आधुनिकता की दौड़ में खोता चैन-ओ-सुकून और पुरातन संस्कृति,परंपराओं, जीवनशैली की ओर लौटता मानव

In the race for modernity, man loses his peace and tranquility and returns to ancient culture, traditions and lifestyle

सुनील कुमार महला

मानव सभ्यता ने पिछले कुछ दशकों में जितनी तीव्र गति से प्रगति की है, उतनी शायद इतिहास के किसी अन्य कालखंड में नहीं हुई। आज मनुष्य सुविधा-संपन्न जीवन जी रहा है। आज पक्के घर-मकान हैं, बिजली, पानी, वातानुकूलन, आधुनिक फर्नीचर, यातायात के लिए ट्रेन, बस, कार, स्कूटर, मोटरसाइकिल और विमान जैसी अनेक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि संचार क्रांति ने आज पूरी दुनिया को एक छोटे से गाँव में बदल दिया है। इंटरनेट, मोबाइल, स्मार्टफोन, लैपटॉप और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) जैसी तकनीकों ने जीवन को तेज, आसान और बहुत ज्यादा सुविधाजनक बना दिया है। परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि इन सब उपलब्धियों के बीच मनुष्य के जीवन से शांति, संतोष और आत्मीयता कहीं न कहीं कम होती चली गई है।

सच तो यह है कि आज का मनुष्य जितना साधनों, मशीनों से समृद्ध हुआ है, उतना ही मानसिक रूप से वह व्यस्त, तनावग्रस्त और अकेला भी हुआ है।आधुनिक जीवनशैली ने मनुष्य को सुविधाएं तो दी हैं, लेकिन यह भी एक कटु सत्य है इन सबने कहीं न कहीं मानव का चैन-ओ-सुकून छीन लिया है। आज का जीवन भागदौड़, प्रतिस्पर्धा, चिंता, तनाव और अवसाद का पर्याय बनता जा रहा है। हर व्यक्ति दौड़ रहा है, हर व्यक्ति को आज पदार्थ की चाहत है, पर यह स्पष्ट नहीं कि वह किस मंज़िल की ओर जा रहा है।

पहले के समय में मनुष्य का जीवन प्रकृति के अधिक निकट था। लोग पैदल चलते थे, खेत-खलिहानों से जुड़े रहते थे, दिन-भर अथाह परिश्रम करते थे और शारीरिक रूप से अधिक स्वस्थ रहते थे। गाँवों में लोग कई-कई किलोमीटर/कोसों पैदल चलकर विद्यालय जाते थे। बाजार जाना हो, खेत जाना हो या किसी रिश्तेदार से मिलने जाना हो, पैदल चलना सामान्य बात थी। इस कारण मनुष्य का शरीर सक्रिय रहता था, बीमारियाँ कम होती थीं और जीवन में अनुशासन भी बना रहता था। आज छोटी से छोटी दूरी के लिए भी स्कूटर, मोटरसाइकिल या कार का उपयोग होने लगा है। इससे सुविधा तो बढ़ी है, पर मानव शरीर निष्क्रिय हो गया है। परिणामस्वरूप मोटापा, मधुमेह, रक्तचाप और हृदय रोग जैसी समस्याएँ तेजी से बढ़ी हैं।

इतना ही नहीं, पहले संयुक्त परिवारों की परंपरा थी। एक ही घर में दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची, भाई-बहन और बच्चे साथ रहते थे। घर का मुखिया प्रायः परिवार का बुजुर्ग होता था, जिसकी बात को सम्मानपूर्वक माना जाता था। बुजुर्ग केवल उम्र में बड़े नहीं होते थे, वे अनुभव, ज्ञान और संस्कारों के केंद्र होते थे। परिवार के निर्णयों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती थी। बच्चे उनके सानिध्य में संस्कार सीखते थे, कहानियाँ सुनते थे और जीवन के मूल्य समझते थे।

आज परिस्थितियाँ बहुत हद तक बदल चुकी हैं। नौकरी, व्यवसाय, स्थानांतरण, व्यस्तता और कई बार आपसी मतभेदों के कारण संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवारों में बदल गए हैं। पति-पत्नी और बच्चे तक सीमित परिवारों में आर्थिक स्वतंत्रता तो है, पर भावनात्मक सहारा कम हो गया है। बुजुर्ग अनेक बार अकेलेपन का जीवन जीने को विवश हैं। आज परिवारों में, पड़ोसियों में पहले की तुलना में संवाद, आपसी बातचीत काफी कम हुआ है और पीढ़ियों के बीच दूरी बढ़ी है।

पहले मनुष्य के हृदय में संवेदना अधिक थी। पड़ोसी परिवार जैसा होता था। रास्ता पूछने पर लोग स्वयं छोड़ने तक चले जाते थे। किसी घर में दुःख-सुख हो तो पूरा मोहल्ला साथ खड़ा हो जाता था। आज शहरी जीवन में पड़ोसी का नाम तक कई लोगों को ज्ञात नहीं होता। यदि किसी से रास्ता या पता पूछ लिया जाए तो अनेक लोग रुककर उत्तर देना भी आवश्यक नहीं समझते। आधुनिकता ने व्यक्तिवाद को बढ़ाया है, पर सामाजिक आत्मीयता को कम किया है।

और तो और आज के समय में खान-पान के क्षेत्र में भी बड़ा परिवर्तन आया है। पहले घरों में शुद्ध भोजन बनता था। अनाज, दालें, मसाले, घी, दूध और सब्जियाँ प्राकृतिक रूप में उपलब्ध होती थीं। मिट्टी के चूल्हों पर पकता भोजन स्वादिष्ट भी होता था और स्वास्थ्यवर्धक भी। लोग मौसम के अनुसार भोजन करते थे। गर्मियों में छाछ, सत्तू, बेल का शरबत, आम पना और सादा भोजन लिया जाता था। सर्दियों में गुड़, तिल, बाजरा, मूंगफली, लड्डू और पौष्टिक आहार का महत्व था।

आज बाजारवाद के प्रभाव से खान-पान की आदतें बदल गई हैं। मिलावट आज के समय में एक गंभीर व बड़ी समस्या बन चुकी है। दूध, घी, तेल, मसाले, मिठाई, पेय पदार्थ और कई खाद्य सामग्री की शुद्धता पर प्रश्नचिह्न लग गया है। रेडीमेड, डिब्बाबंद और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का उपयोग बढ़ गया है। रेस्टोरेंट, होटल, फास्ट फूड सेंटर, ठेले और ऑनलाइन फूड डिलीवरी ने घर के भोजन की जगह लेनी शुरू कर दी है। पिज्जा, बर्गर, नूडल्स, कोल्ड ड्रिंक और जंक फूड नई पीढ़ी की पसंद बन गए, जिनका स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है।

घरेलू उपयोग की वस्तुओं में भी परिवर्तन आया है। पहले मिट्टी के घड़े का पानी पीया जाता था, जो स्वाभाविक रूप से ठंडा और स्वास्थ्यकर होता था। मिट्टी के बर्तन, पत्तल, दोने, कांसे-पीतल के पात्र और प्राकृतिक वस्तुएँ जीवन का हिस्सा थीं। आज उनकी जगह प्लास्टिक, डिस्पोजेबल सामान, एल्युमिनियम, चीनी मिट्टी और कृत्रिम सामग्री ने ले ली है। सुविधा के नाम पर हमने पर्यावरण को प्रदूषित करने वाली वस्तुओं को अपनाया, जिसका दुष्परिणाम आज कचरे, प्रदूषण और स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में सामने है।

यहां तक कि आज मनोरंजन का स्वरूप भी बदल गया है। पहले मेलों, लोकगीतों, चौपालों, पारिवारिक बैठकों, कहानी-किस्सों और सामाजिक आयोजनों में आनंद मिलता था। आज टीवी, मोबाइल, ओटीटी प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और मल्टीप्लेक्स ने मनोरंजन को व्यक्तिगत बना दिया है। परिवार साथ बैठकर समय कम बिताता है, जबकि प्रत्येक सदस्य अपने-अपने स्क्रीन में व्यस्त है। परिणामस्वरूप संवाद घटा है और मानसिक दूरी बढ़ी है।

वस्त्रों के क्षेत्र में भी आधुनिकता का प्रभाव स्पष्ट है। पहले खादी, सूती और हाथ से बने कपड़ों का महत्व था। ये कपड़े मौसम के अनुकूल, सरल और स्वास्थ्यकर होते थे। आज तड़क-भड़क, फैशन, ब्रांडेड वस्त्र, सिंथेटिक कपड़े, जींस, चश्मे और दिखावे की संस्कृति का बोलबाला है। पहनावे में सुविधा से अधिक प्रदर्शन को महत्व मिलने लगा है।

परंतु आशा की किरण यह है कि अब समाज धीरे-धीरे अपनी जड़ों की ओर लौटने लगा है। लोगों को समझ में आने लगा है कि केवल आधुनिक साधन जीवन का समाधान नहीं हैं। इसलिए मिलेट्स यानी मोटे अनाजों की ओर फिर से ध्यान बढ़ा है। बाजरा, ज्वार, रागी, कोदो, सांवा जैसे अनाज फिर से थालियों में लौट रहे हैं। दादी-नानी के घरेलू नुस्खों को महत्व दिया जा रहा है। आयुर्वेद, योग, प्राणायाम और प्राकृतिक चिकित्सा के प्रति रुचि बढ़ रही है।

सुबह-शाम टहलने, योग करने, व्यायाम करने और पार्कों में समय बिताने की प्रवृत्ति पुनः बढ़ी है। लोग जैविक खेती(आर्गेनिक खेती) की ओर आकर्षित हो रहे हैं।खेती के साथ आज पुनः पशुपालन को महत्व दिया जा रहा है। घरों में फिर से तुलसी, नीम, एलोवेरा, फूल-पौधे लगाए जा रहे हैं। पक्षियों के लिए पानी के परिंडे लगाए जा रहे हैं। मिट्टी के घड़े और पारंपरिक रसोई के साधनों का प्रयोग पुनः आरंभ हो रहा है।

भोजन में भी लोग पारंपरिक व्यंजनों की ओर लौट रहे हैं। दाल-बाटी-चूरमा, खीर, खिचड़ी, सत्तू, राबड़ी, दलिया, लस्सी, छाछ और घर के बने पकवानों का महत्व पुनः बढ़ा है। लोग समझ रहे हैं कि स्वाद और स्वास्थ्य का वास्तविक मेल घर के भोजन में ही है।

वास्तव में मनुष्य को जीवन में केवल धन-पैसा नहीं चाहिए। धन आवश्यक है, पर पर्याप्त नहीं। यदि घर में शांति न हो, मन में संतोष न हो, संबंधों में प्रेम न हो और समाज में मानवीयता न हो, तो वैभव भी अधूरा है। आदमी को सुकून चाहिए, अपनापन चाहिए, चैन की नींद चाहिए, स्वस्थ शरीर चाहिए और ऐसा समाज चाहिए जहाँ संवेदना जीवित हो।

भविष्य का आदर्श जीवन वही होगा जिसमें आधुनिकता और परंपरा का संतुलित समन्वय हो। विज्ञान का उपयोग हो, पर प्रकृति का सम्मान भी हो। तकनीक हो, पर रिश्तों में आत्मीयता भी हो। पक्के घर हों, पर दिल भी पक्के नहीं बल्कि कोमल हों। साधन हों, पर संस्कार भी हों। प्रगति हो, पर प्रदूषण नहीं। सुविधा हो, पर शांति भी हो।

एक समय ऐसा अवश्य आएगा जब मनुष्य समझेगा कि उसकी वास्तविक शक्ति उसकी संस्कृति, परंपराओं, प्रकृति और मानवीय मूल्यों में ही निहित है। तब वह फिर उसी दिशा में लौटेगा जहाँ जीवन केवल जीने का नाम नहीं, बल्कि आनंद और संतोष का अनुभव होगा। यही सच्ची प्रगति है, यही सच्चा विकास है।