फॉरवर्ड मनदीप, अभिषेक व शिलानंद की जुगलबंदी पर भरोसा कर भारत हॉकी विश्व कप में पदक की आस में उतरेगा

India will enter the Hockey World Cup hoping for a medal, banking on the synergy between forwards Mandeep, Abhishek, and Shilanand

सत्येन्द्र पाल सिंह

नई दिल्ली : अनुभवी मनदीप सिंह नौजवान अभिषेक नैन और शिलानंद लाकरा के रूप में तेज तर्रार स्ट्राइकर की जुगलबंदी पर भरोसा कर 15 से 30 अगस्त तक बेल्जियम और नीदरलैंड 2026 में होने एफआईएच हॉकी विश्व कप में 1975 में आखिरी बार स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय पुरुष हॉकी टीम 51 बरस के बाद अपना पहला पदक जीतने की आस लिए खेलने उतरेगी। मॉडर्न हॉकी में फॉरवर्ड के लिए साथी खिलाड़ियों के बढ़िया जुगलबंदी व निरंतरता से लेकर टीमवर्क और ज़बरदस्त तैयारी तक गोल के आक्रामक अभियान में आखिरी मौके को भुना गोल करना सबसे अहम होता है। मॉडर्न हॉकी में जीत और हार का फ़ैसला अक्सर या तो गोल के बहुत करीब पहुँचने या फिर बिना किसी खास मौके के गोल कर देने से होता है। यहीं पर अग्रिम पंक्ति के बीच तालमेल की भूमिका अहम हो जाती है। अग्रिम पंक्ति की गोल के अभियान बनाने और आपसी जुगलबंदी पर मॉडर्न यानी आज के जमाने की हॉकी में किसी भी टीम की कामयाबी निर्भर करती है। फॉरवर्ड की जिम्मेदारी महज गोल के आक्रामक अभियान बनाने के साथ टीम को मंजिल तक पहुंचाने के लिए गोल करने की होती है। किसी भी टीम की मॉडर्न हॉकी में जीत और हार उसके फॉरवर्ड की मौके को भुना गोल करने की कला तय ही करती है। गोल करने में किसी भी अग्रिम पंक्ति की जुगलबंदी निर्णायक रहती हे।

बतौर स्ट्राइकर साथियों से जितना बेहतर तालमेल,आप उतने ही कारगर : मनदीप सिंह
अपना लगातार चौथा हॉकी विश्व कप खेलने जा रहे अनुभवी स्ट्राइकर मनदीप सिंह कहते हैं,‘ मैं जब युवा था तो मैं अपने सीनियर साथियों से बहुत सवाल किया करता था। मैंने अपने सीनियर साथियों से बहुत कुछ सीखा है और अपने उन अनुभवों को अपने नौजवान साथी फॉरवर्ड के साथ साझा करने की कोशिश करता हूं। हम बड़े मैचों में दबाव को झेलने, धैर्य रख कर सही फैसले लेने की बाबत आपस में बात करते हैं। बतौर फॉरवर्ड डी के भीतर कामयाबी जमकर तैयारियों से मिलती है। बतौर फॉरवर्ड हमारे अभ्यास सत्र खास होते हैं। हम डी के भीतर आखिरी नौ मीटर तक बहुत बार पहुंचते हैं। हमारा ध्यान सही तालमेल और यह पक्का करने पर रहता है कि हमारी गोल की हर कोशिश कारगर रहे। हमने डी के भीतर आखिरी पास और मिले मौकों को गोल में बदलने पर काफी मेहनत की है। एक बढ़िया स्ट्राइकर सिर्फ गोल करने पर ही ध्यान नहीं देता। हॉकी टीम गेम है और बतौर स्ट्राइकर आपका अपने साथियों के साथ समझ और तालमेल जितना बेहतर होगा आप उतने ही कारगर होंगे। जब हम गेंद को ले डी में घुसते हैं तो हमारी कोशिश रहती है कि हम या तो गोल करें, या गोल पर निशाना साधे अथवा पेनल्टी हासिल करें।’

बतौर स्ट्राइकर डी में जेहनी मजबूती जरूरी : अभिषेक
स्ट्राइकर अभिषेक नैन हॉकी विश्व कप में बतौर स्ट्राइकर भारत के हमलों की जान साबित होने वाले हैं और बीते कुछ बरसों में उन्होंने खुद को देश का सर्वश्रेष्ठ गोल स्कोरर साबित किया है। अभिषेक ने बतौर स्ट्राइकर उनके खेल में निरंतरता शारीरिक और जेहनी तौर पर निरंतर तैयारियों से आई है। अभिषेक कहते हैं,‘ स्ट्राइकर के लिए निरंतरता बिना गेंद के शुरू होती है। स्ट्राइकर के लिए बिना गेंद के आगे बढ़ना और दबाव बनाना जरूरी होता है क्योंकि वह ही टीम के रक्षण की पहली कड़ी होता है। एक बार गेंद को अपने कब्जे में लेने के बाद बतौर स्ट्राइकर हमारा अगला कदम अन्य साथी फॉरवर्ड के साथ तालमेल बनाना और फिर गोल के अभियान को गोल कर ,अथवा लक्ष्य पर निशाना लगा कर या फिर पेनल्टी कॉर्नर बनाना होता है। बतौर स्ट्राइकर डी के भीतर तकनीकी कौशल से भी ज्यादा जेहनी तौर पर मजबूती जरूरी होती है। डी के भीतर गेंद के साथ धैर्य कड़े अभ्यास से आता है। बिना कड़ा अभ्यास किए आप इन स्थितियों में सही फैसले लेने की उम्मीद नहीं कर सकते है। हम ध्यान और अनुभव के जरिए खुद को जेहनी तौर पर मजबूत करने के लिए मेहनत करते हैं। आप जितना ज्यादा खेलेंगे मौके मिलने पर आप उतने ही धैर्य से उनका भुना पाएंगे।’

फोकस हमेशा टीम के लिए सर्वश्रेष्ठ करने पर : शिलानंद लाकरा
अपना पहला हॉकी विश्व कप खेलने की तैयारियों में जुटे भारत के 27 बरस के आदिवासी स्ट्राइकर शिलानंद लाकरा कहते हैं कि सीनियर साथियों खासतौर पर मनदीप सिंह जैसे अनुभवी स्ट्राइकर से मिले मार्गदर्शन और समर्थन ने उन्हें अपना खेल बेहतर करने और खुद को अंतर्राष्ट्रीय हॉकी की जरूरत के मुताबिक ढालने में मदद की। शिलानंद लाकरा कहते हैं, ‘ मेरा फोकस हमेशा टीम के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ करने पर रहता है। फिर चाहे यह गोल करने के मौके बनाना हो , गोल करना हो या प्रतिद्वंद्वी से गेंद छीनना हो हर लिहाज से टीम के योगदान करने की कोशिश करता हूं। मॉडर्न हॉकी में बतौर फॉरवर्ड आज महज गोल करना ही पर्याप्त नहीं है। हम फॉरवर्ड टीम के रक्षण की पहली कड़ी भी है। हम यदि मजबूती से अपने किले की चौकसी करते हैं तो हम अपने मिडफील्डरों और डिफेंडरों का काम आसान कर देते हैं।’