शक्तिशाली सेना बनाम खाली जेब: कूटनीति के चक्रव्यूह में फंसा अमेरिकी स्वाभिमान

Powerful military vs. empty pockets: American pride caught in a maze of diplomacy

दिलीप कुमार पाठक

दुनिया के नक्शे पर जब भी युद्घ की आहट होती है, तो सबसे पहले व्हाइट हाउस की हलचलें तेज हो जाती हैं। लेकिन ये युद्घ अमेरिका के कुछ अलग है, और महंगा भी पड़ रहा है, एक तरफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर अमेरिकी मिसाइलें ईरान के आसमान को चीर रही हैं, तो दूसरी तरफ पेंसिलवेनिया और ओहायो के गैस स्टेशनों पर खड़ा एक आम अमेरिकी नागरिक अपनी खाली होती जेब देख रहा है। आज की कड़वी सच्चाई यही है कि वाशिंगटन की सैन्य ताकत जितनी बढ़ रही है, वहां के आम आदमी का भरोसा अपनी सरकार और अपनी अर्थव्यवस्था पर उतना ही कम होता जा रहा है। ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका फर्स्ट का नारा तो दिया था, लेकिन आज का मंजर देखकर ऐसा लगता है जैसे युद्ध की जिद ने उस वादे को ही हाशिए पर धकेल दिया है।

राजनीतिक गलियारों में आज ट्रंप की स्थिति किसी मज़ाक से कम नहीं रह गई है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने चिल्ला-चिल्लाकर कहा था कि वे अमेरिका को अंतहीन युद्धों से बाहर निकालेंगे, लेकिन आज वे खुद एक नए और भीषण युद्ध के नायक बने बैठे हैं। इसे नियति का क्रूर मजाक ही कहेंगे कि जिस शांति का वादा उन्होंने किया था, उसे उन्होंने मिसाइलों के धुएं में उड़ा दिया है। वैश्विक मंच पर ट्रंप की छवि एक ऐसे नेता की बनती जा रही है जो कहता कुछ है और करता कुछ और है। नाटो देशों को फंडिंग रोकने की धमकी देना और फिर उन्हीं से युद्ध में सहयोग मांगना, उनकी कूटनीतिक अपरिपक्वता को जगजाहिर कर रहा है। आज दुनिया के कई देशों में ट्रंप के विरोधाभासी बयानों पर चर्चा हो रही है और कूटनीति के जानकार इसे हड़बड़ी में लिया गया आत्मघाती कदम बता रहे हैं, हैरानी की बात यह है कि ट्रंप जिस सुपरपावर होने का दंभ भर रहे हैं, उसकी बुनियाद घर के भीतर ही दरक रही है। जब राष्ट्रपति टीवी पर अपनी मिसाइलों की मारक क्षमता गिनाते हैं, तब मिडिल क्लास अमेरिकी अपने बच्चों की स्कूल फीस और घर के किरायों के जुगाड़ में माथापच्ची कर रहा होता है। यह कैसा राष्ट्रवाद है जो अपने ही लोगों को महंगाई की आग में झोंककर विदेशी धरती पर अपनी धाक जमाने की कोशिश कर रहा है? लोग अब दबी जुबान में पूछने लगे हैं कि क्या एक बिजनेसमैन राष्ट्रपति को इतना भी मुनाफा-नुकसान समझ नहीं आता कि जंग की कीमत हमेशा आम लोगों की थाली से वसूली जाती है? ट्रंप का अहंकार आज उन्हें उस मोड़ पर ले आया है जहां उनके अपने समर्थक भी अब उनके फैसलों पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। कूटनीति की मेज पर बैठे बड़े खिलाड़ी उनके इस व्यवहार को गंभीरता से लेने के बजाय एक अस्थिर नेतृत्व के रूप में देख रहे हैं। यही वह बिंदु है जहां एक महान देश का मुखिया दुनिया के सामने उपहास का पात्र बन जाता है।

आंकड़ों की बात करें तो स्थिति और भी भयावह है। युद्ध की आहट मात्र से अमेरिका में महंगाई दर ने खतरे के निशान को पार कर लिया है। शेयर बाजार में हर रोज अरबों डॉलर स्वाहा हो रहे हैं। एक आम अमेरिकी परिवार, जो पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबा था, अब बढ़ती तेल की कीमतों और महंगे राशन से बेहाल है। वहां के आधे से ज्यादा नागरिक अब यह मानने लगे हैं कि सरकार को अपनी सेना की ताकत दिखाने से ज्यादा अपनी जनता की फिक्र करनी चाहिए। एक ऐसा देश जिसके पास दुनिया को तबाह करने वाली सबसे आधुनिक मिसाइलें तो हैं, लेकिन अपने नागरिकों को सस्ता ईंधन और मानसिक शांति देने का कोई ठोस रास्ता नहीं है। मानवीय नजरिए से देखें तो यह सिर्फ डॉलर और सेंट का मामला नहीं है। यह उस अमेरिकी सपने के टूटने की कहानी है, जिसे दिखाकर वोट मांगे गए थे। युद्ध के मोर्चे पर डटे सैनिकों के परिवार आज डरे हुए हैं, वहीं मध्यम वर्ग के लिए मंदी शब्द अब सिर्फ खबर नहीं, बल्कि उनके घर की दहलीज पर खड़ी हकीकत बन चुका है। ट्रंप की नीतियां आज एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस गई हैं, जहां से बाहर निकलने का हर रास्ता या तो और बड़े युद्ध की ओर जाता है या फिर आर्थिक तबाही की ओर। कूटनीति की बिसात पर मोहरे तो हिल रहे हैं, लेकिन जीत का अहसास कहीं गायब है। अंत में, यह समझना जरूरी है कि कोई भी राष्ट्र केवल अपनी सैन्य शक्ति से महान नहीं बनता। असली महानता तब आती है जब उस राष्ट्र का नागरिक खुद को सुरक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न महसूस करे। आज अमेरिका सैन्य रूप से भले ही सबसे ताकतवर दिख रहा हो, लेकिन एक आम नागरिक की कमजोर जेब उस खोखली ताकत की पोल खोल रही है। ट्रंप का यह युद्ध प्रेम उन्हें इतिहास में एक रक्षक के तौर पर दर्ज कराएगा या एक ऐसे शासक के रूप में जो अपने ही फैसलों में उलझ गया, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल, वाशिंगटन के गलियारों में जो चर्चा है, वह दरअसल उस बेचैनी की है जो बता रही है कि कैसे एक गलत सौदे ने देश के भविष्य को दांव पर लगा दिया है।