डॉ. विक्रम चौरसिया
निस्वार्थ भाव से मानव सेवा करना केवल एक नैतिक दायित्व नहीं, बल्कि सशक्त राष्ट्र-निर्माण की आधारशिला है। जब व्यक्ति अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्रहित को प्राथमिकता देता है, तभी राष्ट्र सर्वोपरि की भावना सार्थक होती है। मानवता किसी जाति, वर्ग या धर्म की सीमाओं में बंधी नहीं होती; वह समाज को जोड़ने वाली अदृश्य किंतु प्रभावशाली शक्ति है।
परोपकार अनेक रूपों में संभव है। यदि हमारे पास आर्थिक संसाधन उपलब्ध हैं, तो हम जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और शिक्षा का सहयोग दे सकते हैं। किसी निर्धन बच्चे की शिक्षा में सहायता करना वस्तुतः राष्ट्र के भविष्य को सशक्त बनाना है। एक शिक्षित युवा केवल अपने परिवार का नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज का संबल बनता है।
यदि आपके पास संसाधन सीमित हों, तब भी सेवा के मार्ग कभी बंद नहीं होते। बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देना, निरक्षरों को साक्षर बनाना, रक्तदान करना, वृद्धजनों की सहायता करना अथवा आपदा के समय सहयोग देना ,ये छोटे-छोटे प्रयास समाज में बड़े परिवर्तन की नींव रखते हैं। राष्ट्रप्रेम केवल नारों से नहीं, बल्कि आचरण से प्रकट होता है।जीवन का एक अटल सत्य यह भी है कि इस संसार में माँ के गर्भ से आने का समय तो प्रकृति ने निर्धारित 9 माह किया है, किंतु जाने का क्षण पूर्णतः अनिश्चित है। कोई व्यक्ति सौ वर्ष से अधिक जीवित रहता है, तो कोई अगले ही पल विदा हो जाता है। यही अनिश्चितता हमें स्मरण कराती है कि प्रत्येक श्वास अमूल्य है और प्रत्येक दिन सेवा का एक अवसर है।
मैं स्वयं विक्रम अपने विद्यार्थी जीवन से ही झुग्गी-बस्तियों के वंचित बच्चों को शिक्षित करने का प्रयास करता रहा हूँ। मेरा अनुभव है कि सेवा केवल दूसरों के जीवन में परिवर्तन नहीं लाती, बल्कि स्वयं के भीतर भी आत्मिक शांति और उद्देश्य की अनुभूति कराती है। जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था, स्वयं को पाने का सर्वोत्तम तरीका है स्वयं को दूसरों की सेवा में खो देना। आज के समय में यह संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक है।आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें कि जाति और धर्म की संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठकर मानवता, नैतिकता और राष्ट्रहित को सर्वोच्च स्थान देंगे। वंचितों की सहायता को अपना कर्तव्य समझेंगे और अपने आचरण से राष्ट्र को सुदृढ़ बनाएंगे। यही सच्ची इंसानियत है, यही राष्ट्रसेवा है, और यही एक जागरूक, समृद्ध तथा सशक्त भारत की पहचान है।





