पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति- मुख्यमंत्री टकराव- क्या यह संवैधानिक गरिमा का प्रश्न है या चुनावी राजनीति की रणनीति?

The President-Chief Minister clash in West Bengal – is it a question of constitutional dignity or a strategy of electoral politics?

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

वैश्विक स्तरपर पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है,जहाँ संवैधानिक मर्यादाएँ, प्रोटोकॉल,राजनीति और चुनावी रणनीतियाँ एक साथ टकराती नज़र आती हैं। वर्ष 2026 के विधानसभा चुनावों का काउंटडाउन शुरू हो चुका है और इसी बीच राष्ट्रपति के उत्तर बंगाल दौरे को लेकर पैदा हुआ विवाद राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। इस विवाद के केंद्र में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और भारतीय प्रधानमंत्री के बीच राजनीतिक टकराव भी दिखाई देता है। एक ओर केंद्र सरकार और सत्तारुड़ पार्टी इसे राष्ट्रपति पद की गरिमा और संविधान के सम्मान से जोड़कर देख रही है, वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल की सीएम इसे चुनाव से पहले की राजनीतिक रणनीति और केंद्र द्वारा राज्य सरकार को घेरने की कोशिश बता रही हैं।

यह विवाद केवल प्रोटोकॉल या औपचारिकताओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह केंद्र-राज्य संबंधों, संवैधानिक मर्यादाओं और चुनावी राजनीति की जटिलताओं को भी उजागर कर रहा है।लोकतंत्र में प्रोटोकॉल केवल औपचारिक नियम नहीं होते बल्कि वे संस्थाओं की गरिमा और व्यवस्था को बनाए रखने का माध्यम होते हैं।राष्ट्रपति प्रधानमंत्री या अन्य संवैधानिक पदों के लिए निर्धारित प्रोटोकॉल इसलिए बनाए गए हैं ताकि शासन प्रणाली में अनुशासन और सम्मान बना रहे। यदि इनका पालन नहीं होता तो इससे संस्थागत असंतुलन पैदा हो सकता है।आने वाले महीनों में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की घोषणा होने की संभावना है। ऐसे में यह विवाद चुनावी प्रचार का प्रमुख मुद्दा बन सकता है।सत्ताधारी पार्टी इसे संवैधानिक सम्मान और आदिवासी गौरव के मुद्दे के रूप में प्रस्तुत कर सकती है, जबकि पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी इसे केंद्र की राजनीतिक साजिश बताकर अपने समर्थकों को लामबंद करने की कोशिश करेगी। इस पूरे विवाद में मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। विभिन्न समाचार माध्यमों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर इस घटना को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है,कुछ लोग इसे राष्ट्रपति का अपमान मान रहे हैं,जबकि कुछ इसे राजनीतिक विवाद बता रहे हैं।लोकतंत्र में मीडिया जनमत को प्रभावित करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है और ऐसे मामलों में उसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

साथियों बात अगर हम राष्ट्रपति का उत्तर बंगाल दौरा और विवाद की शुरुआत को समझने की करें तो,पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब माननीय राष्ट्रपति पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में आयोजित नौवें अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने पहुँचीं। यह कार्यक्रम एक निजी संगठन इंटरनेशनल संथाल काउंसिल द्वारा आयोजित किया गया था।मूल रूप से इस सम्मेलन का आयोजन दार्जिलिंग जिले के बिधाननगर क्षेत्र में प्रस्तावित था, जहाँ बड़ी संख्या में संथाल आदिवासी समुदाय के लोगों के पहुँचने की संभावना थी। हालांकि बाद में सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन और अन्य प्रशासनिक कारणों का हवाला देते हुए कार्यक्रम स्थल को बदलकर बागडोगरा एयरपोर्ट के पासगोशाईंपुर कर दिया गया।राष्ट्रपति ने स्वयं इस परिवर्तन परअसंतोष व्यक्त किया और कहा कि नया स्थल छोटा था,जिसके कारण हजारों संथाल समुदाय के लोग कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके। राष्ट्रपति की यह नाराजगी धीरे-धीरे राजनीतिक विवाद का रूप लेने लगी।

साथियों बात अगर हम प्रोटोकॉल का प्रश्न और राष्ट्रपति की नाराजगी को समझने की करें तो राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में इस बात पर भी आश्चर्य व्यक्त किया कि उनके स्वागत के लिए न तो मुख्यमंत्री और न ही राज्य सरकार का कोई वरिष्ठ मंत्री उपस्थित था।उन्होंने यह भी कहा कि व्यक्तिगत रूप से उन्हें इससे कोई शिकायत नहीं है, लेकिन राष्ट्रपति पद के लिए निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन किया जाना चाहिए। उन्होंने मुख्यमंत्री को छोटी बहन बताते हुए यह सवाल भी किया कि क्या वे उनसे नाराज हैं?। राष्ट्रपति के इस बयान ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया, क्योंकि यह पहली बार था जब किसी कार्यक्रम में राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से प्रोटोकॉल के पालन पर प्रश्न उठाया। इस बयान के बाद सत्तारुड़ पार्टी ने इसे संवैधानिक गरिमा से जोड़कर मुद्दा बनाया और राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए।

साथियों बात अगर हम प्रधानमंत्री और सत्ताधारी पार्टी की प्रतिक्रिया को समझने की करें तो पीएम ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी और कहा कि यह केवल राष्ट्रपति का अपमान नहीं बल्कि भारत के संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं का भी अपमान है। उन्होंने यह भी कहा कि द्रौपदी मुर्मू स्वयं आदिवासी समुदाय से आती हैं और उनके विकास के लिए समर्पित हैं, ऐसे में उनके कार्यक्रम में अव्यवस्था होना और राज्य सरकार का उचित सहयोग न मिलना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। भाजपा नेताओं ने इसे आदिवासी अस्मिता से जोड़ते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने राष्ट्रपति के कार्यक्रम को गंभीरता से नहीं लिया। सत्तारुड़ पार्टी के लिए यह मुद्दा राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण था क्योंकि बंगाल में आदिवासी समुदाय एक महत्वपूर्ण वोट बैंक माना जाता है।

साथियों बात अगर हम पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री कापलटवार और राजनीतिक आरोप को समझने की करें तो उन्होंने इन सभी आरोपों को सिरे सेखारिज करते हुए कहा कि यह कार्यक्रम राज्य सरकार का नहीं बल्कि एक निजी संस्था का आयोजन था।उनके अनुसार राज्य प्रशासन ने पहले ही राष्ट्रपति सचिवालय को यह सूचित कर दिया था कि आयोजकों की तैयारी पर्याप्त नहीं है और इतनी बड़ी सभा को संभालने की क्षमता उनके पास नहीं है।उन्होंने यह भी कहा कि यदि राष्ट्रपति साल में एक बार किसी कार्यक्रम में आती हैं तो वे स्वयं स्वागत केलिए जा सकती हैं,लेकिन यदि चुनाव से पहले बार-बार कार्यक्रम होते हैं तो हर बार उपस्थित रहना संभव नहीं है। उन्होंने सत्ताधारी पार्टी पर आरोप लगाया कि राष्ट्रपति के पद का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है। ममता बनर्जी का यह बयान राजनीतिक दृष्टि से बेहद तीखा माना गया क्योंकि उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि राष्ट्रपति सत्ताधारी पार्टी की नीतियों और निर्देशों से प्रभावित होकर कार्य कर रही हैं।

साथियों बात अगर हम इस मुद्दे को केंद्र–राज्य टकराव का नया आयाम इस दृष्टिकोण से समझने की करें तो यह विवाद धीरे-धीरे केंद्र और राज्य सरकार के बीच टकराव का रूप लेने लगा। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी और पूछा कि मुख्यमंत्री,मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक राष्ट्रपति के स्वागत के लिए क्यों उपस्थित नहीं थे। साथ ही यह भी पूछा गया कि कार्यक्रम स्थल और मार्ग की व्यवस्था ब्लू बुक के अनुसार क्यों नहीं की गई। इन सवालों ने इस मामले को केवल राजनीतिक बहस से आगे बढ़ाकर प्रशासनिक और संवैधानिक जांच के दायरे में ला दिया।

साथियों बात अगर हम ब्लू बुक क्या है और इसकामहत्व क्या है इसको समझने की करें तो,इस विवाद के बाद सबसे अधिक चर्चा जिस शब्द की हुई वह था ब्लू बुक। भारत में जब राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या प्रधानमंत्री किसी राज्य के दौरे पर जाते हैं तो उनकी सुरक्षा, स्वागत और अन्य व्यवस्थाएँ गृह मंत्रालय द्वारा तैयार किए गए एक विशेष प्रोटोकॉल दस्तावेज़ के अनुसार होती हैं जिसे ब्लू बुक कहा जाता है। यह दस्तावेज़ अत्यंत गोपनीय होता है और केवल चुनिंदा अधिकारियों को ही उपलब्ध कराया जाता है। इसमें राष्ट्रपति के आगमन से लेकर कार्यक्रम स्थल की व्यवस्था, सुरक्षा, मार्ग, झंडा, राष्ट्रगान, बैठने की व्यवस्था और आपातकालीन योजनाओं तक हर छोटी- बड़ी बात का विस्तृत विवरण होता है।ब्लू बुक के प्रमुख प्रावधान- ब्लू बुक के अनुसार जब राष्ट्रपति किसी राज्य में पहुँचते हैं तो राज्यपाल और मुख्यमंत्री या उनके द्वारा नामित मंत्री को हवाईअड्डे पर स्वागत के लिए उपस्थित रहना चाहिए। यदि मुख्यमंत्री किसी कारण से उपस्थित नहीं हो सकते तो मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति के लिए तय मार्ग पूरी तरह साफ- सुथरा होना चाहिए, सुरक्षा व्यवस्था चाक- चौबंद होनी चाहिए और कार्यक्रम स्थल पर सभी बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध होनी चाहिए। यह केवल औपचारिकता नहीं बल्कि राष्ट्र की गरिमा और संवैधानिक शिष्टाचार का हिस्सा माना जाता है।पश्चिम बंगाल की मुख्य सचिव ने गृह मंत्रालय को भेजी गई रिपोर्ट में कहा कि कार्यक्रम पूरी तरह एक निजी संगठन द्वारा आयोजित था और राज्य सरकार की भूमिका सीमित थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि प्रशासन ने पहले ही आयोजकों की तैयारियों को लेकर चिंता व्यक्त की थी और राष्ट्रपति सचिवालय को इस बारे में सूचित कर दिया गया था। इसके साथ ही रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया कि मुख्यमंत्री और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की अनुपस्थिति प्रशासनिक कारणों से थी और प्रोटोकॉल का कोई जानबूझकर उल्लंघन नहीं किया गया।

साथियों बात अगर हम इसका राजनीतिक विश्लेषण: चुनावी रणनीति या संवैधानिक मुद्दा को समझने की करें तो, राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव निकट हैं। सत्ताधारी पार्टी लंबे समय से बंगाल में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है और आदिवासी समुदाय को अपने पक्ष में लाने की रणनीति पर काम कर रही है। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी भी इस समुदाय में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए प्रयासरत है। ऐसे में राष्ट्रपति के कार्यक्रम को लेकर उठा विवाद चुनावी राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है।

साथियों बात अगर हम संवैधानिक गरिमा और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को समझने की करें तो यह घटना एक बड़े प्रश्न को भी जन्म देती है कि क्या संवैधानिक पदों को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से अलग रखा जा सकता है। भारत के संविधान में राष्ट्रपति को देश का प्रथम नागरिक माना गया है और उनका पद दलगत राजनीति से ऊपर माना जाता है। लेकिन जब राजनीतिक दल इस प्रकार के विवादों को चुनावी मुद्दों में बदल देते हैं तो इससे संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी प्रश्न उठने लगते हैं।यह विवाद भारत के संघीय ढांचे में केंद्र और राज्यों के संबंधों पर भी प्रकाश डालता है। भारतीय संविधान संघीय व्यवस्था पर आधारित है जिसमें केंद्र और राज्य दोनों की अपनी- अपनी शक्तियाँ और जिम्मेदारियाँ होती हैं। लेकिन जब राजनीतिक मतभेद बढ़ जाते हैं तो प्रशासनिक और संवैधानिक मुद्दे भी टकराव का कारण बन जाते हैं। पश्चिम बंगाल का यह मामला इसी प्रवृत्ति का उदाहरण माना जा रहा है। आदिवासी राजनीति का आयाम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं और उनका राजनीतिक-सामाजिक महत्व भी अत्यंत बड़ा है। इसलिए इस विवाद को आदिवासी अस्मिता से जोड़कर देखा जाना भी स्वाभाविक है। भाजपा इस मुद्दे को आदिवासी सम्मान के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस इसे राजनीतिक प्रचार का हिस्सा बता रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि आदिवासी राजनीति भी बंगाल चुनाव में एक महत्वपूर्ण कारक बनने जा रही है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि संवैधानिक मर्यादा और लोकतांत्रिक संतुलन की आवश्यकता जरूरी है पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति के दौरे को लेकर उत्पन्न हुआ विवाद केवल एक प्रोटोकॉल विवाद नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र के कई आयामों को उजागर करता है। यह घटना दिखाती है कि चुनावी राजनीति, संवैधानिक संस्थाओं और संघीय ढांचे के बीच संतुलन बनाए रखना कितना आवश्यक है। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संवैधानिक मर्यादाओं और संस्थाओं का सम्मान बना रहे। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह विवाद किस दिशा में जाता है, क्या यह केवल चुनावी मुद्दा बनकर रह जाएगा या इससे भविष्य में प्रोटोकॉल और केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर कोई नई व्यवस्था विकसित होगी।