मनोहर मनोज
बुनियादी क्षेत्र में सरकारी निवेश को प्राथमिकता देना मोदी सरकार की पहचान और उसकी यूएसपी बताई जाती है। पिछले एक दशक में रेल और राजमार्ग इन दो बुनियादी क्षेत्रों के लिए मोदी सरकार ने अपनी निवेश बढ़ोत्तरी के लिए काफी वाहवाही भी बटोरी है । इस क्रम में पिछले एक दशक के दौरान रेलवे में करीब 3 लाख करोड़ का निवेश हुआ तो दूसरी तरफ राजमार्गों के निर्माण में हर वर्ष 2 से 3 लाख करोड़ का निवेश हो रहा है जिसमे प्रतिदिन औसत 35-40 किलोमीटर तक देश में राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण हो रहा है जो एक दशक पूर्व महज 15 किलोमीटर था। इस वजह से देश में राजमार्गो की लम्बाई 90 हज़ार किलोमीटर से बढ़कर 1.46 लाख किलोमीटर हो गयी है।
पहले बात करें रेलवे में निवेश की तो वह किसी दीर्घकालीन नीति और भविष्य की इकनोमिक वाइबिलिटी यानी आर्थिक व्यवहार्यता को ध्यान में रखकर नहीं किया जा रहा है। रेलवे में अप्रत्याशित रूप से सरकार कई गुना ज्यादा निवेश कर रही है बिना इसका हिसाब लगाए की इससे सरकार को भविष्य में रिटर्न क्या मिलेगा? इसके उलट रेलवे के बुनियादी निर्माण कार्य में सरकार निजी क्षेत्र के लिए खोलने के बजाये सरकार की एकाधिकारी स्थिति बनाये हुए है और बिना किसी निवेश नीति के समूचा निवेश स्वयं कर रही है। जबकि आशंका इस बात की प्रबल है सरकार द्वारा समूची रेल अधोसंरचना दुरुस्त कर भविष्य में निजी क्षेत्र को प्लैटर में परोस ना दिया जाए। जैसे की कुछ विशिष्ट ट्रेनों के परिचालन निजी क्षेत्र को सौप दिए गए है । परन्तु निजी क्षेत्र को रेल ट्रैक की लम्बाई अगले पचास सौ साल की जरुरत को ध्यान में रखकर निजी क्षेत्र को बिल्ड ऑपरेट लीज ट्रांसफर या राजस्व हिस्सेदारी के मॉड्यूल पर आमंत्रित करना चाहिए। लेकिन सरकार रेलवे की आधुनिक ट्रेनों के परिचालन और सिग्मेंट गतिविधियों को निजी हाथों में दे रही है पर टेलिकॉम क्षेत्र की बुनियादी संरचना के निर्माण में भारी निवेश की तर्ज़ पर उन्हें रेलवे में आमंत्रित नहीं किया जा रहा है। ऐसे में सवाल यही उठता है की जब भविष्य में रेलवे में निजी क्षेत्र को बुलाना है तो फिर अभी से निजी कंपनियों को टेलीकॉम अधोसंरचना की तर्ज़ पर एक नयी रेल निवेश नीति के तहत रेल ट्रैक से लेकर तमाम बुनियादी गतिविधियों में आमंत्रित किया जाए। मोदी सरकार ने पिछले एक दशक से रेलवे में जो करीब ढाई- तीन लाख करोड़ का निवेश किया है उसके तहत रेलवे का लगभग शत प्रतिशत विद्युतीकरण करने के साथ रेल लाइनों का दोहरीकरण, देश के अधिकतर स्टेशनों का निर्माण, मरम्मत और आधुनिकीकरण व्यापक पैमाने पर किया गया है। रेलवे किराए में पिछले दो दशक से सरकार ने मामूली बढ़ोत्तरी ही की है। रेल मंत्रालय द्वारा रेल टिकट पर यह उल्लिखित किया जाता है की वह यात्रियों से कुल रेल परिवहन लागत की केवल 57 फीसदी राशि ही आरोपित करती है। भारतीय रेलवे अपनी यात्री सेवाओं को अपनी माल परिवहन की कमाई के क्रॉस सब्सिडाइजेशन पर संचालित करती है। सवाल ये है की मोदी सरकार की रेलवे के आर्थिक परिचालन , दीर्घकालीन मांग और मौजुदा निवेश की भारपाई को लेकर कोई नीति वक्तव्य या दस्तावेज लेकर कभी क्यों नहीं आयी।
हाल के वर्षों में सरकार के निवेश से रेलवे की अवसंरचना काफी बेहतर हुई है। कई स्टेशन फाइव स्टार होटल की तरह हो गए हैं , पर इसका भविष्य में रेवेन्यू मॉडल क्या होगा, किसी को पता नहीं। एक तरफ मोदी सरकार मुनाफे वाली सार्वजानिक उपक्रमों के परिचालन बोझ से अपने को मुक्त रखकर उन्हें विनिवेश सूची में रखने की नीति पर चलती है दूसरी तरफ साकार के सबसे बड़े व्यावसायिक उपक्रम रेलवे को इससे वंचित रखे हुए है। इसका नतीजा है की देश में लम्बी दुरी की रेल सेवाओं में मांग के हिसाब से टिकट की उपलब्धता बिलकुल ही नहीं होती है। हर ट्रेन में प्रतीक्षा सूची काफी लम्बी है। बेहतर होगा की रेल किराये में सरकार थोक मुद्रा स्फीति के हिसाब से सालाना 2 -3 फीसदी किराये में बढ़ोत्तरी करे तथा रेलवे को अंग्रेजो के समय के दंडात्मक तरीके के बजाये अधिक से अधिक राजस्व कमाई का अप्रोच अपनाये। रेलवे का यात्री सेवाओं से मौजूदा राजस्व महज 90 हज़ार करोड़ प्राप्त होता है जिसे किराये में मामूली बढ़ोत्तरी, विभिन्न उपनगरीय ट्रेन सेवाओं के किराये को युक्तिसंगत बनकर, टीटी और दलालों के भ्रष्टाचार से मुक्त कर और रेल राजस्व के अधिकाधिक आउटलेट बनाकर रेलवे की मॉल सेवाओं के डेढ़ लाख करोड़ के राजस्व के बराबर तक लाया जा सकता है।\सरी तरफ देश में राजमार्गों का भी देश में तेजी से निर्माण हो रहा है। इसका मॉडल अलग है की इस पर वहां निजी और सरकारी दोनों चलेंगे पर सड़क निर्माण चाहे सरकार करें और कुछ जगह पर निजी क्षेत्र करें ,उस पर सड़क यूजर चार्ज यानी टोल की वसूली करेगी। पर सरकार की सार्वजनिक उपक्रम एनएचएआई राजमार्गो के निर्माण और रखरखाव पर जो खर्च कर रही है उसकी तुलना में ठेकेदारों के मार्फ़त टोल शुल्क के जरिये कही ज्यादा पैसे की वसूली कर रही है। सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का साफ कहना है की हम टोल की जबतक प्रयाप्त वसूली नहीं करेंगे तबतक देश में आगामी सड़क निर्माण की फाइनेंसिंग नहीं हो पायेगी। परन्तु सवाल ये है की टोल शुल्क यूजर चार्ज जरूर लिया जाए पर उसका निर्धारण तो वाजिब हो। एक कार को एक हज़ार किलोमीटर का सफर राजमार्गो पर करने के लिए लगभग 2-3 हज़ार रूपये का टोल शुल्क अदा करना पड़ता है। जबकि विगत में किसी वाहन के क्रय के समय एकमुश्त शुल्क देने के बाद हमेशा के लिए छुट्टी हो जाती थी।
लेकिन सड़क की बुनियादी सुविधा का उपयोग खासा महंगा है। सरकार टेलीकॉम या बिजली सेवा प्रदाता कंपनियों की तरह किसी नियामक प्राधिकरण स्थापित करने के बजाये मनमाने शुल्क ले रही है। दूसरी इन राजमार्गों की निर्माण क्वालिटी चाहे भ्रष्टाचार की वजह से हो या सरकार द्वारा जल्दबाजी में काम पूरा किये जाने के दबाव की वजह से हो किस तरह धराशाही होकर आये दिन ख़बरों की सुर्खियां बन रही हैं, ये एक अत्यंत गंभीर मसला है। नो टॉलरेंस टू करप्शन और वैल्यू फॉर पब्लिक मनी की अवधारणा की धज्जियाँ उड़ाता है। देश में ना जाने कितने भारी भरकम निर्माण कार्य के क्वालिटी की पोल खुली है और देश विदेशों में इसका मजाक उड़ाया गया है।
गौरतलब है देश में विभिन्न आधारभूत संरचना में निवेश का जो एक परमपरागत मॉडल चला आ रहा था जिसके तहत ये माना जाता था की बुनियादी क्षेत्र में पूरी तरह से सरकार को निवेश करना चाहिए, क्योंकि निजी क्षेत्र इसमें फौरी निवेश कर त्वरित मुनाफा नहीं कमा सकते। इस वजह से एक अरसे से सड़क, रेल , बिजली और दूरसंचार में पूरी तरह सरकारें खर्च करती रही है। परन्तु 1991 की नयी आर्थिक नीति के उपरांत जब निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाई गई और सार्वजानिक क्षेत्र के साथ उसे एक साझेदार का रोल देना शुरू किया गया तो आधारभूत संरचना के अनेकानेक मदों मसलन बिजली, पेट्रोलियम उत्खनन और विपणन , कोयला खनन में निजी क्षेत्र को विभिन्न सम्बंधित गढ़े गए मॉड्यूल के साथ निवेश और उत्पादन के लाइसेंस मिले। इस क्रम में दूरसंचार में नियामक प्राधिकरण के मातहत सार्वजनिक निजी भागीदारी ने देश में दूरसंचार के विस्तार में महती भूमिका निभाई। यही स्थिति बिजली उत्पादन और उसकी ग्रिड क्रय की निर्मित व्यवस्था में भी दृष्टिगोचर हुई। इनमे कई बुनियादी क्षेत्र में निवेश का फार्मूला जो नयी आर्थिक नीति के बाद आकार लिया उसमे विगत के सार्वजानिक क्षेत्र की पूरी जिम्मेदारी उठाये जाने की अवधारणा से विलग निजी क्षेत्र को भी साथ लेने की धरना निर्मित हुई । इस विकासक्रम में बुनियादी क्षेत्र के विकास में सरकार का बोझ हल्का हुआ तो दूसरी तरफ निजी निवेश के आगमन से बुनियादी क्षेत्र के लिए प्रयाप्त निवेश का आगमन संभव हुआ। इस क्रम में देश के बुनियादी क्षेत्र में निजी और सार्वजानिक दोनों की भागीदारी और साझेदारी निर्धारित हुई जिसमे दोनों की राजस्व और मुनाफा हिस्सेदारी का विभिन्न फार्मूला ईजाद हुआ।
देखा जाए तो अलग अलग बुनियादी सेवाओं के राजस्व मॉड्यूल इस तरह से अलग अलग तरह के गढ़े जाए जिससे की टेलिकॉम क्षेत्र के मॉडल की तरह सभी उद्देश्य हासिल किया जा सके। मसलन हर बुनियादी क्षेत्र में निजी निवेश को इस तरह से आकर्षित किया जाए जिससे की सरकार पर निवेश का बोझ कम से कम हो। निजी और सार्वजानिक क्षेत्र में एक स्वस्थ प्रतियोगिता हो। उपभोक्ताओं को बिलकुल रियायती और प्रतियोगी दर पर सेवाओं की उपलब्धता हो। यदि देश में हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल और वह भी दुनिया में सबसे न्यून दर पर उपलब्ध हुआ तो वह स्थिति हर घर में रियायती बिजली , हर यात्री को समुचित दर पर ऑन डिमांड रेल बर्थ , उचित दर पर टोल शुल्क भी मुहैया करा सकती है। इसके लिए हर बुनियादी क्षेत्र की जरुरत के हिसाब से निजी और सार्वजानिक क्षेत्र की एक नियामक प्राधिकरण के मातहत भागीदारी का मॉड्यूल निर्धारित किया जाना जरुरी है। रेलवे में जहां सरकार के निवेश की आर्थिक व्यवहार्यता निर्धारित करने की जरुरत है, वही राजमार्गो के टोल निर्धारण को किफायती किये जाने की जरुरत है। औचित्य की कसौटी पर हमें सभी बुनियादी क्षेत्रों की निर्माण क्वालिटी और उनकी सेवाओं का निवेश मॉडल , राजस्व मॉडल और उपभोक्ता प्रयोग शुल्क का मॉडल निर्धारित करना होगा। मोदी सरकार बिना नियामक प्राधिकरण बनाये एक बिना ब्रेक के निवेश की गाड़ी चलाने सरीखी कार्रवाई है।
लेखक भारत परिवर्तन अभियान के संयोजक हैं





