निर्मल रानी
देश में धर्म व जाति के नाम पर नफ़रत परोसने का जो एक नियोजित षड़यंत्र रचा गया है और नाकारे नेताओं,सत्ता व मीडिया द्वारा देश को नफ़रत की आग में झोकने का जो दुष्प्रयास किया जा रहा है,ऐसा लगता है कि इन निखट्टुओं के साम्प्रदायिक एजेंडों को अब तक तमाशाई बनकर देखते रहने व इन पर चुप रहने वाली जनता अब इनकी नफ़रत का जवाब प्रेम,सद्भाव व भाईचारे से देने लगी है। पिछले कुछ ही दिनों में देश के अलग अलग राज्यों से ऐसे कई समाचार आये जिनसे यह पता चलता है कि देश के अमन पसंद लोग अब मूक दर्शक बनकर साम्प्रदायिक वैमनस्य को बढ़ता हुआ देखने के बजाये प्यार और मुहब्बत की मशाल जलाकर नफ़रत के स्याह अँधेरे को भागने की कोशिश करने लगे हैं। पिछले दिनों राजस्थान के टोंक ज़िले से ऐसी ही एक ख़बर आई। यहाँ निवाई तहसील के करेड़ा बुज़ुर्ग गांव के एक मंदिर परिसर में गत 22 फ़रवरी को भारतीय जनता पार्टी के एक पूर्व सांसद सुखबीर सिंह जौनपुरिया द्वारा कंबल वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसी कार्यक्रम के माध्यम से पूर्व सांसद जौनपुरिया लोगों को 28 फ़रवरी को अजमेर आने के लिए आमंत्रित कर रहे थे। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 28 फ़रवरी को अजमेर दौरे पर रहेंगे तथा एक जनसभा को भी संबोधित करेंगे।
प्रधानमंत्री के इसी दौरे को सफल बनाने के लिए राजस्थान सरकार, प्रशासन और भाजपा संगठन पूरी तरह जुटा हुआ है।
इसी उद्देश्य से राज्य भर में तरह तरह के छोटे कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। टोंक ज़िले के निवाई तहसील के करेड़ा बुजुर्ग गांव में पूर्व सांसद सुखबीर सिंह जौनपुरिया द्वारा कंबल वितरण कार्यक्रम भी इसी कड़ी का हिस्सा था।
परन्तु नफ़रती संगठन में राजनीति करने वाले पूर्व सांसद जौनपुरिया द्वारा इसी कार्यक्रम में नफ़रत की वह भाषा बोली गयी जिसने इस इलाक़े में पूर्व सांसद की ही फ़ज़ीहत करवा दी। कंबल बांटते समय उन्होंने भीड़ में बैठी एक महिला से उसका नाम पूछा, जब ग़रीब बुज़ुर्ग महिला ने अपना नाम ‘शकूरन बानो’ बताया तो यह नाम सुनकर जौनपुरिया ने बड़े ही नफ़रती अंदाज़ से कहा – “हट एक तरफ़, कंबल यहीं छोड़ दे” और बाद में उन्होंने अपने सहयोगी को कहा इसे “कंबल मत दे”।
साथ ही वे यह भी बोले, “जो मोदी को गाली देता है, उसे कंबल लेने का हक़ नहीं।” जौनपुरिया की इस अभद्र भाषा का वीडिओ वायरल होने के बाद इस इलाक़े में जौनपुरिया का विरोध होना शुरू हो गया। यह विरोध इस हद तक हुआ कि गांव के जिन हिन्दू परिवारों को कंबल मिला था उन्होंने भी मुस्लिम महिलाओं के साथ एकजुटता दिखाने हेतु अपने अपने कंबल वापस कर दिये। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने तो इसी गांव में मुस्लिम महिलाओं को कंबल बांटे और गांव वालों ने उस नफ़रती पूर्व सांसद का पुतला भी फूंका। “नफ़रत का जवाब मोहब्बत से” देने हेतु अल्पसंख्यक मोर्चा द्वारा 24 फ़रवरी को टोंक में सभी धर्मों की महिलाओं को समान रूप से कंबल बांटे जाने की भी ख़बर आई।
नफ़रत के बदले प्यार और मुहब्बत बांटने का ऐसा ही एक अन्य उदाहरण गत दिवस लखनऊ विश्वविद्यालय में भी देखने को मिला। पवित्र रमज़ान माह के दौरान विश्वविद्यालय में स्थित प्राचीन व ऐतिहासिक लाल बारादरी परिसर में मौजूद पुरानी मस्जिद के गेट को विश्वविद्यालय प्रशासन ने सुरक्षा कारण बता कर सील कर दिया और इस जगह भारी बैरिकेडिंग लगा दी। इसी मुग़ल कालीन मस्जिद में दशकों से लखनऊ विश्वविद्यालय के मुस्लिम छात्र नमाज़ अदा करते आ रहे हैं। प्रशासन ने इसे पुरानी इमारत बताकर व सुरक्षा के जोखिम का हवाला देकर इसे अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के बंद कर दिया।
इसके बाद जब मुस्लिम छात्रों को नमाज़ अदा करने हेतु मस्जिद के अंदर जाने से रोका गया, तो उन्होंने मजबूरीवश मस्जिद के बाहर खुले स्थान पर ही नमाज़ अदा की। इस दौरान विश्वविद्यालय के हिंदू छात्रों द्वारा मानव श्रृंखला बनाई गयी।
छात्रों ने एक दूसरे का हाथ पकड़कर गंगा-जमुनी तहज़ीब और सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल पेश की। हिंदू छात्र नमाज़ पढ़ रहे अपने मुस्लिम साथियों के चारों ओर सुरक्षा कवच बनकर इसलिये खड़े हो गए ताकि कोई नमाज़ में व्यवधान उत्पन्न न कर सके और नमाज़ शांति तरीक़े से पूरी हो सके। इतना ही नहीं बल्कि साम्प्रदायिक शक्तियों के विरुद्ध इन्हीं हिन्दू छात्रों ने प्रदर्शन किया तथा हिन्दू मुस्लिम एकता का संदेश भी दिया।
दरअसल साम्प्रदायिक शक्तियों को खदेड़ने की शुरुआत उत्तराखंड के कोटद्वार से गत 26 जनवरी को उस समय शुरू हुई जबकि बजरंग दल के सदस्यों ने वकील अहमद नाम के एक 70 वर्षीय बुज़ुर्ग मुस्लिम की ‘बाबा स्कूल ड्रेस’ नाम की दुकान के नाम को लेकर विवाद खड़ा किया। बजरंग दल के लोग दुकान का नाम बदलने की धमकी दे रहे थे। उनका कहना था कि ‘बाबा स्कूल ड्रेस’ का नाम स्थानीय हनुमान मंदिर सिद्धबली बाबा से मिलता-जुलता था। इसी विवाद के बीच दीपक कुमार कश्यप अपने दोस्त विजय रावत के साथ वहां जा पहुंचे। दीपक उत्तराखंड कोटद्वार में ही एक जिम ट्रेनर हैं।
वे यहाँ अपना जिम चलाते हैं तथा युवक युवतियों को बॉडी बिल्डिंग और फ़िटनेस की ट्रेनिंग देते हैं। दीपक ने ही उन्मादी भीड़ से बुज़ुर्ग मुस्लिम का बीच-बचाव करते हुए अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ बताया और साम्प्रदायिक एकता व सद्भाव का संदेश दिया। हालांकि इसके बाद दीपक को मुक़दमे से लेकर अपनी जिम की सदस्य्ता घटने तक के हालात का सामना करना पड़ा। उन्हें बजरंग दल समर्थकों से धमकियां मिलीं व उनके विरुद्ध विरोध प्रदर्शन भी हुये । परन्तु उनका यही कहना था कि “मैं हिंदू नहीं, मुसलमान नहीं, सिख नहीं, ईसाई नहीं—सबसे पहले इंसान हूं। मरने के बाद भगवान और इंसानियत को जवाब दूंगा।” यहाँ तक कि पुलिस ने दीपक के विरुद्ध सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के आरोप में प्राथमिकी भी दर्ज की। परन्तु दीपक की हिम्मत व उनके बुलंद हौसले ने उन्हें पूरे देश व दुनिया में साम्प्रदायिक सद्भाव के सच्चे प्रतिनिधि के रूप में शोहरत दिला दी। राहुल गाँधी सहित अनेक विशिष्ट लोगों ने मुहम्मद दीपक व उनके साथी विजय रावत से मुलाक़ात कर उनकी हौसला अफ़ज़ाई की। और इसी कोटद्वार की घटना के बाद देश में कई स्थानों से ऐसी ख़बरें सुनाई दे रही हैं जहाँ प्रेम व सद्भाव की बातें करने वालों के द्वारा नफ़रती चिंटुओं को खदेड़ा जा रहा है और शांतिप्रिय जनता द्वारा नफ़रत के सौदागरों के नफ़रती एजेंडे का जवाब प्रेम,सद्भाव व भाईचारे से दिया जा रहा है।





