महानगरों में जनसंख्या का बोझ कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है रैपिड रेल

Rapid Rail can play an important role in reducing the population burden in metropolitan cities

गुलशन राय खत्री

हाल ही में देश की पहली रैपिड रेल ने दिल्ली और मेरठ के बीच अपना सफर शुरू किया है। लगभग 82 किमी का ये सफर रैपिड रेल के जरिए महज एक घंटे से भी कम समय में पूरा होता है। लेकिन इस लिहाज से ये नया रेल सिस्टम महानगरों को आसपास के शहरों से जोड़ने के लिए क्रांतिकारी साबित हो सकता है। यानी ये महानगरों पर लगातार बढ़ रहे जनसंख्या दबाव को कम करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

वैसे तो भविष्य में दिल्ली जैसे महानगर पर पड़ने वाले जनसंख्या के दबाव का अनुमान 1956 में ही लगा लिया गया था। उसी वक्त दिल्ली के बाहर भी योजनाबद्ब विकेंद्रीकरण पर गंभीरता से विचार करने का सुझाव केंद्र सरकार के सामने आ गया था। लेकिन बाद में इसी अवधारणा के आधार पर 1985 में एनसीआर प्लानिंग बोर्ड का गठन किया गया था। उसी के बाद ही तीव्र गति से चलने वाली रैपिड रेल बनाने पर विचार किया गया।

इस वक्त सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि मुंबई, चेन्नै, हैदराबाद, बेंगलुरु, कोलकाता समेत कई बड़े महानगर जनसंख्या का दबाव झेल रहे हैं। अगर रैपिड रेल का ये प्रयोग कामयाब रहता है तो आने वाले वर्षों में इन महानगरों ही नहीं बल्कि दूसरे बड़े शहरों पर भी जनसंख्या का बोझ म करने में मदद मिलेगी। महानगरों से 80 से सवा सौ किमी की दूरी पर बसे छोटे शहरों तक अगर इस तरह का रैपिड रेल सिस्टम तैयार हो जाता है तो इससे बड़े शहरों में काम करने वाले लोग एक सौ किमी के आसपास की दूरी पर बसे छोटे शहरों में रहकर वहां से प्रतिदिन महानगरों में कामकाज के लिए आ जा सकते हैं।

जब सेटेलाइट टाउन को महानगरों से जोड़ने की परिकल्पना की गई थी, उसका मूल उद्देश्य ही यही था कि लोग महानगरों में सुबह कामकाज के लिए आएं और शाम को वापस अपने घर लौट जाएं। रैपिड रेल से ये उद्देश्य इसलिए पूरा हो सकता है, क्योंकि यात्री महज एक घंटे में लगभग सौ किमी की दूरी से महानगर या बड़े शहर में अपनी नौकरी या बिजनेस के लिए पहुंच सकता है। वापसी में भी वह डयूटी पूरी करके एक घंटे में ही दूर बसे शहर के अपने घर शाम को वक्त पर पहुंच सकता है।
इसका सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि महानगरों पर जनसंख्या का दबाव कम होने से प्रदूषण, ट्रैफिक जाम की समस्या को कम किया जा सकता है। इसके अलावा शहरों में स्लम और अनाधिकृत बस्तियों में भी कमी होगी। दूसरी ओर महानगरों से लगभग एक सौ किमी की दूरी पर बसे छोटे और मध्यम शहरों का भी विकास होगा और वहां भी स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर बनेंगे।

रैपिड रेल से रेलवे का भी फायदा
ऐसा नहीं है कि दूर दराज के शहरों से महानगरों में अभी लोग नहीं आते। अभी भी लोग आते हैं लेकिन उनकी संख्या सीमित है और वे लोग बसों और रेलवे पर निर्भर करते हैं। कायदे से भारतीय रेलवे का मुख्य कार्य लंबी दूरी की ट्रेनें चलाने का है। लेकिन उसे महानगरों से जुड़े एक से सवा सौ किमी की दूरी के लिए भी इंटरसिटी जैसी ट्रेनें चलानी पड़ती हैं। जिसका नतीजा ये है कि पटरियों पर इन ट्रेनों का भी बोझ बढ़ता है। बड़े शहरों के कई ट्रैक ओवरलोड हैं। जिसकी वजह से लंबी दूरी की ट्रेनें भी रफ्तार नहीं पकड़ पातीं और इंटरसिटी भी।

ऐसे में अगर रैपिड रेल चलती हैं तो ऐसे यात्रियों के लिए रेलवे को छोटी दूरी की ट्रेनें चलाने की जरुरत नहीं पड़ेगी और रेल की पटरियों पर बोझ कम होने से लंबी दूरी की ट्रेनों की संख्या और गति को बढ़ाया जा सकेगा।

इस तरह का ये प्रयोग भारत में पहली बार नहीं हो रहा। विकसित देशों में इस तरह की ट्रेनें चलती हैं। मसलन, बर्लिन में एस.बान, सियोल में जीटीएक्स, पेरिस में रीजनल रेल और लंदन में क्रास रेल भी इसी तरह की है। इन सभी ट्रेनों की खास बात ये है कि ये लगभग डेढ़ सौ किमी की रफ्तार से चलती हैं। दिल्ली मेरठ रैपिड रेल की भी गति 160 किमी प्रति घंटे की है और स्टेशनों पर रुकने के बावजूद इसकी औसत गति एक सौ किमी प्रति घंटा आती है यानी एक घंटे में सौ किमी का सफर पूरा। जबकि अगर गति के मामले में मेट्रो ट्रेनों से तुलना की जाए तो उन्हें हर एक से डेढ़ किमी पर रुकना होता है, जिससे उनकी औसत गति 35 किमी के आसपास ही होती है।

कई सवाल अभी भी बाकी
सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि तेज रफ्तार से चलने वाली रैपिड रेल का किराया क्या हर वर्ग के लोग वहन कर पाएंगे ? यही सबसे बड़ी चिंता है। इसका बड़ा कारण है इस तरह की परियोजनाओं की भारी भरकम लागत। दिल्ली मेरठ के बीच ही शुरू की गई इस रैपिड रेल लाइन की औसत लागत लगभग पौने चार सौ करोड़ रुपये प्रतिकिमी है। यानी इस तरह के परियोजनाओ को तैयार करने के लिए केंद्र व राज्य सरकारों के साथ ही अंतरराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों से लोन की जरुरत होगी। जाहिर है कि ये लोन कम ब्याज और आसान शर्तों के साथ मिल सकता है लेकिन इसके बावजूद ऋण को लौटाने के लिए जरुरी है कि उससे इतनी कमाई तो हो कि सभी खर्चों के अलावा ऋण लौटाया जा सके। जाहिर है कि ऐसे में अगर सभी खर्चों आकलन करके किराया तय होगा तो वह आम यात्री की जेब से बाहर हो सकता है।

इसका एक कारण ये भी है कि मौजूदा सिस्टम में जो यात्री फिलहाल रेल के जरिए आते हैं, उनका किराया अपेक्षाकृत काफी कम होता है। दिल्ली मेरठ जैसे पहले कॉरिडोर के साथ तो चिंता ये भी है कि रैपिड रेल कॉरिडोर के समानांतर ही दिल्ली मेरठ एक्सप्रेस वे भी है। पिछले साल लोकसभा में पेश आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय की स्थायी समिति की रिपोर्ट में भी ये चिंता जाहिर की गई है।

ऐसे में जरुरी है कि सरकार को इस दिशा में विचार करना होगा और ऐसी परियोजनाओं में यात्री टिकटों पर सब्सिडी का प्रावधान करना होगा। अगर सब्सिडी होगी तो किराया सस्ता होने से रैपिड रेल का उपयोग बढ़ेगा, अधिक लोग इसमें यात्रा करेंगे। जिसके अप्रत्यक्ष तौर पर कई फायदे मिलेंगे। मसलन, सब्सिडी देने से सरकार पर आर्थिक बोझ तो कुछ बढ़ेगा लेकिन बदले में प्रदूषण नियंत्रण, सड़कों के रखरखाव, सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली हानि जैसे कई मामलों में खर्चें भी बचेंगे।