विश्व मौसम विज्ञान दिवस : झुलसती प्रकृति और बेपटरी होता मौसम: क्या हम प्रकृति की कराह सुन पा रहे हैं?

World Meteorological Day: Scorching nature and derailed weather: Are we able to hear nature's cries?

दिलीप कुमार पाठक

विकास की जिस अंधी और चमकदार राह पर हम आज सरपट दौड़ रहे हैं, वह दरअसल कुदरत के साथ किए गए एक बहुत बड़े विश्वासघात की कीमत पर खड़ी है। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ सफलता की ऊँचाई को कंक्रीट के मीनारों से नापा जा रहा है, लेकिन उस ऊँचाई के नीचे दबती जा रही मिट्टी और सिसकता वातावरण अब किसी की प्राथमिकता में नहीं है। समस्या केवल तापमान बढ़ने की नहीं, बल्कि उस प्राकृतिक अनुशासन के पूरी तरह ध्वस्त होने की है, जो सदियों से जीवन का आधार रहा है। आज का मनुष्य अपनी कृत्रिम सुख-सुविधाओं में इतना आत्ममुग्ध है कि उसे ऊपर तने उस ‘थके हुए आकाश’ की कराह सुनाई नहीं देती, जो अब और बोझ सहने की शक्ति खो चुका है।

मौसम का यह बेपटरी होता मिजाज दरअसल हमारे भीतर बढ़ते उस असीमित लालच का प्रतिबिंब है, जिसे हमने ‘प्रगति’ का नाम दे रखा है। जब चैत्र की शुरुआत में ही सूरज की किरणें झुलसाने लगें, तो इसे महज भौगोलिक परिवर्तन मानकर नहीं छोड़ना चाहिए। यह प्रकृति का वह मौन लेकिन तीखा विरोध है, जो वह हमारे अनियंत्रित हस्तक्षेप के खिलाफ दर्ज कर रही है। हमने विलासिता के लिए नदियों के रास्ते बदले, पहाड़ों को छलनी किया और उन जंगलों को उजाड़ दिया जो धरती के असली फेफड़े थे। आज उसी का नतीजा है कि ऋतुओं का संतुलन पूरी तरह अस्त-व्यस्त है और हम तकनीक के तमाम दावों के बावजूद प्रकृति की इस अनिश्चितता के सामने असहाय खड़े हैं। यह अनिश्चितता केवल मौसम के मिजाज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे भविष्य की बुनियाद को भी खोखला कर रही है। जब हम कुदरत के चक्र से छेड़छाड़ करते हैं, तो हम केवल एक मौसम नहीं खोते, बल्कि उस पूरी व्यवस्था को दांव पर लगा देते हैं जो हमें भोजन और सुरक्षा प्रदान करती है। हवाओं की बदलती दिशा और बादलों का यह अनजाना व्यवहार दरअसल उस संतुलन के बिगड़ने की गवाही है, जिसे हमने अपनी महत्वाकांक्षाओं की वेदी पर चढ़ा दिया है। हम जिस धरती को अपनी जागीर समझ बैठे हैं, वह अब अपनी सहनशक्ति की अंतिम सीमा पर खड़ी होकर हमें आगाह कर रही है। गंभीरता इस बात में है कि हमने ‘मौसम’ को केवल डिजिटल आंकड़ों और सैटेलाइट तस्वीरों तक सीमित कर दिया है। हमारे पास यह जानने की तकनीक तो है कि बारिश कब होगी, लेकिन यह समझने की संवेदना खत्म हो गई है कि प्रकृति ऐसा व्यवहार क्यों कर रही है। जब किसान की साल भर की मेहनत एक रात की बेमौसम ओलावृष्टि में मिट्टी हो जाती है, तो वह केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि उस प्राचीन भरोसे का टूटना है जो मनुष्य का प्रकृति के साथ था। आधुनिक मौसम विज्ञान चेतावनी तो दे रहा है, लेकिन समाज आत्ममुग्धता की नींद में सोया है। हम अंतरिक्ष में बस्तियां बसाने के सपने देख रहे हैं, जबकि अपनी ही धरती के बढ़ते बुखार का हमारे पास कोई ईमानदार इलाज नहीं है। सबसे बड़ा नैतिक संकट उस विरासत का है, जो हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ‘ऋण’ के रूप में छोड़ रहे हैं। विरासत का अर्थ केवल बैंक बैलेंस नहीं होता; असली विरासत वह शुद्ध और स्वस्थ पर्यावरण है जो संतानों का जन्मसिद्ध अधिकार है। अगर हम उन्हें ऐसी दुनिया दे रहे हैं जहाँ सूरज की रोशनी जानलेवा और नदियाँ केवल गंदे नालों का अवशेष हैं, तो हमारी तमाम प्रगति एक बड़ी ऐतिहासिक असफलता ही कहलाएगी। हम आज जो संसाधन बेरहमी से उजाड़ रहे हैं, वे उन नन्हीं आंखों की अमानत हैं जिन्हें कल इसी झुलसती धरती पर बसेरा तलाशना है। क्या हम इतने स्वार्थी हो चुके हैं कि अपनी विलासिता के लिए अपने ही बच्चों का भविष्य गिरवी रख दें?

‘विश्व मौसम विज्ञान दिवस’ का महत्व केवल रस्म अदायगी तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह दिन आत्म-साक्षात्कार का है कि विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धि मशीनों का निर्माण नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाना होना चाहिए था। हमें वापस उस सादगी की ओर मुड़ना होगा जहाँ प्रकृति को ‘कच्चा माल’ नहीं, बल्कि एक ‘जीवंत अस्तित्व’ माना जाता था। कुदरत की सहनशीलता अब जवाब दे रही है। पेड़ों की छांव, नदियों की शीतलता और आसमान की पवित्रता को बहाल करना अब केवल विकल्प नहीं, बल्कि हमारे जीवित रहने की एकमात्र शर्त है। प्रकृति अभी केवल कराह रही है, हमें उसे विलाप करने से रोकना होगा। आज का यह गंभीर चिंतन ही कल की सुरक्षित सुबह का आधार बन सकता है।