4 मार्च को भारत के महान क्रांतिकारी लाला हरदयाल की पुण्यतिथि है। यह उस मनीषी को नमन करने का दिवस है, जिसने अपनी असाधारण बुद्धि और विद्वत्ता को स्वतंत्रता संग्राम की वेदी पर अर्पित कर दिया। गदर आंदोलन के प्रणेता हरदयाल ने कलम और विचार को हथियार बनाकर साम्राज्यवाद की जड़ों को चुनौती दी। उनका जीवन त्याग, तर्क और राष्ट्रनिष्ठा की प्रेरक गाथा है, जो आज भी युवाओं के हृदय में क्रांति की ज्योति प्रज्वलित करती है।
योगेश कुमार गोयल
4 मार्च का दिन भारतीय इतिहास के उस पन्ने की याद दिलाता है, जो शौर्य, विद्वत्ता और क्रांति के अद्भुत संगम से रचित है। इसी दिन मां भारती के एक ऐसे सपूत ने इस नश्वर संसार को त्याग दिया था, जिसने अपनी कुशाग्र बुद्धि को विलासिता का साधन बनाने के बजाय स्वतंत्रता की वेदी पर समिधा बना दिया था। लाला हरदयाल, एक ऐसा नाम, जो सुनते ही सैन फ्रांसिस्को के तटों से उठी गदर की लहरें और लाहौर की बौद्धिक चेतना एक साथ जीवंत हो उठती हैं। वे केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे बल्कि एक ऐसे मनीषी थे, जिन्होंने कलम और विचार को तलवार से अधिक धारदार बना दिया था।
14 अक्टूबर 1884 को दिल्ली के एक साधारण कायस्थ परिवार में जन्मे हरदयाल माथुर बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। उनकी मेधा का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि सेंट स्टीफेंस कॉलेज से संस्कृत में स्नातक और फिर सरकारी वजीफे पर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय जाने तक उनकी शैक्षणिक यात्रा स्वर्णाक्षरों में लिखी गई। लेकिन जिस समय अन्य युवा ब्रिटिश हुकूमत की चाकरी कर ऊंचे पदों के स्वप्न देख रहे थे, उस समय हरदयाल के भीतर स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति की अग्नि प्रज्वलित हो रही थी। उन्होंने अनुभव किया कि फिरंगियों की शिक्षा पद्धति भारतीयों को केवल ‘बाबू’ बनाने के लिए है, न कि राष्ट्र के निर्माण के लिए। इसी बोध ने उन्हें ऑक्सफोर्ड की छात्रवृत्ति और विलायती सुख-सुविधाओं को लात मारने पर विवश कर दिया।
लाला हरदयाल का व्यक्तित्व विरोधाभासों का एक सुंदर समन्वय था। वे जहां एक ओर संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे, वहीं दूसरी ओर पाश्चात्य दर्शन और राजनीति के भी गहरे जानकार थे। उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय अमेरिका में ‘गदर पार्टी’ की स्थापना के साथ शुरू होता है। जब वे अमेरिका और कनाडा में बसे प्रवासी भारतीयों से मिले तो उन्होंने उनकी आंखों में छिपे उस अपमान को पढ़ा, जो उन्हें गुलाम देश का नागरिक होने के कारण झेलना पड़ता था। हरदयाल ने समझा कि भारत की आजादी की लड़ाई केवल सीमाओं के भीतर रहकर नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ों पर प्रहार करके भी लड़ी जा सकती है। 1913 में उन्होंने ‘गदर’ समाचारपत्र का प्रकाशन शुरू किया, जिसके पहले अंक के शीर्षक ‘अंग्रेजी राज का दुश्मन’ ने ही फिरंगियों की नींद उड़ा दी थी।
उनका लेखन कोई साधारण गद्य नहीं था बल्कि वह सोई हुई आत्माओं को झकझोरने वाला संगीत था। वे लिखते थे, ‘देश के वीरों, हमें सिपाही चाहिए; सिपाही, जो अपनी जान दे सकें। हमें सेनापति चाहिए, जो रणनीतियां बना सकें।’ उनके शब्द सीधे दिल पर चोट करते थे। गदर आंदोलन ने केवल सिखों या पंजाबियों को ही नहीं बल्कि हर उस भारतीय को एक सूत्र में पिरो दिया, जो विदेश में रहकर भी अपनी मिट्टी की खुशबू के लिए तरस रहा था। हरदयाल ने सिखाया कि संगठन की शक्ति क्या होती है। उनके प्रयासों से ही करतार सिंह सराभा और विष्णु गणेश पिंगले जैसे वीर योद्धा तैयार हुए, जिन्होंने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया।
हरदयाल जी के विचार केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं थे। वे एक महान समाज सुधारक और तर्कशास्त्री भी थे। उनकी पुस्तक ‘हिंट्स फॉर सेल्फ कल्चर’ आज भी उन युवाओं के लिए एक मार्गदर्शिका है, जो अपने व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना चाहते हैं। वे मानते थे कि शारीरिक, बौद्धिक और नैतिक उन्नति के बिना कोई भी राष्ट्र महान नहीं बन सकता। उनकी विद्वत्ता का लोहा दुनिया मानती थी, वे एक साथ कई भाषाओं के ज्ञाता थे और उनकी स्मरण शक्ति के किस्से आज भी किंवदंती की तरह सुने जाते हैं।
इस महान क्रांतिकारी का मार्ग कांटों से भरा था। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जब उन्होंने जर्मनी के सहयोग से भारत को स्वतंत्र कराने की योजना बनाई तो ब्रिटिश खुफिया तंत्र उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गया। उन्हें एक देश से दूसरे देश शरण लेनी पड़ी। कभी स्विट्जरलैंड, कभी जर्मनी, तो कभी स्वीडन, निर्वासन का यह दुख उन्होंने केवल इसलिए सहा ताकि भारत माता की बेड़ियां काटी जा सकें। लंबी यात्राओं और निरंतर संघर्ष ने उनके शरीर को जर्जर कर दिया था लेकिन उनके विचारों की प्रखरता अंत तक कम नहीं हुई। 4 मार्च 1939 को अमेरिका के फिलाडेल्फिया में रहस्यमयी परिस्थितियों में इस महामानव का निधन हो गया। यद्यपि वे अपनी आंखों से भारत को स्वतंत्र होते नहीं देख सके लेकिन उन्होंने स्वतंत्रता की जो मशाल जलाई थी, उसी की लौ में 1947 का सूर्योदय हुआ।
लाला हरदयाल ने सिखाया कि देशभक्ति केवल नारों में नहीं बल्कि त्याग और निरंतर स्वाध्याय में बसती है। वे एक ऐसे ‘ऋषि-क्रांतिकारी’ थे, जिन्होंने अपनी बुद्धि को राष्ट्र का कवच बनाया। उनके विचार आज भी हमें याद दिलाते हैं कि स्वतंत्रता का मूल्य निरंतर सतर्कता और बौद्धिक श्रेष्ठता है। उनकी स्मृति हमारे हृदय में सदा उस ध्रुव तारे की तरह चमकती रहेगी, जो अंधकार में डूबी मानवता को मार्ग दिखाता है। भारत के इस अनमोल रत्न को शत-शत नमन।





