सौरभ वार्ष्णेय
अमेरिका और ईरान के बीच जारी शांति वार्ता एक बार फिर अनिश्चितता के धुंध में घिरती दिखाई दे रही है। हालिया घटनाक्रम—विशेषकर युद्धविराम की मियाद समाप्त होने के करीब पहुंचना, समुद्री टकराव और कड़े बयान—ने इस संवाद की दिशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ी बाधा दोनों देशों के बीच गहरे अविश्वास की है। ईरान स्पष्ट कर चुका है कि वह धमकियों की छाया में बातचीत स्वीकार नहीं करेगा, जबकि अमेरिका अपनी शर्तों पर समझौते के लिए दबाव बनाए हुए है। यही कारण है कि प्रस्तावित दूसरे दौर की वार्ता पर भी संशय बना हुआ है। हालात को और जटिल बनाने वाला तत्व है हालिया सैन्य घटनाक्रम। अमेरिका द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य के पास ईरानी जहाज को जब्त करना और नौसैनिक नाकेबंदी जारी रखना, ईरान के लिए उकसावे जैसा कदम माना जा रहा है। इससे न केवल वार्ता का माहौल बिगड़ा है, बल्कि ईरान ने इसे युद्धविराम का उल्लंघन तक बताया है। वास्तव में, यह संकट केवल द्विपक्षीय नहीं बल्कि वैश्विक महत्व का है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है, और यहां तनाव बढऩे का सीधा असर तेल कीमतों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ऐसे में खाड़ी देशों की चिंताएं भी बढ़ गई हैं, जिन्हें डर है कि यह वार्ता ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव को और मजबूत कर सकती है।
अमेरिका ईरान में शांति वार्ता में रुकावटें
अमेरिका- ईरान शांति वार्ता का भविष्य काफी हद तक होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर निर्भर करता है। यह जलडमरूमध्य केवल एक भौगोलिक मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक संतुलन का केंद्र है। दुनिया के लगभग एक-तिहाई कच्चे तेल का व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है, इसलिए यहां किसी भी तरह का तनाव वैश्विक अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित करता है।ईरान लंबे समय से इस जलडमरूमध्य को अपने सामरिक दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। जब-जब अमेरिका या उसके सहयोगी देशों के साथ तनाव बढ़ता है, तब-तब ईरान द्वारा होर्मुज़ को बंद करने या वहां सैन्य गतिविधि बढ़ाने की चेतावनी दी जाती है। इसके जवाब में अमेरिका अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ाकर यह संदेश देता है कि वह इस मार्ग को हर हाल में खुला रखेगा। यही टकराव शांति वार्ता की दिशा और गति को प्रभावित करता है। यदि ईरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर लचीला रुख अपनाता है और अंतरराष्ट्रीय नौवहन की सुरक्षा की गारंटी देता है, तो यह विश्वास बहाली की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है। इससे अमेरिका और पश्चिमी देशों को यह संकेत मिलेगा कि ईरान केवल टकराव की नीति नहीं, बल्कि सहयोग की राह भी अपनाना चाहता है। इसके विपरीत, यदि ईरान इस मार्ग को दबाव की रणनीति के रूप में इस्तेमाल करता रहा, तो वार्ता में अविश्वास बना रहेगा और समझौते की संभावनाएं कमजोर पड़ेंगी।भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों के लिए भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य का महत्व अत्यधिक है। यहां स्थिरता से तेल की कीमतों में संतुलन बना रहता है, जबकि किसी भी संकट से महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। इसलिए भारत सहित कई देश चाहते हैं कि अमेरिका-ईरान वार्ता सकारात्मक दिशा में आगे बढ़े और इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित हो।यह कहा जा सकता है कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य केवल एक सामरिक बिंदु नहीं, बल्कि शांति वार्ता की ‘कुंजीÓ है। यदि यहां स्थिरता बनी रहती है, तो अमेरिका-ईरान संबंधों में सुधार की संभावना मजबूत होगी। लेकिन यदि यह क्षेत्र तनाव का केंद्र बना रहता है, तो शांति वार्ता भी अनिश्चितता और अविश्वास के भंवर में फंसी रहेगी।
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रही तनातनी के बीच शांति वार्ता की कोशिशें बार-बार शुरू होती हैं, लेकिन हर बार किसी न किसी कारण से बाधित हो जाती हैं। हाल के घटनाक्रम भी यही संकेत देते हैं कि दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि स्थायी समाधान तक पहुँचना आसान नहीं है।सबसे बड़ी रुकावट है आपसी अविश्वास। अमेरिका और ईरान के बीच संबंध 2015 के ईरान परमाणु समझौता के बाद कुछ बेहतर हुए थे, लेकिन 2018 में अमेरिका के इससे बाहर निकलने के फैसले ने विश्वास की नींव को हिला दिया। इसके बाद से ईरान ने भी अपने परमाणु कार्यक्रम को तेज किया, जिससे तनाव और बढ़ गया। दूसरी बड़ी समस्या है राजनीतिक दबाव। अमेरिका में आंतरिक राजनीति और बदलती सरकारों की नीतियाँ वार्ता को अस्थिर बनाती हैं, वहीं ईरान में कट्टरपंथी और सुधारवादी गुटों के बीच मतभेद किसी भी समझौते को कमजोर कर देते हैं। दोनों देशों में नेतृत्व परिवर्तन के साथ नीतियों का बदलना वार्ता की निरंतरता को प्रभावित करता है।तीसरा कारण क्षेत्रीय भू-राजनीति है। मध्य पूर्व में इजऱाइल, सऊदी अरब जैसे देशों की चिंताएँ भी इस वार्ता को प्रभावित करती हैं। ये देश ईरान की बढ़ती शक्ति और उसके परमाणु कार्यक्रम को अपने लिए खतरा मानते हैं, जिससे अमेरिका पर सख्त रुख अपनाने का दबाव बढ़ता है।आर्थिक प्रतिबंध भी एक बड़ी बाधा हैं। अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, और ईरान की पहली मांग ही इन प्रतिबंधों को हटाने की रहती है। वहीं अमेरिका चाहता है कि ईरान पहले अपने परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों पर नियंत्रण लगाए। यही “पहले कौन झुके” की स्थिति वार्ता को गतिरोध में डाल देती है।इन सबके बीच कूटनीतिक प्रयास पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। कई बार अप्रत्यक्ष वार्ताओं और मध्यस्थ देशों की भूमिका से बातचीत आगे बढ़ती दिखती है, लेकिन ठोस परिणाम अभी भी दूर हैं।अमेरिका ईरान शांति वार्ता में रुकावटें केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक जटिलताओं से जुड़ी हैं। जब तक दोनों पक्ष लचीला रुख नहीं अपनाते और आपसी विश्वास बहाली के ठोस कदम नहीं उठाते, तब तक स्थायी शांति की राह कठिन बनी रहेगी।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।





