मुकेश गुप्ता
आजकल की डिजिटल क्रांति में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर विज्ञापन को सबसे स्मार्ट और प्रभावी तरीका बताया जाता है। बड़ी-बड़ी ब्रांड्स और डिजिटल एजेंसियाँ भी इस धारणा को मजबूती देती हैं कि फेसबुक, इंस्टाग्राम या यूट्यूब पर आपके विज्ञापन को यदि लाखों व्यूज या लाइक्स मिल रहे हैं तो मान लीजिए आपके उत्पाद की पहुँच हर व्यक्ति तक हो गई। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है?
डिजिटल एडवरटाइजिंग का सच – स्किप, म्यूट और इग्नोर
हाल ही में आई एक रिसर्च के मुताबिक भारत में 10 में से 7 लोग डिजिटल विज्ञापनों को या तो म्यूट कर देते हैं, फौरन स्किप कर देते हैं या पूरी तरह इग्नोर कर देते हैं। लगातार विज्ञापनों की बाढ़ ने उपभोक्ताओं में विज्ञापन से ऊब (ad fatigue) बढ़ा दी है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि डिजिटल नेटवर्क्स पर विज्ञापन ‘कस्टमर से संवाद’ में असफल हैं। अक्सर लोग जैसे ही विज्ञापन आता है, उसे बंद या स्किप कर देते हैं, जिससे आपका संदेश आम जनता तक पहुँच ही नहीं पाता।
ट्रेडिशनल मीडिया – मजबूरी नहीं, बल्कि प्रभावशाली माध्यम
अब अगर बात करें ट्रेडिशनल मीडिया (अखबार, रेडियो, टीवी, आउटडोर – होर्डिंग्स, पोस्टर्स आदि) की, तो यहाँ विज्ञापन अनदेखा करना लगभग नामुमकिन है। जो व्यक्ति अखबार पढ़ रहा है, यदि उसका पेज विज्ञापन तक जाता है, तो उसकी नजर जरूर जाएगी। रेडियो पर कोई कार्यक्रम सुन रहे हैं, तो बीच में आए विज्ञापन को सुनना ही पड़ेगा। टीवी देख रहे हों या ट्रैफिक सिग्नल पर खड़े हों – होर्डिंग्स दिख ही जाते हैं। यहाँ ‘स्किप’ करने का विकल्प नहीं है। यही वजह है कि ट्रेडिशनल एडवरटाइजिंग आज भी ब्रांड विश्वसनीयता के लिए सबसे कारगर माना जाता है।
रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट: हकीकत और अनुभव
कई व्यवसायियों और विज्ञापनदाताओं के अनुसार डिजिटल एड्स पर जितना पैसा लगता है, उसकी तुलना में व्यावहारिक और त्वरित रिटर्न (ROI) अपेक्षाकृत कम मिलता है। डिजिटल मीडिया के व्यूज, लाइक्स, क्लिक्स या शेयर का असली ग्राहक तक कोई ठोस असर नहीं पहुंचता। इसके उलट, ट्रेडिशनल एडवरटाइजिंग में व्यय किया पैसा ज़्यादा प्रभावशाली रिजल्ट देता है और ब्रांड की विश्वसनीयता भी बढ़ाता है।
डिजिटल की लहर – किसके लिए?
डिजिटल मीडिया को सबसे अधिक बढ़ावा वे लोग देते हैं जिनका व्यवसाय उसी से चलता है – जैसे डिजिटल एजेंसियाँ और डेटा मैनेजमेंट कंपनियाँ। वे डिजिटल की चमक–दमक का प्रचार करते हैं, लेकिन कई ब्रांड्स और कंपनियों को इसमें वैसा फाइनेंशियल रिटर्न नहीं मिलता, जैसी उम्मीद की जाती है।
क्या करें? – संतुलित दृष्टिकोण अपनाएं
मीडिया प्लानिंग में ‘सिर्फ डिजिटल’ पर निर्भर रहना भारी भूल हो सकती है। बेहतर यही होगा कि डिजिटल और ट्रेडिशनल, दोनों माध्यमों का संतुलन बनाए रखें। हर ब्रांड, हर प्रोडक्ट और हर संदेश के लिए एक उपयुक्त प्लेटफॉर्म होता है। अधिकतम प्रभाव के लिए सभी विकल्पों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन बहुत जरूरी है। पुराने, भरोसेमंद अखबार, रेडियो, टीवी और आउटडोर एडवरटाइजिंग को नजरअंदाज करना गणना में नुकसान दे सकता है। डिजीटल के साथ ट्रेडिशनल को भी प्राथमिकता दें।
“यह एड फैटीग एड्स की संख्या के कारण नहीं, बल्कि उनके उपभोक्ताओं के साथ जुड़ाव न बना पाने के कारण है।” – द ट्रेड डेस्क रिपोर्ट
अखबार की घटती अहमियत – सच्चाई या भ्रम?
अक्सर लोग कहते हैं कि आजकल अखबारों की सर्कुलेशन घट रही है या अखबार को पढ़ता ही कौन है। मगर यह बात वे लोग करते हैं जिन्हें करंट अफेयर्स, समाज या देश-दुनिया के हालातों में कोई रुचि नहीं है। उनका वास्तविक सरोकार केवल अपने व्यक्तिगत जीवन और सीमित परिवार तक होता है, या केवल पैसा कमाना ही प्राथमिकता है। वे कहते हैं कि अखबार या मैगजीन्स बेमतलब हैं। शायद मामूली फर्क आया हो, लेकिन मेरा खुद का अनुभव ये है कि अगर सुबह का अखबार न मिले, तो दिन की शुरुआत ही अधूरी लगती है। यह भावना मैंने बहुत सारे परिवारों में देखी है, खासतौर से व्यापारियों और टॉप लेवल एग्जीक्यूटिव्स में।
निष्कर्ष
केवल डिजिटल मीडिया के व्यूज, लाइक्स और क्लिक्स को देखकर विज्ञापन की सफलता नहीं माप सकते। असली असर वही विज्ञापन देता है जिसे दर्शक देखे या सुने और जो उसके दिमाग में उतर जाए। इसलिए डिजिटल और ट्रेडिशनल दोनों का संतुलन रखना ही समझदारी है – तभी विज्ञापन अभियान असल मायने में सफल कहलाएगा।





