प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
जब आसमान आग उगलने लगे, बादल कहर बनकर टूट पड़ें और धरती की दरारें किसान की हथेली से भी गहरी हो जाएं, तब केवल फसल नहीं, पूरा जीवन उजड़ जाता है। बीते वर्षों में भारत के करोड़ों किसानों ने यही दर्द झेला है। 2025 में करीब 9.47 मिलियन हेक्टेयर फसल क्षेत्र सूखा, बाढ़ और लू जैसी चरम मौसम घटनाओं से प्रभावित हुआ, जिससे फसलों को भारी नुकसान हुआ। जहां कभी हरियाली लहराती थी, वहां निराशा का सन्नाटा छा गया। लेकिन इसी अंधेरे से एक नई उम्मीद उभरी है। जलवायु-अनुकूल खेती (क्लाइमेट रेजिलिएंट फार्मिंग) अब केवल खेती का तरीका नहीं, बल्कि किसान के भविष्य की सबसे मजबूत ढाल बन चुकी है।
प्रकृति से लड़कर नहीं, उसके साथ चलकर ही खेती सुरक्षित बनती है। वर्षों तक किसान एक खेत में केवल एक फसल बोते रहे। मौसम बिगड़ा, तो पूरी मेहनत एक झटके में खत्म हो गई। अब खेतों में बदलाव दिख रहा है। गेहूं के साथ दालें, तिलहन, मोटे अनाज और सब्जियां भी उगाई जा रही हैं। यदि गर्मी गेहूं को नुकसान पहुंचाए, तो दूसरी फसलें किसान की कमाई बचा लेती हैं। इससे मिट्टी की ताकत बनी रहती है और उत्पादन भी स्थिर रहता है। ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों में इस तरीके से फसल नुकसान काफी हद तक घटा है। अब किसान समझ रहे हैं— खेत में जितनी अधिक विविधता होगी, उतनी ही अधिक सुरक्षा भी मिलेगी।
मिट्टी बची रहे, तभी खेती की ताकत कायम रहेगी। वर्षों तक उपेक्षित यह मिट्टी रासायनिक उर्वरकों से कमजोर हो गई थी—नमी, उर्वरता और जीवन शक्ति खो गई थी। अब जलवायु-अनुकूल खेती ने इसे सुधारना शुरू किया है। मिट्टी स्वास्थ्य पत्रक ने किसानों को बताया कि किस खेत को किस पोषण की जरूरत है। गोबर, कम्पोस्ट, जैविक खाद और फसल अवशेषों से बनी खाद का प्रयोग तेजी से बढ़ा है। नतीजा साफ है—मिट्टी लंबे समय तक नमी रखती है, कम बारिश में भी जड़ें सूखी नहीं होतीं। जैविक तत्व मिट्टी को इतना मजबूत बनाते हैं कि तेज धूप, सूखा और अनियमित बारिश में भी फसल सुरक्षित रहती है। इसलिए आज मिट्टी केवल जमीन नहीं, यह खेत की जीवित शक्ति और किसान की सबसे बड़ी सुरक्षा बन चुकी है।
जहां खेती बारिश पर निर्भर हो, वहां पानी की हर बूंद अनमोल है। पहले एक हेक्टेयर खेत की सिंचाई में लगभग 10 हजार लीटर पानी लगता था, फिर भी फसल सुरक्षित नहीं रहती थी। अब ड्रिप और स्प्रिंकलर इरिगेशन ने यह तस्वीर बदल दी है—वही खेत अब केवल 4 हजार लीटर पानी में सींचे जा रहे हैं। जलवायु-अनुकूल खेती हर बूंद बचाने की सीख देती है। वर्षा जल संचयन, खेत तालाब, जलग्रहण और भूजल पुनर्भरण जैसे उपायों से सूखे क्षेत्रों में नई उम्मीद जगी है। किसान अब बारिश का पानी बहने नहीं देते, बल्कि कठिन दिनों के लिए सहेजते हैं। इससे पानी, बिजली और सिंचाई की लागत घटती है, और जहां पहले सूखा फसल नष्ट कर देता था, वहां अब फसल बचने की संभावना दोगुनी हो गई है।
बदलते मौसम के सामने अब खेती ने हार मानना छोड़ दिया है। ऐसे गेहूं तैयार हुए हैं जो कम पानी में भी मजबूत रहते हैं, ऐसे धान विकसित हुए हैं जो बाढ़ में भी नहीं डूबते, और ऐसी दालें सामने आई हैं जो तेज गर्मी व लू झेल सकती हैं। इसी ने खेती में नई क्रांति पैदा की है। 2014 से 2024 के बीच भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने 2900 फसल किस्में विकसित की हैं, जिनमें से 2661 जलवायु-अनुकूल हैं। राष्ट्रीय जलवायु-अनुकूल कृषि नवाचार योजना के जरिए ये बीज गांव-गांव पहुंच रहे हैं। इनके साथ शून्य जुताई, फसल अवशेष प्रबंधन और सामुदायिक बीज भंडार जैसी व्यवस्थाएं भी जुड़ रही हैं। पंजाब, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई गांवों में इन उपायों से फसल हानि 25 से 35 प्रतिशत तक घट चुकी है।
अब किसान अकेला नहीं, पूरा गांव मौसम की मार से लड़ रहा है। जलवायु-अनुकूल खेती की सबसे बड़ी ताकत यही है। देश के 151 जलवायु-संवेदनशील जिलों में 448 जलवायु-अनुकूल गांव बन चुके हैं। किसान उत्पादक संगठन, स्वयं सहायता समूह और ग्राम समितियां मिलकर मौसम, बाजार, बीज और पानी की जानकारी बांट रही हैं। कृषि विज्ञान केंद्र में महिलाएं और युवा प्रशिक्षण लेकर पशुपालन, मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन और मत्स्यपालन जैसे काम भी कर रहे हैं। इससे आय के कई रास्ते खुल रहे हैं। एक फसल खराब हो जाए, तब भी दूसरा काम परिवार को संभाले रखता है। यही कारण है कि यह मॉडल केवल खेती नहीं, गांव की नई ताकत बन गया है।
अब असर खेतों में साफ दिखाई दे रहा है। जहां पहले मौसम की मार से फसलों का नुकसान काफी अधिक होता था, वहीं जलवायु-अनुकूल खेती अपनाने वाले क्षेत्रों में नुकसान काफी कम हो गया है। किसानों की आय 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ी है। मिट्टी फिर से उपजाऊ हो रही है, जलस्तर सुधर रहा है और खेतों में जैव विविधता लौट रही है। जिन खेतों से पक्षी और छोटे जीव गायब हो गए थे, वहां फिर जीवन दिखाई देने लगा है। मिट्टी की कार्बन रोकने की क्षमता भी बढ़ रही है, जिससे पर्यावरण को लाभ मिल रहा है। 651 जिलों में जलवायु जोखिम का अध्ययन हो चुका है और 310 जिलों के लिए विशेष योजनाएं बन चुकी हैं। यह केवल खेती की जीत नहीं, आने वाले कल की सुरक्षा है।
अब समय आ गया है कि जलवायु-अनुकूल खेती कुछ इलाकों तक नहीं, पूरे देश तक पहुंचे। हर खेत, हर गांव और हर किसान इसका हिस्सा बने। सरकार, कृषि वैज्ञानिक, किसान संगठन और स्थानीय संस्थाएं मिलकर काम करें, तो भारत खेती का नया वैश्विक मॉडल बन सकता है। सबसे छोटे किसान तक बेहतर बीज, पानी बचाने की तकनीक, प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता पहुंचनी चाहिए। जिस दिन देश का हर खेत मौसम की मार के सामने मजबूती से खड़ा होगा, उस दिन किसान केवल सुरक्षित नहीं, समृद्ध भी होगा। आने वाले वर्षों में यही मॉडल भारत को खाद्य सुरक्षा, मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था और विकसित भारत 2047 की दिशा में सबसे आगे ले जाएगा।





