साहूकार से सिस्टम तक: 11 साल में बदलता वित्तीय भारत

From moneylender to system: A changing financial India in 11 years

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

जब किसी देश की अर्थव्यवस्था की असली नब्ज टटोलनी हो, तो उसे सेंसेक्स की ऊंचाइयों में नहीं, बल्कि उन तंग गलियों में तलाशना पड़ता है जहां छोटे-छोटे कारोबार उम्मीद के सहारे सांस लेते हैं। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के 11 वर्ष दरअसल उसी उम्मीद की गूंज हैं—एक ऐसा प्रयास, जिसने ‘फंडिंग द अनफंडेड’ के संकल्प को हकीकत में बदलते हुए उन हाथों तक पूंजी पहुंचाने की कोशिश की, जो अब तक केवल श्रम और जज्बे के भरोसे आगे बढ़ रहे थे। 8 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई इस पहल ने सूक्ष्म उद्यमिता को न केवल पहचान दी, बल्कि उसे एक नई दिशा भी दी। फिर भी, ग्यारह साल बाद यह सवाल और अधिक तीखा हो उठा है—क्या यह बदलाव सचमुच जमीनी स्तर पर स्थायी रूप ले पाया है, या फिर आंकड़ों की चमक ने हकीकत के धुंधलेपन को ढक दिया है?

ग्यारह वर्षों की यह यात्रा केवल समय का विस्तार नहीं, बल्कि पैमाने और प्रभाव का भी सशक्त प्रमाण है। मार्च 2026 तक 57 करोड़ से अधिक ऋण खाते और 40 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का वितरण—ये आंकड़े अपने आप में एक आर्थिक परिवर्तन की कहानी बयां करते हैं। विशेष रूप से वित्त वर्ष 2025-26 में 5.65 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड वितरण यह दर्शाता है कि योजना अब केवल शुरुआत नहीं, बल्कि निरंतर विस्तार के चरण में है। बिना किसी गारंटी के 20 लाख रुपये तक का ऋण उपलब्ध कराना उस वर्ग के लिए ऐतिहासिक कदम साबित हुआ, जिसे कभी बैंकिंग व्यवस्था के दरवाजे पर भी जगह नहीं मिलती थी। इस पहल ने वित्तीय समावेशन को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाते हुए न केवल छोटे उद्यमियों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा, बल्कि उन्हें विकास की मुख्यधारा में सक्रिय भागीदार भी बनाया।

इस योजना का सबसे मजबूत पक्ष इसका सामाजिक समावेशन है। लगभग 67 प्रतिशत (दो-तिहाई) ऋण खातों/लाभार्थियों का महिलाओं के नाम होना आर्थिक स्वतंत्रता में उनके बढ़ते योगदान और सशक्त भूमिका को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों की उल्लेखनीय भागीदारी यह बताती है कि योजना वंचित और हाशिए पर खड़े वर्गों तक प्रभावी रूप से पहुंची है। 12 करोड़ से अधिक नए उद्यमियों का पहली बार बैंकिंग प्रणाली से जुड़ना इसके व्यापक प्रभाव और वित्तीय समावेशन की गहराई को स्पष्ट करता है। लगभग 2 प्रतिशत के आसपास की कम एनपीए दर यह संकेत देती है कि छोटे उद्यमी भी ऋण का जिम्मेदारी से उपयोग कर रहे हैं और इसे सफलतापूर्वक चुकाने में सक्षम हैं।

महिलाओं के सशक्तिकरण में मुद्रा योजना का प्रभाव बेहद स्पष्ट और दूरगामी रहा है। पिछले कुछ वर्षों में 67 प्रतिशत से अधिक ऋण महिलाओं को मिलना इस बात का मजबूत संकेत है कि वे अब केवल घरेलू भूमिकाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि स्थानीय और सूक्ष्म अर्थव्यवस्था की सक्रिय धुरी बन चुकी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों तक बैंकिंग सेवाओं की पहुंच बढ़ने से साहूकारों पर निर्भरता में उल्लेखनीय कमी आई है। उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर ऋण वितरण ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति दी है। इसके परिणामस्वरूप छोटे-छोटे व्यवसायों का विस्तार हुआ है और स्वरोजगार के माध्यम से रोजगार सृजन के नए अवसर लगातार विकसित हो रहे हैं।

जमीनी स्तर की कहानियां इस योजना की वास्तविक ताकत को सामने लाती हैं। बिहार की पूनम कुमारी (मशरूम उत्पादन) और असम की बिनीता (हस्तशिल्प/चाय उद्योग/स्थानीय उत्पाद) जैसी उद्यमियों की सफलता यह स्पष्ट करती है कि सीमित संसाधनों वाले छोटे सपनों को जब समय पर पूंजी मिलती है, तो वे बड़े और स्थायी बदलाव में बदल सकते हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट भी इस तथ्य को स्वीकार करती है कि मुद्रा योजना ने सूक्ष्म उद्यमों को औपचारिक ऋण व्यवस्था से जोड़कर वित्तीय समावेशन को मजबूत किया है। इन उदाहरणों से यह साफ होता है कि यह योजना केवल ऋण देने तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने लोगों को आत्मविश्वास, अवसर और आगे बढ़ने की नई दिशा भी प्रदान की है।

इस सफलता के बीच कुछ चुनौतियां भी सामने आती हैं। शिशु श्रेणी के छोटे ऋणों में स्थिरता और उन्नयन की दर अपेक्षाकृत कम रही है, जो उनकी दीर्घकालिक मजबूती पर सवाल उठाती है। कुछ रिपोर्टों में इन ऋणों की एनपीए दर लगभग 9 प्रतिशत तक बताई गई है, जो जोखिम का संकेत देती है। कई उद्यमियों को ऋण तो मिल जाता है, लेकिन उसके बाद मार्गदर्शन और कौशल प्रशिक्षण की कमी उन्हें आगे बढ़ने से रोक देती है। बैंकों पर लक्ष्य पूरा करने का दबाव भी कई बार गुणवत्ता की जगह संख्या को प्राथमिकता देता है, जिससे ऋण के बाद पर्याप्त निगरानी और सहयोग नहीं हो पाता और कई व्यवसाय टिक नहीं पाते।

इन चुनौतियों को देखते हुए सरकार ने सुधार की दिशा में कई ठोस कदम उठाए हैं। ‘तरुण प्लस’ जैसी नई श्रेणियों के जरिए बड़े ऋण की सुविधा बढ़ाई गई है, जबकि डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार से प्रक्रिया अधिक सरल और पारदर्शी बनी है। साथ ही स्किल डेवलपमेंट पर विशेष जोर देकर उद्यमियों की क्षमता बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में दिए गए वक्तव्यों में बेहतर मॉनिटरिंग, ई-केवाईसी और मजबूत क्रेडिट मूल्यांकन प्रणाली पर लगातार बल दिया गया है। इन सुधारों का प्रभाव वित्त वर्ष 2025-26 के रिकॉर्ड वितरण में भी स्पष्ट दिखाई देता है, जो योजना की बढ़ती विश्वसनीयता और मजबूती को दर्शाता है।

जब सूक्ष्म स्तर पर बदलती अर्थव्यवस्था को समझा जाता है, तो प्रधानमंत्री मुद्रा योजना की 11 वर्ष की यात्रा एक सरकारी पहल से आगे बढ़कर सामाजिक-आर्थिक बदलाव की प्रक्रिया के रूप में दिखती है। यह योजना करोड़ों लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ते हुए नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के विचार को आगे बढ़ाने का माध्यम बनी है। फिर भी, इसकी असली सफलता तभी मानी जाएगी जब हर ऋण एक टिकाऊ व्यवसाय बने और हर उद्यमी आत्मनिर्भरता की मिसाल प्रस्तुत करे। इसके लिए ‘क्रेडिट प्लस’ मॉडल जरूरी है, जिसमें ऋण के साथ कौशल, मार्गदर्शन और बाजार पहुंच शामिल हो। तभी यह योजना आंकड़ों से आगे बढ़कर छोटे उद्यमियों की वास्तविक और स्थायी आर्थिक क्रांति बन सकेगी।