बर्बरता के मैन्युफैक्चरिंग हब में सभ्यता और शांति का महायज्ञ

A great sacrifice of civilization and peace in the manufacturing hub of barbarism

विनोद कुमार विक्की

अमेरिका और ईरान के बीच हुए हालिया संघर्ष को यदि जान-माल की क्षति के दुखद पहलू से थोड़ी देर के लिए अलग रख दिया जाए, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि दुनिया को एक ‘लाइव एक्शन एंटरटेनमेंट शो’ भी देखने को मिला।

ईरान–इजरायल–अमेरिका तनाव के इस चालीस दिवसीय प्रकरण में जितने बम और मिसाइल नहीं गिरे, उससे कहीं अधिक ‘बातों की बमबारी’ हुई और मुँह से मिसाइल दागे गए।

किसी ने एक सप्ताह में युद्ध समाप्त करने का दावा किया, तो किसी ने एक रात में सभ्यता मिटा देने की चेतावनी दे डाली। बयानबाज़ी ऐसी कि मानो मिसाइलों से ज्यादा रेंज शब्दों में हो!

“अगर हम पर हमला हुआ तो हम भारत पर हमला कर देंगे” जैसी पाक ध्वनियां भी हवा में गूंजायमान हुई। कूटनीति कम, डायलॉगबाज़ी ज्यादा, पूरा माहौल किसी अंतरराष्ट्रीय ‘एक्शन फिल्म’ का कामेडी ट्रेलर लगता रहा।

नोबेल शांति पाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अशांति फैलाने की अनोखी रणनीति अपनाई गई। पहले तनाव बढ़ाओ, फिर शांति वार्ता कराओ—और अंत में किसी अशांत प्रिय मुल्क को शांति-दूत बनाओ।

सबसे मजेदार बात यह रही कि युद्ध में शामिल दोनों पक्ष खुद को विजेता घोषित कर रहे हैं। यानी मैच ड्रॉ नहीं हुआ, बल्कि दोनों टीमें ट्रॉफी लेकर घर गईं! अब यह युद्ध था, कूटनीति थी या आईपीएल का फाइनल, यह समझना आम जनता के बस की बात नहीं रही।

और हाँ, शांति वार्ता की व्यवस्था भी कम दिलचस्प नहीं। जिस देश की अपनी जनता दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रही हो, उसे शांति वार्ता के दौरान अंतरराष्ट्रीय अतिथियों के लिए बिरयानी और बिस्लरी का इंतजाम सौंप दिया गया। लगता है वैश्विक मंच पर ‘मेहमाननवाज़ी’ का नया पैमाना तय हो रहा है, खुद भूखे रहो, मेहमान को खिलाओ!

कुल मिलाकर, यह पूरा घटनाक्रम ऐसा लग रहा है जैसे किसी निर्देशक ने ‘युद्ध’ की स्क्रिप्ट लिखी हो और बीच में उसे ‘कॉमेडी’ में बदल दिया हो।

जनता भी यही सोच रही है—“भाई, ये युद्ध था या मनोरंजन कार्यक्रम?”

जिन देशों पर शांति कायम रखने की जिम्मेदारी थी, वही कभी-कभी तनाव को ‘मैनेज’ करने के बजाय ‘मैनेजमेंट शो’ बना बैठे। शांति का नोबेल न सही, अशांति का बिगुल जरूर बजा दिया।

गौरतलब है कि इस युद्ध ने एक पुरानी कहावत को भी जीवंत कर दिया “दूध की रखवाली बिल्ली को सौंपना।” यह दिलचस्प दृश्य तब देखने को मिला, जब अशांति के लिए चर्चित मुल्क को ही शांति वार्ता की मेज पर मुख्य अतिथि बना दिया गया। और, शांति स्थल के लिए पाक की सरजमीं को चुना गया। यह कुछ वैसा ही है, जैसे परीक्षा में नकल कराने वाले छात्र को ही मॉनिटर बना दिया जाए। पाकिस्तान जैसे देशों की शांति पहल में सक्रियता ने व्यंग्य को नया आयाम दे दिया, जहाँ खुद का इतिहास तनावपूर्ण हो, अशांति दूतों का मैन्युफैक्चरिंग हब,जो कुछ दिन पूर्व तक युद्ध में व्यस्त था, वहाँ से शांति का संदेश आना अपने आप में ‘कॉमेडी ऑफ एरर्स’ बन जाता है।

इस पूरे घटनाक्रम में हॉर्मुज जलडमरूमध्य भी किसी वीआईपी गेट की तरह चर्चा में रहा, कभी बंद होने की धमकी, कभी खुलने की राहत। तेल की कीमतें ऐसे उछलीं-गिरीं मानो शेयर बाजार भी इस ‘रियलिटी शो’ का हिस्सा हो।

अंततः युद्ध विराम हो गया, वार्ताएँ शुरू हो गईं। लेकिन यह प्रकरण एक सबक दे गया,आज का युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि शब्दों, धमकियों और कूटनीतिक नाटकों से भी लड़ा जाता है। और, युद्ध अब सिर्फ विनाश नहीं करता, बीच-बीच में ‘मनोरंजन’ भी परोसता है…बस टिकट की कीमत आम इंसान अपनी जान और सुकून से चुकाता है!