झारखंड – विधानसभा के घेराव पर अड़ा ‘Gen Z’ आंदोलन

Jharkhand – 'Gen Z' movement adamant on laying siege to the Legislative Assembly

अशोक भाटिया

झारखंड की राजधानी रांची इस समय एक अभूर्ब युवा क्रांति की गवाह बन रही है, जिसे देश के इतिहास में “जेन जेड” आंदोलन के रूप में देखा जा रहा है । राज्य लोक सेवा आयोग और कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित भर्ती परीक्षाओं में कथित धांधली, पेपर लीक और भ्रष्टाचार के खिलाफ युवाओं का यह आक्रोश अब सड़कों पर लावा बनकर फूट पड़ा है । आज 10 अगस्त 2026 को आंदोलनकारियों द्वारा किया गया विधानसभा घेराव का ऐतिहासिक ऐलान इस जन-आक्रोश का सबसे निर्णायक मोड़ बन गया है । यह आंदोलन केवल नौकरियों की मांग भर नहीं है, बल्कि यह पूरी व्यवस्था की साख और युवाओं के अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है ।

झारखंड के इस युवा आंदोलन की नींव रातों-रात नहीं रखी गई है। राज्य के युवाओं में पिछले कई वर्षों से सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर गहरा असंतोष पनप रहा था। इसकी शुरुआत तब हुई जब 23 जुलाई 2026 को राज्य भर से हजारों परीक्षार्थी और नौकरी के इच्छुक उम्मीदवार अपने बिस्तर, किताबों और सालों पुराने एडमिट कार्डों से भरे प्लास्टिक फोल्डर्स लेकर रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में जुटने शुरू हुए। इन युवाओं के चेहरों पर केवल निराशा नहीं, बल्कि व्यवस्था के प्रति एक गहरा आक्रोश था। उम्मीदवारों का आरोप था कि हाल ही में आयोजित 14वीं JPSC संयुक्त प्रारंभिक परीक्षा और JSSC-CGL परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं बरती गईं, प्रश्नपत्र लीक किए गए और मेधावी छात्रों के भविष्य को चंद पैसों के लिए बेच दिया गया। छात्रों ने साफ कहा कि जिन परीक्षाओं ने उनके जीवन के अनमोल 10 साल छीन लिए, वे अब उनके साथ और खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करेंगे। यहीं से जन्म हुआ “JPSC-JSSC सुधार मंच” का, जिसने इस बिखरे हुए असंतोष को एक संगठित सत्याग्रह का रूप दे दिया।

इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता इसका डिजिटल और स्वायत्त स्वरूप है । पारंपरिक राजनीतिक आंदोलनों के विपरीत, इसे किसी बड़े राजनीतिक दल या पुराने छात्र संगठन ने हवा नहीं दी। यह देश की पहली ऐसी बड़ी युवा क्रांति है जिसे विशुद्ध रूप से “Gen Z” (1990 के दशक के उत्तरार्ध और 2010 के दशक की शुरुआत के बीच जन्मे युवा) द्वारा संचालित किया जा रहा है 。 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, विशेषकर इंस्टाग्राम रील्स, एक्स और व्हाट्सएप ग्रुप्स, इस आंदोलन के मुख्य नियंत्रण कक्ष बन गए। एक रील या एक पोस्ट के जरिए कुछ ही घंटों में हजारों छात्र रांची की सड़कों पर इकट्ठा होने लगे। छात्रों ने आंदोलन को किसी भी राजनीतिक लाभ से बचाने के लिए एक सख्त आचार संहिता लागू की है। मंच से किसी भी राजनेता को सीधे माइलेज लेने की अनुमति नहीं दी गई। युवाओं का साफ नारा है कि यह आंदोलन हमारा है और हमारा भविष्य किसी राजनीतिक सौदेबाजी के लिए नहीं है। आंदोलन में कोई एक आका नहीं है; यद्यपि आंदोलन अत्यधिक खंडित भी दिखाई देता है जहाँ अलग-अलग गुटों की मांगें थोड़ी भिन्न हैं, लेकिन उनका मूल लक्ष्य एक ही है—पारदर्शिता और न्याय।

शांतिपूर्ण सत्याग्रह के रूप में शुरू हुआ यह आंदोलन 2 अगस्त 2026 को उस समय और गंभीर हो गया, जब छात्र नेता और झारखंड लोकतांत्रिक क्रांति मोर्चा से जुड़े देवेंद्र नाथ महतो ने जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी 。 उनके साथ कई अन्य युवा भी अन्न-जल त्याग कर बैठ गए। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, अनशनकारी छात्रों की तबीयत बिगड़ने लगी। खुद देवेंद्र नाथ महतो ने बेहद कमजोर आवाज में अस्पताल या धरना स्थल से प्रशासन को चेताया कि सरकार छात्रों के प्रति “अत्यंत असंवेदनशील” रवैया अपना रही है । उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपनी जान की बाजी लगा रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा सिस्टम बनाया जा सके जहां पेपर लीक करना नामुमकिन हो जाए। इस अनशन ने राज्य के कोने-कोने में बैठे युवाओं के खून में उबाल ला दिया।

जैसे ही आंदोलन दूसरे सप्ताह में प्रवेश कर गया, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार पर दबाव बेहद बढ़ गया। सरकार ने चौतरफा घिरने के बाद बैकफुट पर आते हुए मंत्रियों की एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया और छात्रों को वार्ता के लिए आमंत्रित किया । 7 और 8 अगस्त 2026 को रांची के सर्किट हाउस और स्टेट गेस्ट हाउस में सरकार और छात्रों के 8 से 11 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडलों के बीच कई घंटों तक मैराथन बैठकें हुईं । सरकार ने अपनी ओर से दावा किया कि उसने छात्रों की लगभग 98% मांगें मान ली हैं। इसके तहत 14वीं JPSC पीटी परीक्षा को रद्द करने, त्वरित अदालतों के गठन और कड़ी कानूनी कार्रवाई पर सहमति जताई गई। यहाँ तक कि जेपीएससी के चेयरमैन नीरज सिन्हा के इस्तीफे और तीन मौजूदा सदस्यों (अजिता भट्टाचार्य, अनिमा हांसदा और जमाल अहमद) को राज्य अपराध जांच विभाग द्वारा नोटिस जारी कर तलब भी किया गया।

इस पूरे गतिरोध के बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने युवाओं से शांति की अपील करते हुए सरकार का रुख साफ किया। उन्होंने अपने बयान में कहा, “हमारी सरकार राज्य के युवाओं के भविष्य को लेकर पूरी तरह संवेदनशील है। जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं में यदि कोई विसंगति पाई गई है, तो उस पर त्वरित कार्रवाई करते हुए परीक्षा रद्द करने और जांच के आदेश दिए जा चुके हैं। हम एक कड़ा कानून लेकर आए हैं जिसके तहत पेपर लीक और धांधली करने वालों को उम्रकैद और करोड़ों रुपये के जुर्माने की सजा होगी। छात्र राजनीतिक दलों के बहकावे में न आएं, सरकार बातचीत के जरिए हर जायज मांग को पूरा करने के लिए तैयार है।”

इसके बावजूद वार्ता पूरी तरह बेनतीजा रही, क्योंकि सरकार पूरे मामले की जांच सीआईडी और प्रवर्तन निदेशालय से कराने पर अड़ी है, जबकि छात्र संगठन किसी भी राज्य स्तरीय एजेंसी पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं। वे पिछले 7 वर्षों में हुई सभी बड़ी परीक्षाओं की जांच सीधे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो से कराने की लिखित गारंटी और ठोस नीतिगत सुधारों की मांग पर अड़े हुए हैं। सरकार ने आंदोलन को शांत करने के लिए एक विशेष ईमेल आईडी भी जारी की ताकि छात्र अपने सुझाव दे सकें, लेकिन युवाओं का भरोसा इस कदर टूट चुका है कि वे अब डिजिटल आश्वासनों के बहकावे में आने को तैयार नहीं हैं।

दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी और विपक्ष के नेता अमर कुमार बाउरी ने इस आंदोलन को युवाओं के अस्तित्व की लड़ाई बताते हुए सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने विधानसभा के बाहर कड़ा रुख अपनाते हुए बयान दिया, “हेमंत सोरेन की सरकार ने झारखंड के लाखों युवाओं के भविष्य को पूरी तरह अंधकार में धकेल दिया है। पिछले 7 सालों से हर परीक्षा में सिर्फ भ्रष्टाचार और पेपर लीक का खेल चल रहा है। जब छात्र अपने हक के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं, तो सरकार लाठियों और निषेधाज्ञा के दम पर उनकी आवाज दबाना चाहती है। युवा राज्य की जांच एजेंसियों पर भरोसा खो चुके हैं, इसलिए जब तक इस पूरे महाघोटाले की सीबीआई जांच की सिफारिश नहीं की जाती, तब तक भाजपा सड़क से सदन तक युवाओं के साथ खड़ी रहेगी।

जब सरकार के साथ कई दौर की बातचीत बेनतीजा रही, तो JPSC-JSSC सुधार मंच ने आज 10 अगस्त 2026 को “विधानसभा घेराव” और “तिरंगा मार्च” का अंतिम शंखनाद कर दिया 。 चूंकि इस समय झारखंड विधानसभा का मानसून सत्र चल रहा है, इसलिए इस आंदोलन ने राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। आज सुबह से ही राज्य के सभी 24 जिलों से हजारों की तादाद में छात्र बसों, ट्रेनों और निजी वाहनों से रांची पहुंचने लगे हैं। जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से शुरू होकर यह जनसैलाब विधानसभा भवन की ओर बढ़ रहा है। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए रांची जिला प्रशासन पूरी तरह से ‘वॉर मोड’ में है। पूरे विधानसभा परिसर और उसके 750 मीटर के दायरे में धारा 163 लागू कर दी गई है ताकि भीड़ को प्रतिबंधित किया जा सके। शहर के चप्पे-चप्पे पर भारी पुलिस बल, रैपिड एक्शन फोर्स और वाटर कैनन तैनात किए गए हैं। सभी उपायुक्तों और पुलिस अधीक्षकों को हाई अलर्ट पर रखा गया है ताकि कानून-व्यवस्था की स्थिति नियंत्रण से बाहर न हो।

झारखंड का यह “Gen Z” आंदोलन केवल एक तात्कालिक परीक्षा विवाद नहीं है, बल्कि यह देश के जर्जर हो चुके प्रशासनिक और शैक्षणिक ढांचे के खिलाफ एक गहरी चेतावनी है 。 जब देश के शीर्ष राजनेता और मुख्य विपक्षी दल भी यह स्वीकार करने लगें कि देश की शिक्षा और भर्ती प्रणाली पूरी तरह “बर्बाद” हो चुकी है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि बीमारी कितनी गहरी है। सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि आज का युवा केवल वादों का ‘लॉलीपॉप’ देखकर चुप बैठने वाली पीढ़ी नहीं है। वे जागरूक हैं, संगठित हैं और उनके पास सोशल मीडिया जैसा एक वैश्विक हथियार है । यदि सरकारें समय रहते पारदर्शी भर्ती नीतियां नहीं बनाती हैं और युवाओं के रोजगार के साथ खिलवाड़ करने वाले “पेपर लीक माफिया” पर नकेल नहीं कसती हैं, तो रांची की सड़कों पर दिख रहा यह आक्रोश आने वाले समय में देश के हर राज्य की नियति बन सकता है। अब गेंद पूरी तरह से हेमंत सोरेन सरकार के पाले में है। उसे जिद छोड़कर या तो युवाओं की CBI जांच की जायज मांग को स्वीकार करना होगा या फिर एक पूरी युवा पीढ़ी के राजनीतिक और सामाजिक विद्रोह का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा। मेधा की इस आग को लाठियों या निषेधाज्ञा से दबाया नहीं जा सकता; इसे केवल न्याय और पूर्ण पारदर्शिता के मरहम से ही शांत किया जा सकता है।