे हुए राज्य विधानसभाओं के चुनावों में करोड़ों मतदाताओं ने हिस्सा लिया। सबसे बड़ी टक्कर पश्चिम बंगाल में हुई, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी, भाजपा को भारी जीत मिली। ये नतीजे राष्ट्रीय चुनावों से पहले 2029 संसद में सत्ता का संतुलन बदल सकते हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की पत्रकार प्रगति के.बी. और श्री एलेक्स ट्रावेली के अनुसार, “पूरे भारत में, राज्य विधानसभा चुनावों ने एक निर्णायक राजनीतिक बदलाव ला दिया है। इन नतीजों ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी का दायरा पूरे देश में बढ़ा दिया है और अब सिर्फ़ कुछ ही इलाके ऐसे बचे हैं जो उनके प्रभाव से बाहर हैं”। कुछ हद तक तो ये आकलन सही है, परंतु इस पर विश्लेषण करना होगा। चार राज्यों: असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल व एक केंद्र शासित प्रदेश, पुडुचेरी में अप्रैल में वोट डाले गए थे, जिनके परिणाम महत्वपूर्ण हैं। पीएम नरेंद्र मोदी व अमित शाह ने भाजपा की पूरी ताकत पश्चिम बंगाल में लगा दी थी। भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल में ज़बरदस्त जीत हासिल की। यह ऐसा राज्य था जहां उसने पहले कभी शासन नहीं किया था, असम में अपनी सत्ता बरकरार रखी व पुडुचेरी में अपने सहयोगियों के साथ मिलकर जीत हासिल की। बीजेपी को केरल और तमिलनाडु में कुछ बढ़त मिली, लेकिन तमिलनाडु में सिर्फ़ दो साल पुरानी पार्टी, टी.वी.के. का उभार और ज़्यादा चौंकाने वाला है। इन नतीजों के असर राज्य की राजधानियों से कहीं ज़्यादा दूर तक फैलेंगें। यह नतीजा 2029 के आम चुनावों से पहले भाजपा की राष्ट्रीय गति को मज़बूत करता है, संसद में उसकी स्थिति को और पक्का करता है, व क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों को एक बड़ा झटका देता है। इससे बीजेपी शासन के ‘केंद्रीकृत व एकात्मक मॉडल’ की ओर बढ़ने का अभियान आगे बढ़ा है। पश्चिम बंगाल में जीत के बाद नरेंद्र मोदी मज़बूत होकर उभरे, व विकास और स्थिरता का वादा किया। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी एक के बाद एक चुनावों में जीत हासिल करती रही है। पश्चिम बंगाल पर जीत के साथ यह सिलसिला अपने चरम पर पहुँच गया है। इस ज़बरदस्त जीत में श्री. मोदी की पार्टी ने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस पार्टी (TMC) को हरा दिया। टीएमसी पिछले 15 सालों से सत्ता में थी। चुनाव विश्लेषक, ऐक्सिस माई इंडिया के संस्थापक प्रदीप गुप्ता ने बताया कि इस निर्णायक जीत के पीछे कई वजहों का मेल था, जैसे कि सत्ता-विरोधी लहर (anti-incumbency), बिगड़ती कानून-व्यवस्था, और दूसरे राज्यों में भाजपा का प्रदर्शन। इसके अलावा, ‘महिला फैक्टर’ भी एक अहम वजह थी। पश्चिम बंगाल में महिलाओं के साथ क्रूरता की कई घटनाओं ने लोगों को झकझोर दिया था, जिनमें 2024 में RG आर.जी. कार मेडिकल कालेज में एक ट्रेनी डॉक्टर के साथ हुए बलात्कार और उसकी हत्या की घटना शामिल है। पीड़ित की माँ ने टीएमसी सरकार पर दोषियों को बचाने का आरोप लगाया था। समय के साथ, लोगों ने देखा महसूस किया कि पश्चिम बंगाल में एक तरह का कुशासन है, खासकर महिलाओं के प्रति!

हालाँकि, टीएमसी की तेज़-तर्रार नेता ममता बनर्जी, जो अपनी भवानीपुर सीट भी बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी से हार गई हैं, ने हार मानने से इंकार कर दिया है और कहा है कि वे इस्तीफ़ा नहीं देंगीं। ममता बनर्जी सरकार ने भाजपा पर ‘चुनाव चुराने’ का आरोप लगाया है। इससे पहले, उन्होंने केंद्रीय सुरक्षा बलों की भारी मौजूदगी का हवाला दिया था, जिससे उनके समर्थकों में डर पैदा हुआ। सुश्री बनर्जी ने भारत के चुनाव आयोग के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न’ (SIR) को भी दोषी ठहराया। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो मतदाता सूचियों को सत्यापित और संशोधित करने के लिए नियमित रूप से की जाती है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के ज़रिए उनके समर्थन आधार को, विशेष रूप से मुसलमानों को सूची से हटा दिया गया है। यह संशोधन, केरल और तमिलनाडु में भी किया गया था। उसमें 90 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए, जो पश्चिम बंगाल के कुल मतदाताओं का लगभग 12 प्रतिशत है। हालांकि, बीजेपी और टीएमसी दोनों इसकी अलग-अलग व्याख्या करते हैं। बीजेपी का कहना है कि इस प्रक्रिया के ज़रिए उन अयोग्य मतदाताओं को सूची से हटाया गया, जिनके नाम शामिल होने से मतदाता सूची का आकार बढ़ गया था और जिससे सुश्री बनर्जी को फ़ायदा पहुँचने की संभावना थी। “जो लोग राज्य से बाहर काम कर रहे थे, वे वापस लौटे व उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि वे वोट दें, और उन्होंने बड़ी संख्या में वोट दिया”, बीजेपी राष्ट्रीय प्रवक्ता, गुरु प्रकाश पासवान ने कहा। पासवान के अनुसार “एसआईआर पूरी तरह से संवैधानिक, कानूनी व वैध प्रक्रिया है”। क्या ये चुनाव एक लोकतंत्र में शांतिपूर्ण मतदान को प्राथमिकता दिये जाने वाले हैं? पीएम नरेंद्र मोदी को एक ऐसा जनादेश दिया गया है, जो शासन को मौलिक रूप से प्रत्यक्ष वितरण, कल्याणकारी समावेश व एक आकांक्षी नागरिकता की दिशा में पुनर्निर्देशित करता है। बंगाल के लोगों ने दशकों तक राजनीतिक हिंसा, टूटे वादों व अधूरी आकांक्षाओं को सहा है। इन चुनावों में बीजेपी और उसके सहयोगी दल व नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) ने पड़ोसी राज्य असम और पूर्व फ्रांसीसी उपनिवेश पॉन्डिचेरी (जिसे अब पुडुचेरी के नाम से जाना जाता है) में अपनी सत्ता बरकरार रखी, व दक्षिणी राज्य केरल में अपनी सीटों की संख्या को बढ़ाकर तीन कर लिया है। फ़िर केरल में कॉंग्रेस और यू.डी.एफ. की शानदार जीत हुई है। ये कोई चौंकाने वाले नतीजे नहीं थे। केरल में आखिरी कम्युनिस्ट सरकार को सत्ता गंवानी पड़ी व इंडियन नेशनल कांग्रेस सत्ता में आ गई। केरल में कॉंग्रेस एकजुटता का लाभ हुआ। तमिलनाडु में चौंकाने वाली जीत देखने को मिली। अभिनेता से राजनेता बने जोसेफ विजय चंद्रशेखर (‘विजय’) के नेतृत्व वाली, महज़ दो साल पुरानी पार्टी ‘तमिलगा वेट्री कझगम’ (TVK) ने अप्रत्याशित रूप से सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरकर, चुनाव-पूर्व बने सभी गठबंधनों को ध्वस्त कर दिया। विजय ने कहा, “रोज़गार पैदा करने के बजाय, उनकी दिलचस्पी अपनी पार्टी का प्रभाव बढ़ाने के लिए लोगों को मुफ़्त की चीज़ें (हैंडआउट्स) देने में ज़्यादा थी।” भाजपा का
पूरे भारत में विस्तार हुआ है। इसके भी दो पहलु हैं।

पश्चिम बंगाल में मिली जीत का असर राष्ट्रीय स्तर पर देखने को मिलेगा। इसके चलते संसद के राज्यसभा में बीजेपी की सीटों की संख्या बढ़ेगी, जिससे उसका प्रभाव ज़्यादा बढ़ जाएगा। 1984 में महज़ दो सीटों से शुरुआत करने वाली यह पार्टी, अब पूरे भारत में 22 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में सत्ता में है। बीजेपी ने आखिरकार भारत के उन हिस्सों में भी अपनी पैठ बना ली है, जहाँ हिंदी नहीं बोली जाती। अब बीजेपी भारत की 78 प्रतिशत आबादी पर राज कर रही है। वोटों की गिनती के बाद, नरेंद्र मोदी ने पारंपरिक बंगाली धोती पहनी व पार्टी के उत्साहित कार्यकर्ताओं को उनके सालों के अनुशासन और कड़ी मेहनत के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा, “आपने एक नया इतिहास रचा है। आज का दिन भारत के महान लोकतंत्र, काम के आधार पर राजनीति और स्थिरता के संकल्प पर भरोसे का दिन है। दोस्तों, जीत और हार लोकतंत्र और चुनावों का एक स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन पाँच राज्यों के लोगों ने दिखाया है कि भारत लोकतंत्र की जननी क्यों है … यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है।” पीएम नरेंद मोदी ने घोषणा की। उन्होंने कहा, “हमारा मंत्र है कि नागरिक ही भगवान के समान हैं। हम लोगों की सेवा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, और इसीलिए नागरिक बीजेपी पर भरोसा करते हैं। वे देख सकते हैं कि जहाँ बीजेपी है, वहाँ सुशासन और विकास है,”। मोदी ने हर पार्टी से राजनीतिक हिंसा खत्म करने की अपील की।

“बात बदले की नहीं, बल्कि नए सिरे से शुरुआत की होनी चाहिए। मैं हर बंगाली से वादा करता हूँ कि बीजेपी बंगाल के बेहतर भविष्य के लिए दिन-रात काम करेगी। महिलाएँ सुरक्षित रहेंगीं, व युवाओं को नौकरियाँ मिलेंगी।” केरल में 2026 के विधान सभा चुनावी नतीजों के बाद डा. शशि थरूर ने ‘एक केरल कहानी’ पर रोशनी डाली। थरूर ने X पर एक पोस्ट में केरल को ‘सांप्रदायिक सद्भाव का मॉडल’ बताया’। अपनी पोस्ट में, उन्होंने हाल के चुनावों की ओर ध्यान दिलाया, जहाँ कांग्रेस के नेतृत्व वाला UDF यूडीएफ सत्ता में आया, व देश में वामपंथ के आखिरी गढ़ से उसे बेदखल कर दिया। मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्र, थानवनूर ने एक ईसाई, वी.एस.जॉय को चुना; हिंदू बहुल निर्वाचन क्षेत्र, कलामस्सेरी ने एक मुस्लिम, मुहम्मद शियास को चुना गया है। थरूर ने कहा कि इससे पता चलता है कि “केरल सांप्रदायिक सद्भाव का एक मॉडल बना हुआ है,” और इसे “एक ऐसा राज्य बताया जहाँ लोग सबसे पहले इंसानियत देखते हैं, व जाति या धर्म को बाद में।”

2026 के चुनाव नतीजे इस बात का भी संकेत हैं कि लगभग 50 वर्षों में यह पहली बार है कि किसी भी भारतीय राज्य में कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाली सरकार सत्ता में नहीं है। 2026 के असम विधानसभा चुनावों में, भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने भारी जीत के साथ लगातार तीसरी बार ऐतिहासिक कार्यकाल हासिल किया। गठबंधन ने 126 में से 102 सीटें जीतीं, जिसमें BJP ने अकेले 82 सीटें हासिल करके पहली बार पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। इस चुनाव में 85.96% मतदाताओं की रिकॉर्ड भागीदारी देखी गई, जो पूरे राज्य में जनता की ज़बरदस्त सक्रियता को दर्शाता है। 2023 में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के नए सिरे से निर्धारण ने परिणामों को काफ़ी हद तक प्रभावित किया; इसने उन सीटों की संख्या को लगभग 35 से घटाकर 22 कर दिया, जहाँ अल्पसंख्यक मतदाताओं (विशेषकर बंगाली मूल के मुसलमानों) की निर्णायक भूमिका थी। मुस्लिम वोट कांग्रेस के पक्ष में एकजुट हो गए, लेकिन ऊपरी असम और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में एनडीए की ज़बरदस्त जीत का मुक़ाबला करने के लिए यह पर्याप्त नहीं था। गौरव गोगोई जैसे कद्दावर नेताओं का जोरहाट से अपनी सीट हारना, विपक्ष की चुनौतियों को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) द्वारा उपलब्ध कराए गए आँकड़े 2026 के विजयी उम्मीदवारों का विस्तृत ब्योरा प्रस्तुत करते हैं: वित्तीय स्थिति:- विजयी विधायकों की औसत संपत्ति का मूल्य बढ़कर ₹8.82 करोड़ हो गया है, जो 2021 में ₹4.59 करोड़ था। लगभग 85% विजयी उम्मीदवार करोड़पति हैं। आपराधिक रिकॉर्ड: जिन उम्मीदवारों ने अपने ऊपर आपराधिक मामले घोषित किए थे, उनकी जीत के प्रतिशत में एक उल्लेखनीय गिरावट देखी गई; यह 2021 में 27% से घटकर 2026 में 17% रह गया। विश्लेषकों ने पारंपरिक सामाजिक विभाजनों, जैसे कि असमिया और बंगाली बोलने वालों के बीच के विभाजन के “सपाट” होकर, एक अधिक तीखे हिंदू-मुस्लिम चुनावी विभाजन में बदलने की बात कही। जहाँ एक ओर कांग्रेस ने मुस्लिम-बहुल सीटों पर अपना दबदबा बनाए रखा, वहीं दूसरी ओर अन्य क्षेत्रों में उसका लगभग पूरी तरह से सफाया हो गया। भारतीय राज्यों के चुनावों में नरेंद्र मोदी की जीत का देश के लोकतंत्र के लिए क्या अर्थ हो सकता है? दूसरी ओर केरल, तमिलनाडू में अभी कमल नहीं खिला। सारांंशार्थ, चुनावों में साम
धाम, दंड, भेद, धन, गन, सभी का प्रयोग किया जाता है, और जनता को क्या लाभ हुआ, इसका निर्णय जनता के हाथ में ही है।

प्रो. नीलम महाजन सिंह (वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक, अंतर्राष्ट्रीय सामयिक विशेषज्ञ, दूरदर्शन व्यक्तित्व व सालिसिटर फाॅर ह्यूमन राइट्स)