बंगाल की बिसात पर योगी की ‘हिंदुत्व’ वाली गर्जना

Yogi's 'Hindutva' roar on the Bengal chessboard

अजय कुमार

पश्चिम बंगाल की राजनीति के केंद्र में इस समय केवल चुनावी आंकड़े नहीं, बल्कि विचारधाराओं का वह प्रचंड टकराव है जिसने भारतीय राजनीति के दो ध्रुवों को बिल्कुल आमने-सामने खड़ा कर दिया है। एक ओर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं, जो भगवा चोले में हिंदुत्व की धार और ‘बुलडोजर मॉडल’ की धमक लेकर बंगाल की गलियों में टीएमसी के किले को ढहाने निकले हैं, तो दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव हैं, जिन्होंने इस चुनावी शोर से एक सोची-समझी दूरी बना रखी है। यह दूरी महज संयोग नहीं, बल्कि 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव और दिल्ली की गद्दी के लिए बुनी जा रही उस बिसात का हिस्सा है, जहां हर कदम फूंक-फूंक कर रखा जा रहा है। योगी आदित्यनाथ का बंगाल में उतरना महज एक स्टार प्रचारक की मौजूदगी नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक और राजनीतिक संदेश है जो सीधे लखनऊ के गलियारों तक पहुंच रहा है।

योगी आदित्यनाथ जब पुरुलिया या कोलकाता की सड़कों पर गरजते हैं, तो उनके निशाने पर सिर्फ ममता बनर्जी नहीं होतीं, बल्कि वह तुष्टिकरण की उस राजनीति पर प्रहार करते हैं जिसे भाजपा बंगाल में अपनी जीत की कुंजी मानती है। योगी का ‘स्ट्राइक रेट’ अब सिर्फ चर्चा का विषय नहीं, बल्कि विपक्षी खेमे के लिए सिरदर्द बन चुका है। बिहार चुनाव में 90 फीसदी और दिल्ली में करीब 78 फीसदी की सफलता दर ने उन्हें भाजपा का सबसे बड़ा ‘इम्पैक्ट मेकर’ बना दिया है। वह बंगाल की धरती पर खड़े होकर जब यह कहते हैं कि ‘बंगाल की पहचान काबा से नहीं, मां कालीबाड़ी से है’, तो वह दरअसल बंगाली अस्मिता को हिंदुत्व के साथ जोड़कर एक नया नैरेटिव सेट कर रहे होते हैं। उनका सीधा हमला कोलकाता के मेयर के उस बयान पर है जिसमें उर्दू की वकालत की गई थी। योगी यहां स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि बंगाल में केवल बंगाली और भारतीय संस्कृति चलेगी, किसी भी प्रकार का विदेशी प्रभाव या तुष्टिकरण स्वीकार्य नहीं होगा।

दूसरी ओर, अखिलेश यादव की खामोशी उत्तर प्रदेश की राजनीति के भविष्य की ओर इशारा करती है। बंगाल में ममता बनर्जी और अखिलेश के संबंध जगजाहिर हैं। ममता ने यूपी चुनाव में अखिलेश के लिए रैलियां कीं, लेकिन आज जब बंगाल में ममता को उनकी जरूरत थी, तब अखिलेश ने खुद को पीछे खींच लिया। इसके पीछे ‘गठबंधन धर्म’ का पेचीदा गणित है। बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट एक साथ हैं और टीएमसी के खिलाफ लड़ रहे हैं। यूपी में अखिलेश और कांग्रेस का अटूट साथ है। अगर अखिलेश बंगाल में ममता के मंच पर जाते, तो यूपी में कांग्रेस के साथ उनके रिश्तों में दरार आ सकती थी। भाजपा को यह कहने का मौका मिल जाता कि अखिलेश ‘दो नावों की सवारी’ कर रहे हैं। साथ ही, बंगाल में जिस तरह से ध्रुवीकरण की राजनीति चरम पर है, अखिलेश नहीं चाहते कि वह ममता के साथ खड़े होकर ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ के उन आरोपों को खुद पर ओढ़ लें, जिससे वह यूपी में ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के जरिए बचने की कोशिश कर रहे हैं।

योगी आदित्यनाथ का ‘यूपी मॉडल’ बंगाल में एक ब्रांड बन चुका है। वह अपनी रैलियों में बार-बार 2017 से पहले के उत्तर प्रदेश और आज के उत्तर प्रदेश की तुलना करते हैं। वह बताते हैं कि कैसे कभी यूपी में माफियाओं का राज था, कैसे सड़कों पर नमाज के नाम पर अराजकता होती थी और कैसे त्योहारों पर पाबंदियां थीं। उनका ‘नो कर्फ्यू, नो दंगा, यूपी में सब चंगा’ का नारा बंगाल के उन मतदाताओं को आकर्षित कर रहा है जो कानून-व्यवस्था को लेकर चिंतित हैं। योगी का बुलडोजर अब सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि सुशासन का प्रतीक बन चुका है, जिसे वह बंगाल में टीएमसी के ‘गुंडाराज’ के खिलाफ एक हथियार के तौर पर पेश कर रहे हैं। वह टीएमसी कार्यकर्ताओं को चेतावनी देते हैं कि भाजपा की सरकार बनते ही अपराधी जेल में होंगे, ठीक वैसे ही जैसे यूपी के माफिया आज बिलों में छिपे हैं या जेल की सलाखों के पीछे हैं।

अखिलेश यादव के लिए चुनौती सिर्फ गठबंधन बचाने की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि को बरकरार रखने की भी है। लोकसभा चुनाव में तीसरी बड़ी पार्टी बनने के बाद अखिलेश को भविष्य के पीएम चेहरे के तौर पर देखा जाने लगा है। लेकिन बिहार और अब बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्यों के चुनावों से उनकी अनुपस्थिति उनके ‘नेशनल एंबिशन’ पर सवाल खड़े करती है। क्या वह केवल यूपी के नेता बनकर रह जाना चाहते हैं? या फिर वह हिंदुत्व बनाम तुष्टिकरण की इस जंग में खुद को इतना सुरक्षित रखना चाहते हैं कि यूपी के बहुसंख्यक वोटों में कोई बिखराव न हो? राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अखिलेश यादव इस समय भाजपा के ‘सांप्रदायिक ध्रुवीकरण’ के जाल में नहीं फंसना चाहते। वह जानते हैं कि बंगाल में ममता के पक्ष में खड़ा होना सीधे तौर पर भाजपा के हिंदुत्व के पिच पर खेलने जैसा होगा, जो उत्तर प्रदेश में उनके ‘पीडीए’ समीकरण को बिगाड़ सकता है।

योगी आदित्यनाथ की रैलियों में उमड़ता जनसैलाब और उनका आक्रामक तेवर यह साफ करता है कि भाजपा ने बंगाल को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है। योगी का ‘गौ-माता’ और ‘राम’ का मुद्दा सीधे तौर पर बंगाल की सांस्कृतिक जड़ों को छूने का प्रयास है। वह ममता बनर्जी के उस ‘गुस्से’ को ढाल बना रहे हैं जो वह ‘जय श्री राम’ के नारों पर दिखाती रही हैं। योगी का यह कहना कि ‘ममता दीदी राम नाम से चिढ़ती हैं’, बंगाल के हिंदू मतदाताओं के मन में एक गहरा प्रभाव छोड़ रहा है। वह इस लड़ाई को ‘बंगाली अस्मिता बनाम बाहरी’ से मोड़कर ‘हिंदुत्व बनाम तुष्टिकरण’ पर ले आए हैं। कोलकाता के मेयर के बयान को आधार बनाकर उन्होंने बंगाली अस्मिता को बचाने का जो कार्ड खेला है, उसने टीएमसी की रणनीति को बैकफुट पर धकेल दिया है।

बहरहाल, यह चुनाव केवल बंगाल की सत्ता का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह आने वाले समय में उत्तर प्रदेश और देश की राजनीति की दिशा भी तय करेगा। योगी आदित्यनाथ जहां अपनी ‘हिंदुत्ववादी छवि’ और ‘कठोर प्रशासक’ के ठप्पे को और मजबूत कर रहे हैं, वहीं अखिलेश यादव एक ‘वेट एंड वॉच’ की नीति पर चल रहे हैं। योगी के लिए बंगाल एक प्रयोगशाला है जहां वह अपने यूपी मॉडल की सफलता को परख रहे हैं, ताकि 2027 में वह और अधिक आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतर सकें। वहीं अखिलेश के लिए बंगाल एक ऐसी आग है जिससे वह अपने दामन को बचाकर निकलना चाहते हैं ताकि यूपी की जंग में वह बेदाग रहें। बंगाल के इस चुनावी रण में योगी की ‘गर्जना’ और अखिलेश का ‘मौन’ दोनों ही भारतीय राजनीति के भविष्य के गर्भ में छिपे बड़े बदलावों की पटकथा लिख रहे हैं। अब देखना यह है कि बंगाल की जनता योगी के ‘रामराज्य’ के आह्वान को चुनती है या ममता की ‘अकेली लड़ाई’ पर मुहर लगाती है।