महेन्द्र तिवारी
भोजन केवल शरीर का पोषण नहीं करता, बल्कि यह मनुष्य की चेतना, विचार और आत्मा को भी दिशा देता है। प्राचीन काल से ही हमारे समाज में अन्न को देवता के समान माना गया है और उसे ग्रहण करने की प्रक्रिया को एक पवित्र अनुष्ठान की तरह देखा गया है। परंतु वर्तमान समय में जब हम अपनी थाली की ओर देखते हैं, तो एक गहरा संशय मन में उत्पन्न होता है। क्या जो अन्न हम खा रहे हैं, वह वास्तव में शुद्ध है? क्या हमारे रसोईघर तक पहुंचने वाला तेल, दूध, मसाले और अन्य खाद्य सामग्रियां सुरक्षित हैं? यह प्रश्न आज हर उस व्यक्ति के सामने खड़ा है जो अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित है। मुनाफाखोरी और लालच की अंधी दौड़ में कुछ लोगों ने भोजन जैसी जीवनदायी वस्तु को भी विष बना दिया है। मिलावट का यह व्यापार आज समाज की जड़ों को खोखला कर रहा है और इसी पृष्ठभूमि में महाराष्ट्र राज्य के खाद्य एवं औषधि प्रशासन द्वारा उठाया गया हालिया कदम पूरे राष्ट्र के लिए एक बड़ा संदेश लेकर आया है।
बीते कुछ दिनों में महाराष्ट्र में जिस प्रकार का व्यापक जांच अभियान चलाया गया, उसने खाद्य सुरक्षा की वास्तविकता को पूरी तरह से उजागर कर दिया है। प्रशासन के उच्च अधिकारी तुकाराम मुंढे के नेतृत्व में जब जांच दलों ने विभिन्न आहार गृहों, राशन की दुकानों, भंडारण गृहों और खाद्य तेल विक्रेताओं के यहां औचक निरीक्षण किया, तो जो दृश्य सामने आए, वे किसी भी सामान्य नागरिक को भयभीत करने के लिए पर्याप्त थे। भोजन पकाने के स्थानों पर चूहों का निर्बाध घूमना, खाद्य सामग्रियों के बीच कीड़े मकोड़ों की उपस्थिति और अत्यंत अस्वच्छ वातावरण में कच्ची सामग्रियों का रखा जाना यह दर्शाता है कि आम लोगों के स्वास्थ्य के साथ किस स्तर का खिलवाड़ किया जा रहा है। जांच में यह भी पाया गया कि बहुत से स्थानों पर वे सामग्रियां धड़ल्ले से बेची जा रही थीं, जिनकी उपयोग की अंतिम तिथि समाप्त हो चुकी थी। यह केवल लापरवाही का मामला नहीं है, बल्कि यह उपभोक्ताओं के भरोसे की खुलेआम हत्या है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक डराने वाली स्थिति खाद्य तेल की है। भारतीय रसोई में शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो, जब तेल का उपयोग न होता हो। हर घर में सुबह से लेकर रात तक किसी न किसी रूप में तेल खाया जाता है। इसी अत्यधिक मांग का लाभ उठाकर मिलावटखोरों ने खुले तेल का एक बड़ा अवैध बाजार खड़ा कर दिया है। जांच अधिकारियों को निरीक्षण के दौरान भारी मात्रा में ऐसा खुला तेल मिला, जिस पर कोई विवरण पर्ची नहीं थी और जिसके स्रोत का कोई भी प्रामाणिक विवरण उपलब्ध नहीं था। बिना सील वाले ऐसे खुले उत्पादों में घटिया दर्जे के रसायनों और सस्ते विकल्पों की मिलावट करना बेहद आसान होता है। प्रशासन ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि लोग केवल वही सामग्रियां खरीदें जो पूरी तरह से बंद हों और जिन पर निर्माता, निर्माण की तिथि और गुणवत्ता का पूरा विवरण दर्ज हो।
मिलावट की यह समस्या केवल छोटी दुकानों या खुले बाजारों तक सीमित नहीं है। आज के इस तेज रफ्तार दौर में जब लोग घर बैठे कुछ ही मिनटों में अपनी जरूरत का सामान मंगाने के आदी हो चुके हैं, तब इन त्वरित वितरण सेवाओं के भंडारण गृहों की सच्चाई भी सामने आनी आवश्यक थी। महानगरों में स्थापित ऐसे अनेक भंडारण गृहों की जब जांच की गई, तो वहां सड़ी हुई सब्जियां, जंग लगी अलमारियां और तापमान को नियंत्रित रखने के साधनों का घोर अभाव पाया गया। कई जगह कर्मचारियों को स्वच्छता के सामान्य नियमों का भी ज्ञान नहीं था। जिन स्थानों से हजारों लोगों के घरों में रोजमर्रा का सामान पहुंचता है, वहां ऐसी घोर अव्यवस्था किसी भी सभ्य समाज के लिए गहरी चिंता का विषय है। इन अनियमितताओं को देखते हुए प्रशासन ने अनेक स्थानों की कार्य अनुमति को तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिया।
आहार गृहों और विश्रामालयों की स्थिति ने भी इस बात की पुष्टि कर दी है कि बाहरी दिखावा हमेशा भीतरी सच्चाई को नहीं दर्शाता। बाहर से अत्यंत आकर्षक दिखने वाले कई आहार गृहों की रसोई के भीतर कच्चा मांस अत्यंत असुरक्षित तरीके से फर्श पर रखा हुआ मिला। दूध और उससे बने उत्पादों को जिस तापमान पर रखा जाना चाहिए था, उसकी पूरी तरह से अनदेखी की जा रही थी। कुछ स्थानों पर तो जीवित चूहे मिलने के बाद उनके संचालन पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई। इस अभियान के दौरान अधिकारियों ने लगभग 25 लाख रुपये की ऐसी खाद्य सामग्री को अपने कब्जे में लिया, जो मानव उपभोग के लिए पूरी तरह से असुरक्षित थी। यह कठोर कार्यवाही इस बात का प्रमाण है कि यदि प्रशासन अपनी पूरी इच्छाशक्ति के साथ काम करे, तो किसी भी प्रकार के अवैध कारोबार पर अंकुश लगाया जा सकता है।
खाद्य सुरक्षा से जुड़े नियम और कानून हमारे देश में पहले से ही मौजूद हैं। ये कानून केवल मिलावट को रोकने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये उत्पादन से लेकर भंडारण, परिवहन और अंतिम बिक्री तक की पूरी प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं। इसके बावजूद कई व्यापारी बिना किसी वैध अनुमति के धड़ल्ले से अपना कारोबार चला रहे थे। पुराने और गंदे डिब्बों में दोबारा तेल भरकर बेचना या समाप्ति तिथि के निकट पहुंच चुके उत्पादों को नए सिरे से बंद करके बाजार में उतारना, ये सभी गतिविधियां कानून का खुला उल्लंघन हैं। प्रशासन ने अब यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में जो भी व्यक्ति या संस्था इन नियमों को तोड़ती हुई पाई जाएगी, उस पर भारी आर्थिक दंड लगाने के साथ साथ कठोर कानूनी कार्यवाही भी की जाएगी।
भारतीय संस्कृति में अन्नदाता और भोजन पकाने वाले को हमेशा सम्मान की दृष्टि से देखा गया है। हमारे पूर्वजों ने भोजन पकाने और उसे परोसने की एक बहुत ही वैज्ञानिक और पवित्र परंपरा विकसित की थी, जिसमें शुद्धता और स्वच्छता का सर्वोच्च स्थान था। लेकिन आज के व्यावसायिक दौर में वह नैतिकता कहीं खो गई है। जब कोई व्यापारी चंद सिक्कों के मुनाफे के लिए खाद्य पदार्थों में हानिकारक रसायन मिलाता है, तो वह केवल एक आर्थिक अपराध नहीं करता, बल्कि वह संपूर्ण मानवता के विरुद्ध अपराध करता है। यह एक प्रकार की मूक हिंसा है, जिसके परिणाम स्वरूप अनगिनत मासूम लोग विभिन्न बीमारियों का शिकार होकर अपने प्राण गंवा देते हैं। इस नैतिक पतन को रोकने के लिए केवल कानून का भय ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज के भीतर एक गहरी आत्ममंथन की प्रक्रिया भी आरंभ होनी चाहिए।
इन सभी प्रशासनिक प्रयासों के बीच हमें स्वास्थ्य विशेषज्ञों की उन चेतावनियों को भी गंभीरता से सुनना होगा, जो लगातार मिलावटी भोजन के दुष्प्रभावों के प्रति हमें आगाह करते रहते हैं। मिलावटी तेल और अस्वच्छ भोजन का लगातार सेवन करने से मनुष्य के शरीर में अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न हो जाते हैं। हृदय से जुड़े रोग, पाचन तंत्र की विफलता, यकृत की बीमारियां और यहां तक कि कर्क रोग जैसी जानलेवा बीमारियां भी इसी दूषित भोजन का परिणाम हैं। विशेष रूप से जब एक ही तेल को बार बार गर्म करके उपयोग में लाया जाता है, तो उसमें ऐसे खतरनाक रासायनिक तत्व पैदा हो जाते हैं, जो शरीर के भीतर जाकर जहर का काम करते हैं। इसलिए यह नितांत आवश्यक है कि न केवल घरों में बल्कि बाहर के आहार गृहों में भी उपयोग होने वाली सामग्रियों की गुणवत्ता पर कड़ी नजर रखी जाए।
इस पूरी व्यवस्था में सुधार केवल सरकारी डंडे के जोर पर नहीं लाया जा सकता। जब तक उपभोक्ता स्वयं जागरूक नहीं होंगे, तब तक मिलावटखोरों के हौसले पस्त नहीं होंगे। अक्सर लोग चंद रुपये बचाने के लालच में गुणवत्ता से समझौता कर लेते हैं। खुले बाजार से सस्ता तेल या बिना किसी प्रमाणिक विवरण वाला सामान खरीदना वास्तव में बीमारियों को अपने घर निमंत्रण देने जैसा है। एक जागरूक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह खरीदारी करते समय उत्पाद की सील, उसके निर्माण की तिथि, अंतिम उपयोग की तिथि और समूह क्रमांक की भली भांति जांच करे। यदि किसी भी खाद्य पदार्थ का रंग, गंध या स्वाद संदेह पैदा करता है, तो उसकी सूचना तुरंत संबंधित विभाग को दी जानी चाहिए। जनता की यह सतर्कता ही वह सबसे बड़ा हथियार है, जो इस काले कारोबार को जड़ से समाप्त कर सकती है।
अंततः हमें यह समझना होगा कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति केवल उसकी ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों या आर्थिक आंकड़ों से नहीं मापी जा सकती। एक सच्चे और सभ्य समाज की सबसे पहली पहचान यह होती है कि उसके नागरिकों को मिलने वाला भोजन कितना शुद्ध और सुरक्षित है। जब तक देश का प्रत्येक नागरिक इस बात को लेकर पूरी तरह से निश्चिंत नहीं हो जाता कि उसकी थाली में परोसा गया अन्न हर प्रकार की मिलावट से मुक्त है, तब तक खाद्य सुरक्षा का कोई भी लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। महाराष्ट्र में चलाया गया यह शुद्धिकरण अभियान पूरे देश के लिए एक प्रेरणा है। यदि अन्य राज्य भी इसी कठोरता और ईमानदारी के साथ अपने यहां जांच अभियान चलाएं और आम जनता भी अपने अधिकारों के प्रति सजग हो जाए, तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी थाली से मिलावट का यह विष हमेशा के लिए दूर हो जाएगा और समाज का हर वर्ग स्वस्थ एवं सुरक्षित जीवन व्यतीत कर सकेगा।





