मां दंतेश्वरी हर्बल समूह को ‘भारतीय सहकारी बैंक का प्रशस्ति-पत्र

Commendation Certificate from the Indian Cooperative Bank to Maa Danteshwari Herbal Group

रविवार दिल्ली नेटवर्क

  • राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान: ‘भारतीय सहकारी बैंक’ ने कार्यों की सराहना करते हुए प्रशस्ति-पत्र दिया।
  • बस्तर का अनूठा कृषि मॉडल: जैविक खेती, वनौषधि संरक्षण, महिला किसान और मूल्य संवर्धन का समेकित प्रयास।
  • कम लागत के बड़े नवाचार: MDBP-16 काली मिर्च और 40 लाख के पालीहाउस का मात्र ₹2 लाख रु.का सफल सस्ता विकल्प ‘नेचुरल ग्रीनहाउस मॉडल’

कोंडागांव, छत्तीसगढ़ : बस्तर की धरती पर जनजातीय समुदायों, महिला किसानों और स्थानीय संसाधनों को केंद्र में रखकर जैविक एवं टिकाऊ कृषि का ऐसा मॉडल विकसित किया जा रहा है, जिसने अब राष्ट्रीय सहकारिता जगत का ध्यान भी आकर्षित किया है। मां दंतेश्वरी हर्बल समूह, कोंडागांव को उसके कार्यों के लिए ‘ भारतीय सहकारी बैंक ‘ नई दिल्ली की ओर से ‘प्रशस्ति-पत्र’ प्रदान किया गया है।
17 सितंबर 2026 को जारी ‘प्रशस्ति-पत्र’ में समूह के कार्यों की सराहना करते हुए कहा गया है कि जनजातीय समाज के विकास और आजीविका के लिए विकसित यह मॉडल एक मजबूत संगठनात्मक एवं व्यावसायिक प्रणाली के रूप में सामने आया है। प्रशस्ति-पत्र में आदिवासी समुदाय के बीच चौमुखी विकास की संभावनाओं तथा भविष्य में अन्य सहकारी संस्थाओं के साथ मिलकर कार्य करने की संभावनाओं का भी उल्लेख किया गया है।

कृति संकल्प के सहकारिता विशेषांक में प्रकाशित हुआ समूह का मॉडल :- इस राष्ट्रीय पहचान की पृष्ठभूमि में हाल ही में सहकारिता पर केंद्रित प्रतिष्ठित पत्रिका ‘कृति संकल्प’ का विशेष सहकारिता अंक भी महत्वपूर्ण है। इस विशेषांक में देश के चुनिंदा सफल मॉडलों का अध्ययन कर उनके कार्यों और उपलब्धियों पर केंद्रित आलेख प्रकाशित किए गए।

इसी क्रम में ‘मां दंतेश्वरी हर्बल समूह’ के कार्यों पर विशेष आलेख प्रकाशित किया गया, जिसमें स्थानीय जनजातीय समुदायों, विशेषकर महिला किसानों के साथ जैविक खेती, हर्बल एवं मसाला उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन तथा बाजार से जुड़ाव के लिए विकसित मॉडल को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया।

इस प्रकार कोंडागांव से शुरू हुआ यह प्रयास केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और बाजार तक किसानों को जोड़ने वाली समेकित व्यवस्था के रूप में विकसित हुआ है।

प्रकृति, परंपरा और आधुनिक कृषि का संगम :-
‘ मां दंतेश्वरी हर्बल समूह ‘ के मॉडल में बस्तर की पारंपरिक वनौषधीय जानकारी और आधुनिक कृषि तकनीकों को साथ लाने का प्रयास किया गया है। समूह द्वारा दुर्लभ एवं संकटग्रस्त वनौषधीय प्रजातियों के संरक्षण-संवर्धन के लिए ‘इथनोमेडिको गार्डन’ विकसित किया गया है, जिसमें समूह के अनुसार 340 से अधिक दुर्लभ एवं विलुप्तप्राय औषधीय पौधों को उनके प्राकृतिक परिवेश में संरक्षित किया जा रहा है।
इसके साथ ही स्थानीय किसानों को औषधीय एवं मसाला फसलों से जोड़ने का काम भी किया जा रहा है। देश के लाखों किसान अब तक इस संस्था से किसी न किसी रूप में जुड़ चुके हैं।

MDBP-16: बस्तर में ही नहीं देश के 16 राज्यों में काली मिर्च की नई संभावना :-
समूह के प्रमुख कृषि नवाचारों में ‘मां दंतेश्वरी काली मिर्च-16’ (MDBP-16) भी शामिल है। उपलब्ध प्रकाशित विवरणों के अनुसार इस किस्म का विकास बस्तर की परिस्थितियों में लंबे समय के चयन और प्रयोगों के बाद किया गया। अनुकूल परिस्थितियों में इसके एक परिपक्व पौधे से लगभग 8 से 10 किलोग्राम सूखी काली मिर्च प्रमाणिक उत्पादन प्राप्त होता है।

इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता यह बताई गई है कि इसमें पाइपरिन की मात्रा 16 प्रतिशत से अधिक पाई गई। प्रकाशित विवरण के अनुसार इस किस्म की खेती अब देश के लगभग 16 राज्यों में ऐसी खेती सफलता पूर्वक प्रारंभ हो गई है।

₹40 लाख के पॉलीहाउस के सामने लगभग ₹ 1.5 डेढ़ से 2 दो लाख का नेचुरल ग्रीनहाउस :-
‘मां दंतेश्वरी हर्बल समूह’ का दूसरा प्रमुख नवाचार है ‘नेचुरल ग्रीनहाउस’। इसमें पेड़ों को ही प्राकृतिक ग्रीनहाउस की संरचना के रूप में विकसित किया जाता है और उनके साथ काली मिर्च जैसी फसलों की खेती की जाती है।

प्रकाशित विवरणों के अनुसार पारंपरिक प्लास्टिक आधारित पॉलीहाउस की लागत लगभग ₹40 लाख प्रति एकड़ तक बताई गई है, जबकि समूह का वृक्ष आधारित ज्यादा टिकाऊ ‘नेचुरल ग्रीनहाउस’ मात्र ₹1.5 से ₹2 लाख प्रति एकड़ में विकसित किया जा सकता है।

इस मॉडल में पेड़ों से छाया और नमी का प्राकृतिक वातावरण मिलता है। प्रकाशित जानकारी के अनुसार इसमें हरित खाद, नाइट्रोजन स्थिरीकरण, जल संरक्षण और बहुफसली खेती जैसी अतिरिक्त पर्यावरणीय एवं की लाभकारी कृषि उपयोगिताएं भी जुड़ी हुई हैं।

उल्लेखनीय है कि, इस मॉडल में काली मिर्च से प्रति एकड़ आमदनी बढ़ते क्रम में लगभग ₹5 लाख से लेकर ₹15 लाख तक वार्षिक आय तथा लंबे समय में इमारती लकड़ी से प्रति एकड़ डेढ़ से दो करोड रुपए तक अतिरिक्त आर्थिक आमदनी प्राप्त होने का दावा किया गया है। ये आंकड़े समूह के दीर्घकालीन खेत-प्रयोगों पर हैं।

बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों को बस्तर आने का निमंत्रण :-
प्रशस्ति-पत्र के लिए आभार व्यक्त करते हुए समूह के संस्थापक डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने ‘भारतीय सहकारी बैंक’ के प्रबंध निदेशक डॉ. वी. के. दुबे, अध्यक्ष श्री अजय भाई एच. पटेल तथा संस्था के अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों को बस्तर और विशेष रूप से कोंडागांव आने का आत्मीय निमंत्रण दिया है।

निमंत्रण का उद्देश्य केवल औपचारिक भ्रमण नहीं, बल्कि बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों को जनजातीय किसानों और महिला जैविक कृषकों के साथ जमीन पर चल रहे पूरे मॉडल को प्रत्यक्ष देखने का अवसर देना है। इसमें जैविक एवं हर्बल खेती, मसाला उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, बाजार व्यवस्था, इथनोमेडिको गार्डन, MDBP-16 तथा नेचुरल ग्रीनहाउस जैसे प्रयोग शामिल हैं।

डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि देश का वरिष्ठ सहकारी नेतृत्व यदि बस्तर आकर इन प्रयोगों को प्रत्यक्ष देखता है, तो स्थानीय किसानों और महिला कृषकों का उत्साह बढ़ेगा तथा सहकारिता के माध्यम से ऐसे ग्रामीण एवं जनजातीय कृषि मॉडलों को व्यापक स्तर पर जोड़ने की संभावनाओं पर नए सिरे से विचार हो सकेगा।

सम्मान केवल संस्था का नहीं, किसानों का भी :-
मां दंतेश्वरी हर्बल समूह का कहना है कि यह प्रशस्ति-पत्र किसी एक व्यक्ति या संस्था की उपलब्धि मात्र नहीं है। यह उन जनजातीय किसानों, महिला कृषकों और ग्रामीण परिवारों के श्रम और विश्वास का सम्मान है, जिन्होंने बस्तर की जमीन पर जैविक, हर्बल और टिकाऊ कृषि के इन प्रयोगों को संभव बनाया। इस समूह के मॉडल ने बस्तर में टिकाऊ एवं आधुनिक कृषि की दिशा में किए जा रहे महत्वपूर्ण प्रयासों से जोड़ा है और MDBP-16, नेचुरल ग्रीनहाउस तथा किसान सशक्तिकरण को इसकी प्रमुख पहलों में शामिल किया गया है।

कोंडागांव से निकलती यह कहानी अब केवल एक कृषि फार्म की कहानी नहीं रह गई है। यह उस संभावना की कहानी है जिसमें बस्तर का जंगल, जनजातीय ज्ञान, महिला शक्ति, जैविक खेती, आधुनिक प्रसंस्करण और सहकारिता मिलकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक नया रास्ता तैयार कर सकते हैं।