ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज यानी एम्स इस साल अपनी स्थापना के 70 साल पूरे कर रहा है। सेवा, समर्पण और भरोसे का पर्याय है एम्स। इसलिए ही इधर देश भर के रोगी आते हैं। मैंने इस आलेख में एम्स की सात दशकों की दास्तान लिखी है। इसमें उन विभूतियों का भी जिक्र है जिन्होंने इसे श्रेष्ठ संस्थान के रूप में स्थापित किया।
विवेक शुक्ला
ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज यानी एम्स से करीब छह- सात किलोमीटर दूर राजधानी के पृथ्वीराज रोड का शोर अचानक गायब हो जाता है जब आप यॉर्क कब्रिस्तान में घुसते हैं। गेट के ठीक बाहर एक छोटी कब्र नजर आती है। इसकी हालत देखकर लगता है कि इस पर सालों से कोई फूल नहीं चढ़ाया गया होगा। लेकिन वहाँ सोई हुई हैं राजकुमारी अमृत कौर। वो महात्मा गांधी की करीबी सहयोगी, स्वतंत्र भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री और एम्स की फाउंडर थीं।
अमृत कौर कपूरथला राजघराने से थीं। उन्होंने ऑक्सफोर्ड से शिक्षा ली और आजादी के बाद नेहरू कैबिनेट में स्वास्थ्य मंत्री बनीं। शुरुआत में एम्स कोलकाता में खोलने का प्रस्ताव था, लेकिन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ. बी.सी. रॉय को यह ठीक नहीं लगा। नतीजा यह हुआ कि कोलकाता का नुकसान और दिल्ली का फायदा हो गया। इसकी 1952 में आधारशिला रखी गई। 18 फरवरी 1956 को अमृत कौर ने लोकसभा में विधेयक पेश किया। 2 जून 1956 को एआईआईएमएस अधिनियम पास हुआ और संस्थान को राष्ट्रीय महत्व का स्वायत्त दर्जा मिला। वे स्वयं एम्स की पहली अध्यक्ष रहीं और अपनी मृत्यु (1964) तक शासन-व्यवस्था को मजबूत करती रहीं।
आज सात दशक बाद भी एम्स मरीजों के लिए उम्मीद और भरोसे की जगह बना हुआ है। रोज भारत के हर कोने से सैकड़ों बीमार और उनके रिश्तेदार यहाँ आते हैं। मन में यकीन होता है कि स्वस्थ होकर घर लौटेंगे। डॉक्टर, नर्स और बाकी स्टाफ हर मरीज के इलाज में जान लगा देते हैं। एम्स में समाजवादी व्यवस्था लागू रहती है। भिखारी और बड़ा सरकारी अधिकारी एक ही कतार में खड़े होते हैं। डॉक्टर किसी की हैसियत या पैसे को देखकर फर्क नहीं करते। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के मरीजों का खास यकीन दिखता है।
अगर एम्स राजकुमारी अमृत कौर की सोच का नतीजा था तो पहले डायरेक्टर डॉ. बी.बी. दीक्षित ने इसे बेहतरीन अस्पताल और मेडिकल कॉलेज बनाया। वे महान डॉक्टर, अनुभवी शिक्षक और कुशल प्रशासक थे। पुणे के बी.जे. मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल रहे दीक्षित ने नियुक्तियों में योग्यता को ही आधार बनाया और रिसर्च को बढ़ावा दिया। उन्होंने शर्त रखी कि राजनीतिक दखल न हो। उनके समय में कई बेहतरीन प्रोफेसर आए।
अगर एम्स पर रोगियों का भरोसा है, तो इसका श्रेय यहां के उन तमाम डॉक्टरों और बाकी स्टाफ को जाता है। आप एम्स के राजेन्द्र प्रसाद नेत्र चिकित्सा केन्द्र में जाएं। यहां पर भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद की एक धड़ प्रतिमा रखी हुई है। इधर मधुबनी से रेटिना संबंधित जटिल सर्जरी के लिए आए सुरेन्द्र झा कह रहे थे कि बिहार में तो अनुभनी रेटिना चिकित्सक मिलते नहीं इसलिए यहां ही आन पड़ता है। वास्तव में यह भी कमाल की जगह है। यहां के सभी डॉक्टर सेवा भाव की मिसाल हैं। इन्होंने सैकड़ों सर्जरी की हैं और नेत्र विज्ञान के क्षेत्र में दर्जनों शोध पत्र प्रकाशित किए हैं। उनकी जिस दिन ओपीडी होती थी, वे उस दिन करीब तीस-चालीस रोगियों को देखते थे। वे रोगियों को देखकर वहां पर ही बता देते थे कि उनके इलाज का क्रम किस तरह से चलेगा। जिस दिन एम्स में ऑपरेशन होते हैं, ये डॉक्टर उस दिन कई रोगियों का ऑपरेशन करते थे। इधर के नेत्र विशेषज्ञों ने रेटिना की बीमारियों के इलाज के लिए नई तकनीकों और उपचार विधियों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसमें लेजर थेरेपी, इंट्राविट्रियल इंजेक्शन, और सर्जिकल प्रक्रियाओं में सुधार शामिल हैं। इनकी विशेषज्ञता व्यापक है, जिसमें मोतियाबिंद, ग्लूकोमा, रेटिना संबंधी बीमारियां और अन्य जटिल नेत्र रोग शामिल हैं।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय अग्रवाल कहते हैं कि एम्स की तासीर में सेवा की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। यहाँ हर साल देशभर के मेधावी छात्र एमबीबीएस, एमएस और एमडी में दाखिले लेते हैं और आगे देश-दुनिया के बेहतरीन डॉक्टर बनते हैं। मशहूर नामों में डॉ. दीपक चोपड़ा, शिकागो यूनिवर्सिटी के प्रो. विनय कुमार, गंगाराम के लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. अरविंदर सिंह सोइन, पूर्व डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया, टूटे दिलों को जोड़ने वाले डॉ. पी. वेणुगोपाल, ईएनटी विशेषज्ञ डॉ प्रतीक शर्मा, यूरोलिजिस्ट डॉ. राजीव सूद शामिल हैं। आँखों के विशेषज्ञ डॉ. जीवन सिंह तितियाल, डॉ. प्रदीप वेंकटेश और डॉ. तरुण दादा दुनिया के कुशल डॉक्टरों में गिने जाते हैं।
एम्स बनने के करीब दस साल बाद 10 मार्च 1967 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंटर फॉर ऑप्थैल्मिक साइंसेज की स्थापना हुई। भारत के पहले राष्ट्रपति के नाम पर बने इस केंद्र का मंत्र है-‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’। पहले डायरेक्टर डॉ. एल.पी. अग्रवाल बोस्टन से लौटे थे।
एम्स के आसपास रोज बीस-पच्चीस छोटे-बड़े भंडारे लगते हैं। ब्रेड-पकौड़ा, चाय, समोसा, कढ़ी-चावल, छोले-चावल जैसी चीजें मुफ्त बँटती रहती हैं। अंडरपास में दवा की दुकानें चौबीस घंटे खुली रहती हैं। तीन सेल्समैन, कैशियर और सहायक स्टाफ वाले काउंटर पर भीड़ लगी रहती है। जरूरत की दवा लगभग हमेशा मिल जाती है। रोज की बिक्री लाखों में बताई जाती है। बाहर इलाज कराने वाले भी अक्सर यहीं दवा लेने आते हैं।
एम्स का अब तक का सफर शानदार रहा है। देश के दूसरे सरकारी और निजी अस्पतालों को इससे सीखना चाहिए। सरकार की जिम्मेदारी है कि गाँव-शहर के अस्पतालों का स्तर ऊपर उठाए। प्राइवेट अस्पताल मरीजों को बेवजह टेस्ट के लिए मजबूर न करें।
एम्स ने देश के कई बड़े संकटों में भी अपनी सेवा का झंडा ऊँचा रखा। 31 अक्टूबर 1984 को जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर गोली चली, तो उन्हें तुरंत इसी अस्पताल में लाया गया। यहाँ के डॉक्टरों और स्टाफ ने उनकी जान बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। कोविड महामारी के दौरान भी एम्स में इलाज का सिलसिला एक पल के लिए नहीं रुका। हजारों संक्रमित मरीजों का उपचार यहाँ हुआ। डॉक्टर, नर्स और अन्य कर्मी अपनी जान जोखिम में डालकर सेवा करते रहे। ऑक्सीजन, वेंटिलेटर और आईसीयू की कमी के बावजूद उन्होंने मरीजों को निराश नहीं होने दिया।
एम्स वो जगह है जहाँ हुनर, सेवा और बराबरी एक साथ मिलते हैं। राजकुमारी अमृत कौर की शांत कब्र से लेकर अस्पताल के व्यस्त गलियारों और बाहर के जीवंत अंडरपास तक कहानी एक ही है। ईमानदारी से किए गए अच्छे काम का नतीजा आम लोगों का स्थायी भरोसा होता है। एम्स उसी भरोसे पर खड़ा है और लोगों की सेवा में लगा हुआ है।
एम्स वो जगह है जहाँ हुनर, सेवा और बराबरी एक साथ मिलते हैं। राजकुमारी अमृत कौर की शांत कब्र से लेकर अस्पताल के व्यस्त गलियारों और बाहर के जीवंत अंडरपास तक कहानी एक ही है। ईमानदारी से किए गए अच्छे काम का नतीजा आम लोगों का स्थायी भरोसा होता है। एम्स उसी भरोसे पर खड़ा है और लोगों की सेवा में लगा हुआ है।





