यूपी में गहराया मदरसा शिक्षकों को जबरन वीआरएस विवाद

The controversy over forced VRS of madrasa teachers deepens in UP

संजय सक्सेना

उत्तर प्रदेश में मदरसा शिक्षकों को जबरन वीआरएस थोपने का मामला गरमाता जा रहा है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने इसे गंभीरता से लेते हुए अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के निदेशक को तलब किया है। प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद से संबद्ध अशासकीय मदरसों में कार्यरत शिक्षकों और शिक्षणेत्तर कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) का लाभ देने का विवाद पुराना है। 2016 की उत्तर प्रदेश अशासकीय अरबी और फारसी मदरसा मान्यता प्रशासन एवं सेवा नियमावली में वीआरएस का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। इसके बावजूद कई जिलों में जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी इस्तीफों को वीआरएस मानकर पेंशन स्वीकृत कर रहे थे।

मामला दिसंबर 2025 में खुला, जब अल्पसंख्यक कल्याण निदेशक ने सभी जिलों से ब्योरा तलब किया। शिकायतों के अनुसार, कुछ शिक्षकों पर दबाव बनाकर त्यागपत्र ले लिया गया, जिसे वीआरएस के रूप में पेंशन के साथ प्रोसेस किया गया। नियमों के मुताबिक, कर्मचारी केवल तीन महीने का नोटिस देकर इस्तीफा दे सकता है, लेकिन वीआरएस जैसी सुविधा नहीं। यह अनियमितता वित्तीय घाटे का कारण बनी, क्योंकि बिना आधार के पेंशन वितरण हो रहा था। 15 अप्रैल 2026 को एनएचआरसी ने शिकायत पर संज्ञान लिया और अल्पसंख्यक कल्याण निदेशक को समन जारी किया। आयोग ने नाराजगी जताई कि विभाग ने पूर्व नोटिसों का संतोषजनक जवाब नहीं दिया। विभाग को 14 मई 2026 तक विस्तृत रिपोर्ट जमा करने का आदेश है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि यह जबरन सेवानिवृत्ति मानवाधिकार उल्लंघन है, क्योंकि शिक्षकों को नौकरी से वंचित कर पेंशन का लालच दिया गया।

एनएचआरसी का यह कदम प्रशासनिक लापरवाही पर लगाम कसने वाला है। पूर्व में भी आयोग ने मदरसा संबंधी शिकायतों पर सक्रियता दिखाई, जैसे मदरसा बोर्ड नियुक्तियों पर। अब विभाग पर दबाव है कि या तो लाभ रोककर रिकवरी करे या नियमावली में संशोधन करे। कुल मिलाकर यह विवाद योगी आदित्यनाथ सरकार के मदरसा सुधारों से जुड़ा प्रतीत होता है। दिसंबर 2025 में कैबिनेट ने अखिलेश यादव सरकार के विवादित मदरसा शिक्षक सुरक्षा विधेयक को रद्द किया, जो शिक्षकों को असीमित संरक्षण देता था। विपक्ष का आरोप है कि वीआरएस थोपकर योगी सरकार पुराने समर्थकों को हटाना चाहती है। हालांकि, स्रोतों में स्पष्ट इशारा का उल्लेख नहीं; यह प्रशासनिक अनियमितता ज्यादा लगता है।

जानकारों का मानना है कि जिला स्तर के अधिकारी बिना उच्च निर्देश के ऐसा नहीं कर सकते। अल्पसंख्यक विभाग की चुप्पी से संकेत मिलता है कि यह विभागीय स्तर पर चली आ रही प्रथा थी, जो अब सुधार अभियान में अटकी। कोई ठोस सबूत उच्च राजनीतिक इशारे का नहीं मिला, लेकिन योगी सरकार के मदरसा आधुनिकीकरण एजेंडे से जुड़ाव अस्वीकार्य नहीं। वीआरएस से हजारों मदरसा शिक्षक अनिश्चय में हैं। वीआरएस लाभ मिलने वाले अब रिकवरी के डर से परेशान, जबकि सेवा जारी रखने वाले बिना सुविधा। यह अल्पसंख्यक समुदाय में असंतोष पैदा कर रहा, खासकर जब केंद्र और राज्य स्तर पर मदरसा बोर्ड पर सवाल उठ रहे। उत्तर प्रदेश में 1.5 लाख से अधिक मदरसा शिक्षक प्रभावित हो सकते हैं।