प्रयाग पाण्डे
यूँ तो विश्व में तीर्थाटन का इतिहास बहुत पुराना है। भारत में तीर्थ और पर्यटन का घनिष्ठ संबंध रहा है। यहाँ तीर्थाटन एवं धार्मिक पर्यटन की प्राचीन परंपरा है। प्राचीनकाल में पर्यटन की शुरुआत तीर्थाटन, व्यावसायिक एवं साहसिक यात्राओं से ही हुई थी। उस दौर में तीर्थ यात्रा की भावना मन और विचारों की पवित्रता से जुड़ी थी। श्रद्धालु शांति की खोज, पापों के प्रायश्चित और निर्वाण के निमित्त तीर्थयात्राएं किया करते थे। तीर्थयात्रियों को तीर्थ स्थलों में मानसिक शांति और आध्यात्मिक सुख की अनुभूति होती थी। तीर्थाटन को सांसारिक परेशानियों एवं चिंताओं से मुक्ति पाने का उपक्रम माना जाता था। तब तीर्थ यात्राओं के लिए न्यूनतम सुविधाओं की आवश्यकता होती थी। तीर्थ यात्रा साधना के समतुल्य मानी जाती थी। श्रद्धालु कठिनतम तीर्थ यात्राएं किया करते थे। तब तीर्थ यात्रा के संबंध में कहा जाता था- “जितनी कठिन यात्रा, उतना ही उत्तम फल।”
आज के दौर में मानव जीवन में व्यापारीकरण और भौतिकवाद बढ़ता चला जा रहा है। विलासप्रियता के चलते अब तीर्थ एवं धार्मिक पर्यटन में भी आनंद एवं आराम की चाहत होने लगी है। जिसके कारण तीर्थाटन एवं धार्मिक पर्यटन का मूल आधार तेजी से बदल रहा है। आधुनिक युग में तीर्थ भी “सर्वसुविधायुक्त आनंददायक यात्रा” हो गई है। धर्म स्थलों की यात्रा का प्रेरक तत्व धर्म से अधिक देखादेखी, मौजमस्ती और सैर-सपाटा हो गया है।
धर्म स्थलों में आस्था के नाम पर उमड़ने वाली अनियंत्रित भीड़ के कारण पारिस्थितिकी संतुलन गड़बड़ाने लगा है। वायु एवं ध्वनि प्रदूषण से वातावरण प्रदूषित हो रहा है। भीड़भाड़ और कोलाहलपूर्ण वातावरण से नाजुक पर्यावरण संतुलन बिगड़ गया है। स्थानीय संशाधनों में अत्यधिक दबाव पड़ने लगा है। आए दिन लगने वाले वाहनों के लंबे जाम के कारण स्थानीय निवासियों की दैनंदिन की गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित होने लगी हैं। आवागमन पर बुरा प्रभाव पड़ने लगा है। धर्म स्थलों की वहन क्षमता से कई गुना अधिक लोगों के आने से धर्म स्थलों की पचाने की क्षमता क्षीण होने लगी है। चकाचौंध कर देने वाले अल्पावधि के इस अनियंत्रित पर्यटन के कारण संवेदनशील एवं चैतन्य पर्यटकों का आगमन कम होने लगा है। जिससे टिकाऊ और लाभकारी पर्यटन प्रभावित हो रहा है।
यह स्थापित सत्य है कि अनियंत्रित एवं अनियोजित पर्यटन से लाभ के बजाय हानि अधिक होती है। अल्पकालिक सैर- सपाटा पर्यटन से लाभ नहीं,बल्कि विशुद्ध हानि ही होती है। ऐसे पर्यटन से भौतिक, पर्यावरणीय, सामाजिक एवं कानून- व्यवस्था की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। यदि उत्तराखंड में पर्यटन उद्योग को टिकाऊ, दीर्घजीवी और लाभकारी बनाना है तो पर्यटकों की संख्या पर अंकुश लगाना आवश्यक है, भले ही वह धार्मिक या तीर्थ पर्यटन ही क्यों न हो।





