संजय सक्सेना
12 मई 2026 को तमिलनाडु विधानसभा में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने करोड़ों सनातनियों की भावनाओं को गहरी ठेस पहुँचाई। डीएमके नेता और नवनिर्वाचित नेता प्रतिपक्ष उदयनिधि स्टालिन ने विधानसभा में नये मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के सामने खड़े होकर यह कहा कि सनातन धर्म लोगों को बांटने का काम करता है, इसलिए इसे जड़ से मिटा देना चाहिए। यह बयान किसी साधारण मंच पर नहीं, बल्कि एक संवैधानिक सदन में दिया गया, जो इसकी गंभीरता को और अधिक बढ़ा देता है। नेता प्रतिपक्ष के रूप में यह उनका पहला आधिकारिक भाषण था, जिसमें उन्होंने द्रविड़ विचारधारा को सदन में मजबूती से रखने के उद्देश्य से यह तीखा रुख अपनाया। वहीं नये-नवेले मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने उदयनिधि के बयान पर ठंडा रुख अख्तियार करके साबित कर दिया कि उन्हें उदयनिधि की सोच से कोई फर्क नहीं पड़ता है। यह पहली बार नहीं है जब उदयनिधि ने ऐसा जहर उगला हो। सितंबर 2023 में उन्होंने सनातन धर्म को डेंगू, मलेरिया और कोरोना जैसी बीमारियों की संज्ञा देते हुए कहा था कि जिस तरह इन बीमारियों को खत्म करना जरूरी है, उसी तरह सनातन धर्म को भी समूल नष्ट कर देना चाहिए। उस बयान के बाद देशभर में भारी विरोध हुआ और मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा। सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट ने उनके बयान पर कड़ी टिप्पणी की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एक मंत्री होने के नाते उन्हें अपने शब्दों की जिम्मेदारी समझनी चाहिए। लेकिन इन सबके बावजूद उदयनिधि न केवल बेखौफ रहे, बल्कि डीएमके सरकार ने पुराने बयान पर कोई कार्रवाई करने की बजाय उन्हें प्रमोशन देकर डिप्टी सीएम बना दिया था। और अब, विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने के बाद भी उनकी अकड़ ढीली नहीं हुई और उन्होंने वही बयान दोहरा दिया।
खैर, तमिलनाडु की राजनीति में सनातन धर्म के प्रति यह विरोध किसी अचानक उभरी प्रवृत्ति का नाम नहीं है। उदयनिधि स्टालिन का यह भी कहना है कि तमिलनाडु में पिछले 100 सालों से सनातन धर्म के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं और वे अगले 200 सालों तक भी इसके खिलाफ बोलना जारी रखेंगे। यह बयान द्रविड़ आंदोलन की उस विचारधारा की जड़ों से जुड़ा है जिसकी नींव पेरियार और अन्नादुरई जैसे नेताओं ने रखी थी। तमिलनाडु में जिस तरह की राजनीति का बोलबाला है, उसमें हिंदू धर्म की आलोचना को प्रगतिशील राजनीति का प्रतीक माना जाता है। एक वरिष्ठ मंत्री बहुसंख्यक धर्म के खिलाफ इतना अपमानजनक बयान दे और फिर भी बिना किसी राजनीतिक नुकसान के कुर्सी पर बना रहे, यही तमिलनाडु की राजनीतिक संस्कृति की वास्तविकता है। हालाँकि हाल के विधानसभा चुनाव में डीएमके को भारी हार का सामना करना पड़ा, जो यह दर्शाता है कि तमिलनाडु की जनता का एक बड़ा वर्ग अब इस राजनीति से ऊब चुका है। नई सरकार थलपति विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कषगम के नेतृत्व में बनी है, जो इस बात का संकेत है कि प्रदेश में सनातन विरोध की राजनीति को जनता ने अस्वीकार करना शुरू किया है। फिर भी, डीएमके का वही रवैया बरकरार है जो दशकों से चला आ रहा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि सनातन धर्म के विरुद्ध यह राजनीतिक अभियान केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला का आरोप है कि कांग्रेस, टीएमसी, राजद, सपा और डीएमके का एक ही प्लान है सनातन हिंदू का अपमान और वोट बैंक की दुकान। यह आरोप हवाई नहीं है, क्योंकि इन दलों के नेताओं के बयानों की एक लंबी फेहरिस्त है। समाजवादी पार्टी के सांसद अफजल अंसारी ने महाकुंभ 2025 को लेकर व्यंग्य करते हुए कहा था कि अगर कुंभ स्नान से सच में पाप धुलते हैं तो नरक तो खाली हो जाएगा। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी महाकुंभ को लेकर विवादित बयान देते हुए सनातन धर्म की मान्यताओं पर कटाक्ष किया और यहाँ तक कह दिया कि महाकुंभ जैसी कोई चीज है ही नहीं।
तेलंगाना के कांग्रेस मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करते हुए हिंदू देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जो लोग दो शादी करते हैं उनके लिए अलग भगवान हैं और जो शराब पीते हैं उनके लिए अलग भगवान हैं। कमल हासन ने भी राज्यसभा सांसद बनने के बाद एक कार्यक्रम में दावा किया कि शिक्षा ही वह एकमात्र हथियार है जो तानाशाही और सनातन धर्म की जंजीरों को तोड़ सकती है। राजद की राजनीति भी इस मामले में कम आक्रामक नहीं रही। मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए लालू प्रसाद यादव ने सनातन विरोधी राजनीति को अपने दल की पहचान बनाया और आडवाणी को जेल में डालने जैसे कदम उठाए। इन तीनों दलों की रणनीति स्पष्ट है कि मुस्लिम और दलित वोट बैंक को एकजुट करने के लिए सनातन धर्म को निशाना बनाओ, उसे जाति-आधारित उत्पीड़न का प्रतीक बताओ और प्रगतिशील राजनीति का चेहरा पेश करो। इस पर अधिकांश विपक्षी दलों ने रचनात्मक विकल्प देने की बजाय हिंदू द्वेष को ही अपनी रणनीति का केंद्र बना लिया। उनकी चुनावी राजनीति इस धारणा पर टिकी है कि सनातन धर्म का विरोध कर वे अपने अल्पसंख्यक वोट बैंक को मजबूत बना सकते हैं। इस रणनीति का मकसद हिंदू धर्म को बदनाम करना और उससे जुड़े मुद्दों को अविश्वसनीय ठहराना है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब किसी अन्य धर्म के बारे में ऐसा बयान दिया जाए तो देश में भूचाल आ जाता है, लेकिन सनातन धर्म के विरुद्ध खुलेआम उन्मूलन की बात करने पर कानूनी शिकंजा क्यों नहीं कसता? भारतीय दंड संहिता की धारा 295-ए धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर आहत करने को दंडनीय अपराध मानती है। इसके अलावा धारा 153-ए धर्म, जाति, भाषा के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता बढ़ाने पर दो साल तक की सजा का प्रावधान करती है। लेकिन इन धाराओं का प्रयोग सनातन के अपमानकर्ताओं के खिलाफ शायद ही कभी प्रभावी ढंग से हो पाता है। बता दें, भारतीय संविधान देश को एक पंथनिरपेक्ष लोकतंत्र घोषित करता है और विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। लेकिन यही पंथनिरपेक्षता एकतरफा होकर रह जाती है, जब एक धर्म विशेष को निशाना बनाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दूसरे धर्म की आलोचना सांप्रदायिक मान ली जाती है। समस्या यह है कि धर्म के विरुद्ध घृणा और जातिगत व्यवस्था की आलोचना के बीच की रेखा को अदालतें बहुत ढीले ढंग से व्याख्यायित करती हैं। इसी कारण राजनेता सनातन को सीधे निशाने पर लेकर भी कानूनी पकड़ से बाहर निकल जाते हैं।
जहाँ तक भाजपा सरकार के 12 साल के कार्यकाल का सवाल है, तो सरकार ने भारतीय न्याय संहिता के रूप में नई आपराधिक संहिता लागू की, लेकिन धार्मिक भावनाओं को आहत करने से संबंधित प्रावधान मूल रूप में ही रहे। कोई नया विशेष कानून नहीं बना जो विशेष रूप से सनातन धर्म के अपमान पर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित कर सके। हाँ, एनएसए और यूएपीए का प्रयोग धार्मिक उग्रवाद रोकने के लिए जरूर हुआ, पर राजनेताओं के बयानों पर यह हथियार नहीं चला। जब तक संसद में स्पष्ट कानून नहीं बनता जो किसी भी धर्म के उन्मूलन की माँग करने वाले बयान को राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा मानकर अभियोजन का आधार बनाए, तब तक यह खेल यूँ ही चलता रहेगा। किसी को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि सनातन धर्म भारत की सभ्यता का मूल आधार है। यह किसी राजनीतिक दल की सम्पत्ति नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आस्था, संस्कृति और जीवन-दर्शन है। इसके विरुद्ध हर बार उठने वाली आवाज़ें जब दण्डमुक्त रहती हैं, तो यह लोकतंत्र और संविधान दोनों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती हैं। समय आ गया है कि राजनीतिक लाभ के लिए धर्म को अपमानित करने की इस प्रवृत्ति पर संसद, न्यायपालिका और समाज तीनों एकजुट होकर लगाम लगाएँ। वहीं, सनातन धर्म मानने वालों को भी ऐसी घटनाओं का अपने स्तर पर जोरदार विरोध करना चाहिए।





