सुनील कुमार महला
5 मार्च को ‘विश्व ऊर्जा दक्षता दिवस’ मनाया जाता है। वास्तव में,इस दिवस को मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य ऊर्जा के विवेकपूर्ण उपयोग और ऊर्जा संरक्षण के प्रति जनजागरूकता बढ़ाना है। ऊर्जा दक्षता का अर्थ है-कम ऊर्जा में अधिक कार्य करना। अर्थात् सीधे शब्दों में कहें तो बिजली, पेट्रोलियम, गैस जैसे संसाधनों का सीमित और समझदारीपूर्ण उपयोग कर बेहतर परिणाम प्राप्त करना। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज बढ़ती जनसंख्या, तीव्र औद्योगीकरण और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच ऊर्जा दक्षता वैश्विक प्राथमिकता बन चुकी है।
यह भी उल्लेखनीय है कि ‘विश्व ऊर्जा संरक्षण दिवस’ प्रत्येक वर्ष 14 दिसंबर को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य ऊर्जा बचत और उसके सतत उपयोग के महत्व को रेखांकित करना है। विश्व की लगातार बढ़ती जनसंख्या के बीच वर्तमान समय में ऊर्जा संकट एक गंभीर विषय है। आज विकासशील देशों में ऊर्जा की मांग निरंतर बढ़ रही है, जबकि कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे पारंपरिक संसाधन बहुत ही सीमित हैं। इनका अत्यधिक उपयोग कार्बन उत्सर्जन(ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन) को बढ़ाता है, जो ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण है। इसलिए ऊर्जा का तर्कसंगत उपयोग आज की महती आवश्यकता है।
यहां पाठकों को बताता चलूं कि विश्व ऊर्जा दक्षता दिवस की शुरुआत वर्ष 1998 में ऑस्ट्रिया में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन से मानी जाती है, जहां ऊर्जा संकट और उसके समाधान पर वैश्विक स्तर पर चर्चा हुई। इसके बाद 5 मार्च को ऊर्जा दक्षता के प्रति जागरूकता दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देने में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसी संस्था ने ऊर्जा दक्षता को ‘पहला ईंधन’ कहा है, क्योंकि यह वह ऊर्जा है जिसे उत्पन्न करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। यानी बचाई गई ऊर्जा ही सबसे सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा है।
हाल के वर्षों में इस दिवस की थीम ऊर्जा संक्रमण, नेट-ज़ीरो उत्सर्जन तथा स्वच्छ एवं हरित ऊर्जा जैसे विषयों पर केंद्रित रही है। कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज-28(कॉप 28) में वैश्विक स्तर पर यह संकल्प लिया गया कि 2030 तक ऊर्जा दक्षता सुधार की वार्षिक दर को 4% तक पहुंचाया जाएगा।
यदि वैश्विक स्तर पर उद्योग अपनी ऊर्जा दक्षता में केवल 20% सुधार कर लें, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में खरबों डॉलर की बचत संभव है। ऊर्जा दक्षता में निवेश पारंपरिक ऊर्जा उत्पादन की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक रोजगार उत्पन्न करता है। ‘नेगावाट’ यानी बचाई गई बिजली की अवधारणा आज जलवायु परिवर्तन से लड़ने का प्रभावी और किफायती साधन बन चुकी है। इससे उपभोक्ताओं के बिजली बिल में 20–30% तक की कमी संभव है।
भारत के संदर्भ में देखें तो देश विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और जनसंख्या के कारण ऊर्जा की मांग में वृद्धि हो रही है, फिर भी भारत ने ऊर्जा तीव्रता (प्रति इकाई जीडीपी पर ऊर्जा खपत) कम करने में उल्लेखनीय प्रगति की है। भारत ने 2030 तक अपनी जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता में उल्लेखनीय कमी लाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
भारत की स्थापित बिजली क्षमता 500 गीगावाट (जीडब्लयू) से अधिक हो चुकी है, जिसमें लगभग 51% हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से आता है। ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देने में ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसके ‘स्टार रेटिंग’ कार्यक्रम ने हज़ारों करोड़ यूनिट बिजली और अरबों रुपये की बचत की है।
एनर्जी एफिशिएंसी सर्विसेज लिमिटेड द्वारा संचालित ‘उजाला योजना’ विश्व का सबसे बड़ा घरेलू एलईडी वितरण कार्यक्रम है, जिसके अंतर्गत लगभग 37 करोड़ एलईडी बल्ब वितरित किए गए हैं। इससे हर वर्ष अरबों यूनिट बिजली की बचत और लाखों टन कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है। इसी प्रकार ‘परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड’ (पीएटी) योजना उद्योगों के लिए एक प्रभावी ऊर्जा दक्षता मॉडल सिद्ध हुई है।
ऊर्जा दक्षता प्राप्त करने के लिए घरेलू, औद्योगिक और परिवहन क्षेत्रों में ठोस कदम आवश्यक हैं। घरों में एलईडी बल्ब और 5-स्टार रेटिंग वाले उपकरणों का उपयोग, अनावश्यक विद्युत उपकरणों को बंद रखना तथा प्राकृतिक रोशनी का अधिक प्रयोग करना उपयोगी उपाय हैं। उद्योगों में ऊर्जा ऑडिट, आधुनिक मशीनों का उपयोग और अपशिष्ट ऊष्मा का पुनः उपयोग ऊर्जा बचत में सहायक है। परिवहन क्षेत्र में सार्वजनिक साधनों और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना भी प्रभावी कदम है।
विश्व स्तर पर ऊर्जा दक्षता को सतत विकास और जलवायु परिवर्तन से निपटने का प्रमुख साधन माना जा रहा है। विकसित देश उन्नत तकनीक, सख्त मानकों और नवीकरणीय ऊर्जा के बढ़ते उपयोग के माध्यम से ऊर्जा तीव्रता को लगातार कम कर रहे हैं। हालांकि भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है, फिर भी तकनीकी उन्नयन, निवेश और जन-जागरूकता के क्षेत्र में और अधिक प्रयास अपेक्षित हैं।
अंततः कहा जा सकता है कि ऊर्जा दक्षता केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम ही नहीं, बल्कि आर्थिक सुदृढ़ता का भी आधार है। यदि हम ऊर्जा का संतुलित और जिम्मेदार उपयोग करें, तो न केवल संसाधनों की रक्षा कर सकते हैं, बल्कि स्वच्छ, टिकाऊ और समृद्ध भविष्य की नींव भी रख सकते हैं।





