अजय कुमार
अगर सोशल मीडिया के पुराने मजाकों पर भरोसा करें तो परमाणु युद्ध के बाद दुनिया में दो प्रजातियां बचेंगी कॉकरोच और भारतीय। मजाक इसलिए चलता है क्योंकि भारतीय पेट को हमने वर्षों से ऐसी अद्भुत सहनशीलता का प्रतीक बना दिया है, जो कथित तौर पर हर गली, हर नाली और हर संदिग्ध कड़ाही के सामने अडिग रहता है। लेकिन अब महाराष्ट्र में खाद्य एवं औषधि प्रशासन के आयुक्त तुकाराम मुंढे की कार्रवाई ने इस राष्ट्रीय आत्मविश्वास को ही चुनौती दे दी है। सवाल यह नहीं कि वे इतने छापे क्यों मार रहे हैं। असली सवाल यह है कि क्या हमें सचमुच उस भारत पर गर्व करना चाहिए, जहां सुरक्षित खाना सुविधा नहीं, बल्कि असामान्य विलासिता माना जाए? मुंढे ने 25 मई 2026 को महाराष्ट्र एफडीए की कमान संभाली और उसके बाद कार्रवाई की गति अचानक तेज हुई। मई के आखिरी तीन दिनों में ही 33 लोगों की गिरफ्तारी और 27 प्रतिष्ठानों को सील किए जाने की जानकारी सामने आई। एक सप्ताह में कार्रवाई 203 प्रतिष्ठानों तक पहुंची, 102 गिरफ्तारियां और 86 सीलिंग की रिपोर्ट आई। जून-जुलाई में अभियान केवल गुटखा या नकली उत्पादों तक सीमित नहीं रहा; दूध, डेयरी, रेस्तरां, उत्पादन इकाइयां और स्वच्छता उल्लंघन भी निशाने पर आए। जुलाई में पुणे क्षेत्र से सामने आया सिंथेटिक दूध का मामला और ज्यादा गंभीर था, जहां जांच में कथित तौर पर हर 1,000 लीटर असली दूध में लगभग 500 लीटर रासायनिक रूप से तैयार दूध मिलाने की बात सामने आई। यह पेट की ट्रेनिंग नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
यहीं हमारे लोकप्रिय मजाक की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है। खराब खाना खाने के बाद बच जाना और सुरक्षित खाना मिलना, दो बिल्कुल अलग बातें हैं। शरीर किसी संदूषण के बाद तुरंत प्रतिक्रिया न दे, इसका अर्थ यह नहीं कि वह संदूषण से सुरक्षित है। भोजन में मिलावट, रोगजनक जीवाणु, विषैले रसायन, खराब भंडारण और गलत तापमान जैसी समस्याएं धीरे-धीरे या अचानक नुकसान कर सकती हैं। अप्रैल 2026 के सरकारी रोग निगरानी अलर्ट में एक ही महीने में ऐसे कई मामले दर्ज हुए जिनमें दूषित भोजन या प्रसाद खाने के बाद सैकड़ों लोग बीमार पड़े। बेंगलुरु ग्रामीण में 400 से अधिक लोगों के बीमार होने का मामला भी दर्ज हुआ। इसलिए भारतीय पेट को सुपरपावर बताना हास्यास्पद हो सकता है, लेकिन उसी मजाक को खाद्य नीति का आधार बनाना खतरनाक होगा। फिर भी मुंढे की मुहिम पर एक जरूरी सवाल उठता है: सख्ती और विवेक के बीच रेखा कहां है? 11 अगस्त 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने एफडीए की एक कार्रवाई के संदर्भ में अधिकारियों को शक्ति का इस्तेमाल विवेकपूर्ण ढंग से करने की सलाह दी। अदालत की टिप्पणी का सार यही था कि नियामक ताकत जरूरी है, लेकिन प्रक्रिया और अनुपातिकता भी उतनी ही जरूरी हैं। किसी दुकान में गंभीर मिलावट मिले तो तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए; लेकिन हर तकनीकी कमी को उसी पैमाने पर अपराध मानना, छोटे कारोबारों को बिना पर्याप्त प्रक्रिया के बंद करना या हर निरीक्षण को सार्वजनिक तमाशे में बदलना समाधान नहीं है।
एकनाथ शिंदे ने दूध और डेयरी उत्पादों में मिलावट करने वालों पर संगठित अपराध कानून के तहत कार्रवाई की संभावना पर जोर दिया है और मुकदमों को अदालत में मजबूत ढंग से लड़ने के लिए विशेष कानूनी व्यवस्था की बात कही है। संदेश साफ है: बच्चों के दूध में मिलावट करने वाले को केवल मामूली जुर्माने से नहीं छोड़ा जा सकता। लेकिन कठोर कानून तभी प्रभावी होगा, जब नमूना लेने से लेकर प्रयोगशाला जांच, जब्ती, आरोपपत्र और अदालत में प्रमाण तक हर कड़ी मजबूत हो। वरना गिरफ्तारी की संख्या सुर्खियां तो बना सकती है, न्याय नहीं। उनकी छवि सख्त अधिकारी की है और 21 वर्षों में 25 तबादलों का रिकॉर्ड उनकी प्रशासनिक यात्रा को असाधारण बनाता है। लेकिन किसी अधिकारी की सफलता छापों की संख्या से नहीं, व्यवस्था में पैदा हुए स्थायी बदलाव से मापी जानी चाहिए। अगर आज 100 प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई होती है और छह महीने बाद वही मिलावट दूसरे नाम से फिर शुरू हो जाती है, तो अभियान अधूरा है। असली जीत तब होगी जब दूध की सप्लाई चेन में ट्रेसिंग मजबूत हो, नमूनों की जांच तेजी से हो, प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़े, दोषियों की सजा सुनिश्चित हो और ईमानदारी से काम करने वाले छोटे कारोबारियों को नियम समझने और पालन करने में मदद मिले।
देश में खाद्य सुरक्षा की समस्या नई नहीं है। पुराने केंद्रीय आंकड़ों में भी बड़ी संख्या में खाद्य नमूने गैर-अनुरूप पाए गए थे। 2018-19 में 1,06,459 नमूनों के विश्लेषण में 30,415 नमूने गैर-अनुरूप थे। राजस्थान में ही 2024-25 के दौरान 18,200 से अधिक नमूने लिए गए, जिनमें 863 असुरक्षित और 3,734 घटिया पाए गए। यह पूरी खाद्य व्यवस्था की कमजोरी है, जिसमें उत्पादन से लेकर दुकान और ग्राहक की थाली तक कई दरवाजे खुले रह जाते हैं। ग्राहक की भूमिका भी कम नहीं है। सस्ता दिखने वाला भोजन हमेशा सौदा नहीं होता। शिकायत दर्ज करना, बिल मांगना, लाइसेंस देखना और संदिग्ध उत्पाद की सूचना देना बाजार को बदलने वाले, लेकिन जरूरी नागरिक हथियार हैं। इसलिए अब भारतीयों को अपनी तथाकथित सुपरह्यूमन सहनशक्ति पर गर्व करना बंद करना चाहिए। जिस देश में ग्राहक यह कहकर खराब खाना खा ले कि ‘हमारे पेट को कुछ नहीं होगा’, वहां मिलावटखोर को सबसे आसान ग्राहक मिल जाता है। हमें ऐसा भारत चाहिए जहां स्ट्रीट फूड स्वादिष्ट हो, लेकिन साफ भी हो; जहां मिठाई रंगीन हो, लेकिन रसायन से नहीं; जहां दूध सस्ता हो सकता है, मगर संदिग्ध नहीं; और जहां रेस्तरां बंद होने की खबर इसलिए न आए कि छापा पड़ा, बल्कि इसलिए कि नियम तोड़ने की गुंजाइश ही खत्म हो चुकी है। मुंढे को कार्रवाई रोकने की जरूरत नहीं है। जरूरत है कार्रवाई को और ज्यादा वैज्ञानिक, पारदर्शी और न्यायसंगत बनाने की। छापे हों, लेकिन प्रमाण के साथ। सीलिंग हो, लेकिन नियम के मुताबिक। गिरफ्तारी हो, लेकिन ठोस सबूत के आधार पर। हर कार्रवाई का लक्ष्य कैमरे के सामने कठोर दिखना नहीं, बल्कि नागरिक की थाली में भरोसा लौटाना होना चाहिए। क्योंकि अगर किसी दिन कॉकरोच सचमुच बच भी गया, तो यह कोई उपलब्धि नहीं होगी। असली उपलब्धि तब होगी जब भारतीय को जिंदा रहने के लिए कॉकरोच जैसी सहनशक्ति की जरूरत ही न पड़े।





