अभिमान करने से सभी गुणों का महत्व खत्म होता है

Arrogance nullifies the value of all virtues

गोवर्द्धन दास बिन्नाणी “राजा बाबू”

सबसे पहले , भारतीय संस्कृति के ध्वज वाहक रहे स्वामी विवेकानन्द जी के प्रेरणा पुँज एवं माता कालीजी के अनन्य उपासक, मानवता के पुजारी, महान सन्त, आध्यात्मिक गुरु एवं विचारक श्री रामकृष्ण परमहँसजी को उनकी १४०वीं पुण्यतिथि पर शत-शत नमन।

परमहँसजी की साधना करने का एक अपना अलग ही अन्दाज रहा है । उसी साधना का ही परिणाम यह रहा कि उन्होनें अपने निष्कर्ष के आधार पर बता दिया कि संसार के सभी धर्म सच्चे हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं। वे ईश्वर तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न साधन मात्र हैं।इसलिये जो लोग घमण्ड करते हैं उनका सारा ज्ञान व्यर्थ है, इस बुराई की वजह से सबकुछ खत्म हो सकता है।अब मैं इसी तथ्य से सम्बन्धित एक प्रेरक कथा आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ जो इस प्रकार है —

एक बार जोरदार ठण्ड के मौसम में श्री रामकृष्ण परमहँसजी किसी सन्त के साथ बैठे हुए धर्म और अध्यात्म पर चर्चा कर रहे थे। चर्चा करते करते संध्या हो गयी जिसके चलते ठण्ड कुछ तेज हो गयी। चूँकि दोनों सन्त धर्म और अध्यात्म पर चर्चा कर रहे थे इसलिये वे उस चर्चा को बीच में ही रोकना नहीं चाहते थे। इस कारण से जिस सन्त के यहाँ बैठे थे उन्होनें ठण्ड से बचने के लिए कुछ लकड़ियाँ इकट्ठा कर धूनी जला दी। इनसे कुछ दूर एक गरीब व्यक्ति भी बैठा हुआ इन्हें निहार रहा था। ठण्ड तो उसे भी लग रही थी। इसलिये उसने भी इनकी देखा देखी कुछ लकड़ियाँ एकत्रित कर लीं। लेकिन उसके पास लकड़ी जलाने के लिए कोई साधन तो था नहीं और उसे अब आग की जरूरत थी। इसलिये उसने बिना कुछ विचार किये तुरन्त ही दोनों सन्तों के पास पहुँच धूनी से जलती हुई लकड़ी का एक टुकड़ा उठा लिया।

अब जैसे ही उस व्यक्ति ने सन्त द्वारा जलाई गई धूनी को छूआ तो सन्त को गुस्सा आ गया और वे उसे भला-बुरा कहने लग गये। सन्त ने कहा कि तू पूजा-पाठ नहीं करता है, भगवान का ध्यान नहीं करता, तेरी हिम्मत कैसे हुई, तूने मेरे द्वारा जलाई गई धूनी को कैसे छू लिया।​​​​​​​

रामकृष्ण परमहँसजी यह सब कृत्य देख अपने स्वभाव अनुसार अपनी चिर परिचित मुस्कुराहट को रोक नहीं पा रहे थे और उधर जब सन्त ने परमहँसजी को प्रसन्न देखा तो उनका गुस्सा कम होने की बजाय और बढ़ गया।

उन्होंने परमहँसजी से कहा, ‘आप इतना प्रसन्न क्यों हैं ? यह व्यक्ति अपवित्र है, इसने गन्दे हाथों से मेरे द्वारा जलाई गई अग्नि को छू लिया है तो क्या मुझे गुस्सा नहीं होना चाहिये ?’​​​​​​​​​​​​​​

परमहँसजी ने कहा, “मुझे नहीं मालूम था कि कोई चीज छूने से अपवित्र हो जाती है।अभी आप ही ‘एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति’ कह कर मुझे ज्ञान दे रहे थे कि समस्त विश्व एक ही परब्रह्म से प्रकाशमान है।और थोड़ी ही देर बाद आप ये बात खुद ही भूल गए।” उन्होंने आगे कहा, ‘दरअसल इसमें आपकी गलती नहीं है। आपका शत्रु आपके अन्दर ही है, वह है दम्भ। घमण्ड की वजह से हमारा सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता है। इस बुराई पर काबू पाना बहुत मुश्किल है।’​​​​​​​

इस तरह एक छोटी सी घटना के माध्यम से ही उन्होनें संसार को जता दिया कि जो लोग अभिमान करते हैं, उनके दूसरे सभी गुणों का महत्व खत्म हो जाता है। इस बुराई की वजह से सब कुछ बर्बाद हो सकता है। इसलिये आवश्यकता इस बात की है कि अहंकार से बचने की हमेशा चेष्टा करते रहने में ही अपनी भलाई रहेगी ।