मिट्टी की जीवंतता बनाम नियंत्रित खेती का भ्रम: विकास या प्रकृति से विच्छेद

The Vitality of Soil vs. the Illusion of Controlled Farming: Development or Disconnection from Nature

हाइड्रोपोनिक्स बनाम मिट्टी: विकास का नया अध्याय या प्रकृति से संवाद का संकट?

डॉ राजाराम त्रिपाठी कृषि तथा ग्रामीण अर्थशास्त्र विशेषज्ञ एवं “अखिल भारतीय किसान महासंघ” (आईफा) के राष्ट्रीय संयोजक

  • हाइड्रोपोनिक्स की लागत प्रति एकड़ 50 लाख से 2 करोड़ तक पहुँचती है, पारंपरिक खेती कुछ हजारों ज्यादा से ज्यादा एक दो लाख में संभव ,
  • औषधीय,सुगंधीय पौधों के सक्रिय तत्व मिट्टी और जलवायु से 30 से 200 प्रतिशत तक बदलते हैं,
  • खुले खेत का पालक 10 से 20 रुपये प्रति किलो जबकि नियंत्रित प्रणाली में 60 से 120 रुपये तक,
  • यह तकनीक व्यापक समाधान नहीं बल्कि सीमित वर्ग की विशेष खेती/स्टेटस सिंबल बनती जा रही है,

कृषि के इतिहास में यह पहली बार नहीं है कि मनुष्य ने प्रकृति को सुधारने, नियंत्रित करने का दावा किया हो। हरित क्रांति से लेकर रासायनिक उर्वरकों तक और पालीहाउस के बाद अब हाइड्रोपोनिक्स तक, हर दौर में यह विश्वास दोहराया गया है कि हम प्रकृति से बेहतर व्यवस्था बना सकते हैं। आज कहा जा रहा है कि खेती के लिए अब मिट्टी की आवश्यकता समाप्त हो चुकी है और केवल घोल में घुले सत्रह तत्व ही पर्याप्त हैं। खेतों की जगह पाइप, टंकियाँ और कृत्रिम रोशनी ले सकती हैं। प्रश्न यह नहीं है कि यह संभव है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या यह पर्याप्त है और क्या यह आवश्यक है।

मैं विज्ञान का विद्यार्थी और समर्थक रहा हूँ। हमने अपने खेतों को प्रयोगशाला बनाया और निरंतर प्रयोग किए। ‘माँ दंतेश्वरी काली मिर्च-16 जैसी किस्म विकसित की जिसे दक्षिण भारत से निकालकर मध्य और उत्तरी भारत में स्थापित किया। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में हमने प्रकृति के साथ संवाद बनाए रखा। प्रकृति किसी सीईओ के आदेश पर चलने वाली प्रयोगशाला नहीं है। वह समय लेती है पर स्थायित्व देती है। जब भी हमने संतुलन तोड़ा है तब उसके दुष्परिणाम सामने आए हैं।

पौधा केवल नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का समीकरण नहीं है। मिट्टी में करोड़ों सूक्ष्मजीव, फंजाई और बैक्टीरिया मिलकर एक जटिल जीवंत तंत्र बनाते हैं। यही तंत्र पौधों के स्वाद, पोषण और औषधीय गुणों को निर्धारित करता है। अश्वगंधा, तुलसी या सर्पगंधा जैसे पौधों में जरूरी सक्रिय औषधीय तत्व मिट्टी और जलवायु के अनुसार बदलते हैं। कई बार यह अंतर तीस से दो सौ प्रतिशत तक पहुँच जाता है। यदि हम केवल नियंत्रित घोल से किसी एक आवश्यक तत्व को बढ़ाने का प्रयास करें तो अन्य तत्वों के असंतुलन का खतरा स्वाभाविक है।

इसी बीच एक और प्रवृत्ति तेजी से उभरी है जो अधिक चिंताजनक है। सोशल मीडिया पर ऐसे उदाहरणों की बाढ़ आ गई है जिनमें बताया जाता है कि अमुक ने 50 लाख सालाना पैकेज की नौकरी छोड़कर माइक्रोग्रीन्स या हाइड्रोपोनिक्स से एक वर्ष में करोड़ों का कारोबार खड़ा कर लिया। यह कथाएँ प्रेरणा से अधिक भ्रम पैदा कर रही हैं। दुखद यह है कि इन्हें वही मंच बढ़ा रहे हैं जो स्वयं को कृषि का विश्वसनीय स्रोत बताते हैं। किसान और खेती में अपना आगामी भविष्य देखने वाला युवा इन्हें सच मानकर दिशा तय करते हैं और यहीं से उनका भटकाव शुरू हो जाता है। यह हमारे आने वाली युवा पीढ़ी के भविष्य लिए, इस देश की खेती के भविष्य के लिए ,और देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए भी खतरनाक है।

इसके साथ ही इनके द्वारा इस तरह की रातों-रात करोड़ों कमा कर देने वाली नई नई खेती का ऑनलाइन प्रशिक्षण का एक नया कारोबार शुरू कर दिया गया है। केवल कुछ हजार रुपये लेकर मोबाइल पर खेती सिखाने के दावे किए जा रहे हैं।

माइक्रोग्रीन्स, हाइड्रोपोनिक्स , लाखों रुपए किलो वाली कीड़ाजड़ी, लाखों रुपए किलो वाली औषधि मशरूम, लाखों रुपए वाली केसर की खेती से लेकर स्पिरुलिना उगाने तक और बकरी पालन से लेकर मोती की खेती तक सब कुछ केवल कुछेक घंटों में सिखाने का वादा किया जाता है।रहा है। बिना खेत खलिहान के खेती सिखाने की यह प्रवृत्ति एक नई विडंबना है। इससे वास्तविक किसानों को कितना लाभ हो रहा है यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन इतना निश्चित है कि यह एक अलग तरह का व्यवसाय बन चुका है। और यह रातों-रात बिना मेहनत के पैसे कमाने के तरीकों में जुड़ गया है।

जब हम लागत पर आते तो हैं तो वास्तविकता और प्रचार के बीच का अंतर साफ दिखाई देता है। एक एकड़ हाइड्रोपोनिक्स स्थापित करने में जहाँ भारी पूंजी की आवश्यकता होती है, वहीं पारंपरिक खेती बहुत कम लागत में संभव है। यह अंतर केवल तकनीक का नहीं है बल्कि खेती की आत्मा का है। किसान धीरे धीरे उत्पादक से निवेशक में बदलता दिखाई देता है। खुले खेत में उगाया गया पालक जहाँ सामान्य लागत में तैयार हो जाता है वहीं मंहगी नियंत्रित प्रणाली में इसकी लागत कई गुना बढ़ जाती है। यह अलग बात है कि इस तरह से उगाए गए माइक्रोग्रीन्स को, इसमें उगाई गई सब्जियों को ‘सुपरफूड’ जैसे आकर्षक नामों से प्रचारित प्रसारित, आक्रामक विपणन प्रणाली के जरिए एलीट क्लास को महंगी दामों पर बेचने में सफल भी हो जाते हैं। यह वर्ग स्वास्थ्य के नाम पर पैसा खर्च करने में हिचकता भी नहीं है।

लेकिन ऐसे में महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि क्या यह मॉडल उस देश के लिए उपयुक्त है जहाँ की मुख्य आबादी लगभग 80 करोड़ परिवार अनुदान के 5- पांच किलो चावल और सस्ती खाद्य सामग्री पर निर्भर हैं।

इसी संदर्भ में प्रकृति आधारित नवाचारों की आवश्यकता और भी स्पष्ट हो जाती है। जैसे कि मां दंतेश्वरी हर्बल समूह द्वारा बस्तर के कोंडागांव में विकसित नेचुरल ग्रीनहाउस इसका एक व्यावहारिक उदाहरण है। यह पेड़ों और प्राकृतिक संरचना पर आधारित है। इसकी लागत 40 लाख के पाली हाउस की तुलना में केवल₹1 लाख रुपए यानी कि अत्यंत कम है और यह अपने भीतर कई समाधान समाहित करता है। यह प्राकृतिक छाया देता है, पत्तियों से स्वतः हरी खाद बनती है, नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता है और जल संचयन की प्रक्रिया भी साथ चलती है। यह तकनीक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से लड़ने में भी सक्षम है और बाहरी ऊर्जा पर निर्भरता कम करती है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि यह किसान को प्रकृति के साथ जोड़ती है, उससे दूर नहीं करती। और इसके साथ ही प्रति एकड़ लाखों रुपए की सालाना आमदनी भी देती है।

इसके साथ ही हाइड्रोपोनिक्स तथा नवीन कृषि तकनीकों को पूरी तरह नकारना भी उचित नहीं है। यह तकनीकें कुछ विशेष परिस्थितियों में निश्चित रूप से उपयोगी हो सकती हैं , विशेषकर जहाँ भूमि और मिट्टी का अभाव हो या उच्च मूल्य की विशिष्ट फसलों की आवश्यकता हो। भविष्य में अंतरिक्ष में , चंद्रगृह अथवा मंगल ग्रह पर मानव बस्तियां बसाने की दशा में अत्यंत नियंत्रित वातावरण में इसकी उपयोगिता और बढ़ सकती है। इसलिए इन पर और शोध जरूरी है। लेकिन इसे कृषि का सार्वभौमिक समाधान बताना वास्तविकता से दूर है।

विशेष रूप से भारत जैसे देश, जहां की प्रति व्यक्ति आय अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अप्रैल 2026 के आंकड़ों के अनुमान के अनुसार लगभग 2,813 डॉलर (भारतीय रुपये में लगभग ₹2.35 से ₹2.45 लाख के बीच) रहने का अनुमानित है और विश्व में हमें 150वें पायदान पर रखती है। यहां एक एकड़ पर करोड़ों रुपए निवेश की खेती का यह माडल फिलहाल तो गरीबों की बस्ती में लगाए गए मीना बाजार की तरह ही है।

एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यह बहस दरअसल मिट्टी और हाइड्रोपोनिक्स के बीच नहीं है। यह नियंत्रण और सह अस्तित्व के बीच की बहस है। यदि हम कृषि को केवल उत्पादन का माध्यम मानेंगे तो हम शायद उत्पादन की मात्रा भी कुछ और बढ़ा लें, लेकिन यदि हम इसे प्रकृति के साथ संबंध के रूप में देखेंगे तभी हम स्थायित्व और गुणवत्ता दोनों को बचा पाएंगे। विज्ञान और परंपरा का संतुलित संवाद ही भविष्य का मार्ग है। संतुलन, विवेक और दूरदृष्टि ही सच्चे अर्थों में कृषि तथा पर्यावरण दोनों को सही दिशा दे सकते हैं। यही सच्चा विज्ञान है और यही सच्ची कृषि।