वैश्विक दवा उद्योग और भारत के लिए नई चुनौतियां

New Challenges for the Global Pharmaceutical Industry and India

अशोक भाटिया

अमेरिका अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकता है. डोनाल्ड ट्रंप को टैरिफ-टैरिफ खेलने में खूब मजा आता है. अब अमेरिका ऐसा फैसला लेने जा रहा है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा. जी हां, डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले से भारत की मुश्किलें बढ़ जाएंगी. दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका में आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर भारी टैरिफ लगाने जा रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में 2028 से इम्पोर्ट की जाने वाली जेनेरिक दवाओं पर भारी टैरिफ लगाने का ऐलान किया. इस फैसले से भारत की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि अमेरिका भारतीय दवा कंपनियों का सबसे बड़ा बाजार है. ट्रंप के इस फैसले का सबसे बड़ा असर भारत के दवा उद्योग पर पड़ेगा.

डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर कहा कि 1 अगस्त 2026 से अमेरिका में आने वाली सभी जेनेरिक दवाओं पर अगले दो साल तक कोई टैरिफ नहीं लगाया जाएगा. यानी 2028 तक इन दवाओं पर आयात शुल्क शून्य रहेगा. लेकिन इसके बाद नियम पूरी तरह बदल जाएंगे. 2028 से एक साल के लिए इसे बढ़ाकर 100 परसेंट और फिर उसके बाद 200 परसेंट कर दिया जाएगा. उन्होंने कहा कि इस कदम का मकसद ऐसी फार्मास्युटिकल दवाओं की मैन्युफैक्चरिंग को अमेरिका में ही शुरू करना है. इस कदम से भारत पर असर पड़ सकता है. कारण कि अमेरिका को जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर है.

डोनाल्ड ट्रंप की आर्थिक नीतियों का मूल मंत्र हमेशा से ‘अमेरिका फर्स्ट’ और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना रहा है। अपने पिछले कार्यकालों में उन्होंने ऑटोमोबाइल, स्टील और टेक सेक्टर पर ध्यान केंद्रित किया था, लेकिन इस बार उनका निशाना देश की जीवनदायिनी स्वास्थ्य प्रणाली और दवा उद्योग पर है।इस कड़े कदम के पीछे ट्रंप प्रशासन के मुख्य तर्क निम्नलिखित हैं जैसे सप्लाई चेन की आत्मनिर्भरता: कोविड-19 महामारी के दौरान अमेरिका ने महसूस किया था कि वह जीवन रक्षक दवाओं और उनके कच्चे माल के लिए चीन और भारत जैसे देशों पर अत्यधिक निर्भर है। ट्रंप इस रणनीतिक कमजोरी को हमेशा के लिए खत्म करना चाहते हैं।घरेलू रोजगार का सृजन: जब विदेशी कंपनियां अमेरिका में अपने प्लांट स्थापित करेंगी, तो वहां अरबों डॉलर का निवेश होगा और अमेरिकी नागरिकों के लिए उच्च कुशल विनिर्माण क्षेत्र में लाखों रोजगार पैदा होंगे।राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा: अमेरिकी नीति निर्माताओं का मानना है कि दवाओं के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता एक राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम है। किसी भी भू-राजनीतिक तनाव या युद्ध की स्थिति में देश में दवाओं की भारी किल्लत हो सकती है।

गौरतलब है कि दुनिया भर में ‘दुनिया की फार्मेसी’ के रूप में मशहूर भारतीय फार्मास्युटिकल उद्योग के लिए यह फैसला एक बहुत बड़ा झटका है। भारत अमेरिका को जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति करने वाला सबसे बड़ा देश है। अमेरिकी बाजारों में बिकने वाली हर तीन में से एक जेनेरिक दवा किसी न किसी भारतीय कंपनी द्वारा बनाई जाती है।इस नई नीति के लागू होने से भारतीय और वैश्विक दवा बाजार पर निम्नलिखित गंभीर प्रभाव पड़ेंगे जैसे अमेरिका में प्लांट लगाने का भारी दबाव: दो साल की ‘शून्य टैरिफ’ अवधि वास्तव में कोई बड़ी राहत नहीं बल्कि एक अंतिम चेतावनी है। भारतीय कंपनियों के पास केवल 24 महीने का समय है कि वे अमेरिका की धरती पर जमीन खरीदें, प्लांट लगाएं, अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (USFDA) से मंजूरियां लें और व्यावसायिक उत्पादन शुरू करें। जो कंपनियां ऐसा नहीं कर पाएंगी, वे 100% और 200% टैरिफ के कारण अमेरिकी बाजार से पूरी तरह बाहर हो जाएंगी।लागत में भारी बढ़ोतरी: अमेरिका में जमीन, बुनियादी ढांचा, बिजली और सबसे महत्वपूर्ण ‘लेबर’ (श्रम) की लागत भारत की तुलना में कई गुना अधिक है। अमेरिका में दवा बनाने से कंपनियों की उत्पादन लागत (Cost of Production) आसमान छूने लगेगी, जिससे उनके मुनाफे के मार्जिन (Profit Margins) पर बहुत बुरा असर पड़ेगा।पूंजीगत व्यय (CapEx) का संकट: भारत की प्रमुख फार्मा कंपनियों (जैसे सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज, सिप्ला, ल्यूपिन और ऑरोबिंदो) को अमेरिकी धरती पर नए विनिर्माण संयंत्र स्थापित करने के लिए अरबों डॉलर का भारी-भरकम निवेश करना होगा। इससे कंपनियों के कर्ज में बढ़ोतरी हो सकती है और घरेलू अनुसंधान एवं विकास के लिए उनके पास फंड की कमी हो सकती है।

ट्रंप प्रशासन का यह कदम जितना विदेशी कंपनियों के लिए चुनौतीपूर्ण है, उतना ही यह खुद अमेरिकी नागरिकों और वहां की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के लिए भी आत्मघाती साबित हो सकता है। जेनेरिक दवाओं का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है क्योंकि वे ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 80 से 90 प्रतिशत तक सस्ती होती हैं। इससे अमेरिकी सरकार के ‘मेडिकेयर’ और ‘मेडिकेड’ जैसे स्वास्थ्य कार्यक्रमों का खर्च नियंत्रित रहता है।

यदि विदेशी कंपनियां दो साल के भीतर अमेरिका में उत्पादन शुरू नहीं कर पाती हैं, तो आयातित दवाओं पर 100% से 200% टैरिफ लगने के कारण अमेरिका में दवाओं की कीमतें रातों-रात दोगुनी या तिगुनी हो जाएंगी। इसके विपरीत, यदि कंपनियां अमेरिका में उत्पादन शुरू भी कर देती हैं, तो वहां की उच्च विनिर्माण लागत के कारण दवाओं के दाम अंततः बढ़ेंगे ही। दोनों ही परिस्थितियों में नुकसान अमेरिकी मरीजों का होगा, जिन्हें अपनी जेब से अधिक पैसे खर्च करने होंगे। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इस संक्रमण काल के दौरान अमेरिका में कई आवश्यक दवाओं की भारी किल्लत भी पैदा हो सकती है।

हालांकि यह नीति सभी आयातित जेनेरिक दवाओं पर समान रूप से लागू होती है, लेकिन चीन और भारत के संदर्भ में इसके मायने अलग हैं। अमेरिका काफी समय से चीन से आने वाले एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) और दवाओं पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। चीन के साथ अमेरिका के भू-राजनीतिक संबंध बेहद तनावपूर्ण हैं, इसलिए चीन के लिए अमेरिकी बाजार के दरवाजे लगभग बंद होने जा रहे हैं।दूसरी ओर, भारत के साथ अमेरिका के संबंध रणनीतिक और व्यापारिक रूप से काफी मजबूत हैं। ट्रंप प्रशासन भारत को एक मित्र देश मानता है, लेकिन व्यापार घाटे के मामले में ट्रंप किसी को रियायत नहीं देते। भारत के लिए चुनौती यह है कि भारतीय कंपनियां स्वयं अपने कच्चे माल के लिए काफी हद तक चीन पर निर्भर हैं। ऐसे में यदि भारतीय कंपनियां अमेरिका में प्लांट लगाती भी हैं, तो उन्हें कच्चे माल की आपूर्ति के लिए एक नया और सुरक्षित नेटवर्क तैयार करना होगा।

इस ऐतिहासिक संकट को भारतीय फार्मास्युटिकल उद्योग एक अवसर में भी बदल सकता है। इसके लिए भारतीय कंपनियों और भारत सरकार को मिलकर एक बहुआयामी रणनीति पर काम करना होगा जैसे अमेरिका में रणनीतिक अधिग्रहण : भारतीय कंपनियों को शून्य से नए प्लांट बनाने के बजाय अमेरिका में पहले से मौजूद बीमार या बंद पड़े विनिर्माण संयंत्रों को खरीदने पर ध्यान देना चाहिए। इससे समय की बचत होगी और वे दो साल की समय-सीमा के भीतर उत्पादन शुरू कर सकेंगी।हाइब्रिड विनिर्माण मॉडल: कंपनियां दवाओं के फॉर्मूलेशन (तैयारी) का शुरुआती और सस्ता काम भारत में कर सकती हैं और उसकी अंतिम पैकेजिंग, फिनिशिंग और गुणवत्ता जांच अमेरिका में स्थापित प्लांट में कर सकती हैं, ताकि वे अमेरिकी नियमों के दायरे में आ सकें।नए बाजारों की खोज: भारतीय फार्मा उद्योग को अमेरिकी बाजार पर अपनी अत्यधिक निर्भरता को कम करना होगा। अब समय आ गया है कि भारत अफ्रीकी देशों, लैटिन अमेरिका, पूर्वी यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों में अपनी पैठ मजबूत करे।राजनयिक बातचीत भारत सरकार को अमेरिकी प्रशासन के साथ उच्च स्तरीय वार्ता करनी चाहिए। भारत यह तर्क दे सकता है कि भारतीय जेनेरिक दवाएं अमेरिकी नागरिकों के स्वास्थ्य बजट को बनाए रखने के लिए अनिवार्य हैं। भारत को इस नीति में कुछ विशेष श्रेणियों की जीवन रक्षक दवाओं के लिए छूट या समय-सीमा को दो साल से बढ़ाकर पांच साल करने की मांग करनी चाहिए।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह फैसला वैश्विक मुक्त व्यापार के सिद्धांतों पर एक बड़ा आघात है और यह दर्शाता है कि आने वाले समय में वैश्विक व्यापार नीतियां कितनी संरक्षणवादी और आक्रामक होने वाली हैं। फार्मास्युटिकल सेक्टर, जिसे अब तक मानवीय आधार पर व्यापार युद्धों से दूर रखा जाता था, अब पूरी तरह से भू-राजनीति और आर्थिक राष्ट्रवाद के दायरे में आ चुका है।

भारतीय फार्मा उद्योग के लिए अगले दो साल ‘करो या मरो’ जैसे होने वाले हैं। यह समय केवल चिंता करने का नहीं, बल्कि अपनी रणनीतियों को नए सिरे से गढ़ने का है। यदि भारतीय कंपनियां अपनी परिचालन दक्षता, वैश्विक अनुभव और मजबूत वित्तीय स्थिति का सही इस्तेमाल करती हैं, तो वे अमेरिका की इस सख्त नीति के बावजूद न केवल अमेरिकी बाजार में अपनी हिस्सेदारी बचाए रखने में सफल होंगी, बल्कि खुद को सच्चे अर्थों में एक बहुराष्ट्रीय और आत्मनिर्भर उद्योग के रूप में स्थापित कर सकेंगी। दुनिया की इस सबसे बड़ी स्वास्थ्य हलचल पर अब पूरे विश्व की नजरें टिकी हैं।