बिनोद कुमार सिंह
स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार
भारत पर्व-त्योहारों का देश है—विविधताओं से भरा, किंतु सांस्कृतिक आत्मा से एकसूत्र में गुँथा हुआ। इसी सांस्कृतिक चेतना के विराट आकाश में यदि कोई उत्सव अपनी बहुरंगी छटा, लोकध्वनि, पौराणिक स्मृतियों और प्रेमरस की मधुरता के कारण सर्वाधिक जीवंत प्रतीत होता है, तो वह होली है। होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, यह ऋतु-परिवर्तन का सांस्कृतिक विधान, लोकजीवन का उत्स, संगीत और किंवदंतियों का आलोक तथा सामाजिक समरसता का सजीव प्रतीक है।
फाल्गुन के आगमन के साथ जब शीत ऋतु की कठोरता शिथिल पड़ती है, आम्र-मंजरियों की सुगंध वातावरण में घुलती है और प्रकृति नवयौवन से दीप्त होती है, तब भारतीय जनमानस में होली की स्मृतियाँ और परम्पराएँ जाग उठती हैं। यह केवल मौसम का परिवर्तन नहीं, जीवन के नवोन्मेष का संकेत है—जड़ता से चेतना की ओर, संकुचन से विस्तार की ओर। होली का पौराणिक आधार भारतीय मानस में गहरे प्रतिष्ठित है। भक्त प्रह्लाद, असुरराज हिरण्यकशिपु और होलिका की कथा धर्म और अधर्म, आस्था और अहंकार के शाश्वत संघर्ष की प्रतीक है। फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को प्रज्ज्वलित होलिका-दहन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु आत्मशुद्धि और सामाजिक चेतना का संस्कार है। अग्नि की परिक्रमा करते समय व्यक्ति अपने अंत:करण की नकारात्मकताओं को त्यागने और सत्य, करुणा तथा नवजीवन का संकल्प लेने का भाव जगाता है। कृषि-संस्कृति से जुड़े समाज में यह पर्व नई फसल के स्वागत का भी प्रतीक रहा है। खेतों की हरियाली, श्रम की सार्थकता और सामूहिक उल्लास—ये सब होली की अग्नि में मानो संस्कारित होते हैं। इस प्रकार होली केवल पौराणिक स्मृति नहीं, ग्रामीण जीवन की धड़कन भी है।
ब्रजभूमि में होली का स्वरूप विशिष्ट सांस्कृतिक आयाम ग्रहण करता है। मथुरा, वृंदावन और बरसाना की होली भारतीय लोकपरम्परा का सजीव उदाहरण है। यहाँ यह उत्सव केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण की प्रेमलीलाओं की सांस्कृतिक पुनर्रचना है। बरसाना की लठमार होली में स्त्रियाँ पारम्परिक परिधान धारण कर लाठियों के साथ प्रतीकात्मक नृत्य-नाट्य प्रस्तुत करती हैं और पुरुष ढाल लेकर उस रसपूर्ण परम्परा को निभाते हैं। यह आयोजन केवल हास्य-परिहास नहीं, लोकनाट्य की सशक्त अभिव्यक्ति है, जिसमें प्रेम का अल्हड़पन और सामाजिक संवाद का सहज स्वर मिलता है।
वृंदावन के मंदिरों में फूलों की होली का विशेष महत्व है। पुष्पवर्षा के बीच गाए जाने वाले होरी-गीत वातावरण को भक्ति और श्रृंगार-रस से परिपूर्ण कर देते हैं। “आज बिरज में होरी रे रसिया” जैसे पद केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति के संवाहक हैं। उनमें राधा का मान, कृष्ण की चंचलता, गोपियों की अनुरक्ति और ब्रज की रसमयी चेतना सजीव हो उठती है।
होली के साथ जुड़ी एक अन्य किंवदंती शिव-पार्वती से भी सम्बद्ध है। फाल्गुन की मादकता में जब कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग करने का प्रयास किया, तब शिव के तृतीय नेत्र की ज्वाला से उसका दहन हुआ। किंतु रति के करुण विलाप से प्रसन्न होकर शिव ने उसे अनंग रूप में पुनर्जीवन दिया। इस कथा में काम, संयम और करुणा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है—जो होली के प्रेमरस को एक आध्यात्मिक आधार प्रदान करता है।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में भी होरी का विशिष्ट स्थान है। धमार, ठुमरी और दादरा जैसी शैलियों में होली के पदों का गायन होता रहा है। श्रृंगार और भक्ति का यह अद्भुत संगम भारतीय संगीत परम्परा की गहराई को दर्शाता है। लोक और शास्त्र का यह सेतु ही हमारी सांस्कृतिक पहचान है।
उत्तर भारत में फाग या फगुआ के नाम से प्रचलित लोकगीत होली की आत्मा हैं। ढोलक, मंजीरा और झांझ की थाप पर गूँजते ये गीत समाज को एक सूत्र में बाँधते हैं। अवध में चौताल और धमाल की परम्परा, बिहार और पूर्वांचल में फगुआ की विशिष्ट शैली, राजस्थान में गेर नृत्य—ये सभी होली के विविध रंग हैं। पंजाब में आनंदपुर साहिब में आयोजित होला मोहल्ला सामुदायिक अनुशासन और शौर्य का प्रतीक है। पश्चिम बंगाल में डोल पूर्णिमा के अवसर पर कीर्तन और सांस्कृतिक शोभायात्राएँ इस पर्व को भक्ति और संगीत से आलोकित करती हैं। इस प्रकार क्षेत्रीय विविधताएँ मिलकर राष्ट्रीय एकता का विराट स्वर रचती हैं। प्रकृति से जुड़ी रंग-परम्परा भी होली की विशिष्ट पहचान रही है। टेसू या पलाश के फूलों से केसरिया रंग, गुलाब और कचनार की पंखुड़ियों से गुलाल, हल्दी और चंदन का प्रयोग—ये सब केवल सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और पवित्रता के प्रतीक थे। रंगों की यह सृष्टि प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और सामूहिक श्रम की संस्कृति को पुष्ट करती थी।
सामाजिक दृष्टि से होली समता और संवाद का पर्व है। रंग लगाने की परम्परा यह संदेश देती है कि बाह्य भेद अस्थायी हैं; अंत:करण का प्रेम ही शाश्वत है। ग्रामीण समाज में इस अवसर पर पुराने विवाद भुलाकर मेल-मिलाप की परम्परा रही है। समय के साथ होली का स्वरूप परिवर्तित अवश्य हुआ है। शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली ने इसकी अभिव्यक्ति को नया रूप दिया है—तेज ध्वनि वाले संगीत, कृत्रिम रंग और भव्य आयोजनों के माध्यम से। किंतु इसके मूल में स्थित प्रेम, उल्लास और सांस्कृतिक चेतना आज भी अक्षुण्ण है।
ब्रज की रसमयी होली, बरसाने की लठमार परम्परा, अवध का फाग, बिहार का फगुआ, राजस्थान की गेर, पंजाब का होला और बंगाल की डोल—ये सभी मिलकर होली को राष्ट्रीय सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बनाते हैं। विविधता में एकता का यह स्वरूप भारतीय संस्कृति की आधारशिला है। फाल्गुन की मदमस्त बयार में जब ढोलक की थाप और फाग के स्वर गूँजते हैं, तब प्रतीत होता है कि होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक आत्मा का उत्सव है। इसमें पौराणिक स्मृति, लोककला, संगीत, प्रकृति और सामाजिक समरसता का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है।
इसीलिए होली सदियों से हमारी सांस्कृतिक धारा में अविरल प्रवाहित है और आगे भी प्रेम, राग और रस के साथ समाज को एक सूत्र में बाँधती रहेगी—मानो हर द्वार पर यही मंगलकामना गूँजती रहे:
“सदानंद रहें यही द्वारे, मोहन खेले होरी हो।”





