जहाँ विरह वेदना ही वंदना बन जाए

Where the pain of separation itself becomes worship

सद्गुरु महात्मा सुशील कुमार जी के 24वें महानिर्वाण दिवस पर एक साधक की आस्था,श्रद्धा, सेवा और समर्पण व साधना की अश्रुपूर्ण श्रद्धाँजली

विनोद कुमार सिंह

भारतीय संस्कृति का मूल स्वर यदि किसी एक जीवंत परंपरा में निरंतर प्रवाहित होता दिखाई देता है, तो वह निःसंदेह गुरु-शिष्य परंपरा है। यह केवल शिक्षण की व्यवस्था नहीं,बल्कि आत्मा से आत्मा के संवाद का वह दिव्य सेतु है, जहाँ ज्ञान शब्दों के माध्यम से नहीं, बल्कि चेतना के स्पंदनों के द्वारा प्रवाहित होता है।इस परंपरा में गुरु केवल मार्गदर्शक नहीं होते,वे स्वयं प्रकाश का स्रोत होते हैं और शिष्य उस प्रकाश में अपने अस्तित्व का वास्तविक स्वरूप पहचानता है। जब शिष्य अपने भीतर के अहंकार, संदेह, संशय और द्वंद्व को पूर्णतः समर्पण में विसर्जित कर देता है, तब गुरु उसके लिए केवल पथप्रदर्शक नहीं रहते,बल्कि वे ही पथ बन जाते हैं, वे ही साधना बन जाते हैं और वे ही मंज़िल का साकार स्वरूप धारण कर लेते हैं।

ऐसे ही करुणामयी,त्रिकालदर्शी और कृपालु सद्गुरु महात्मा सुशील कुमार जी का सान्निध्य मेरे जीवन का वह अनुपम अध्याय है,जिसे स्मरण करते ही अंतर्मन में एक अद्भुत शांति, एक गहन भाव- विभोरता और एक अव्यक्त अनुभूति का संचार होने लगता है। उनके साथ माँ विजया जी का ममतामयी साया उस आध्यात्मिक अनुभव को पूर्णता प्रदान करता है। सद्गुरु का स्मरण केवल श्रद्धांजलि नहीं होता,वह आत्मा का अपने स्रोत की ओर लौटने का एक विनम्र प्रयास होता है। यह वह अवस्था है, जहाँ शब्द गौण हो जाते हैं और अनुभूति ही संवाद का माध्यम बन जाती है।अप्रैल का यह पावन कालखंड मेरे जीवन में हर वर्ष एक विशेष संवेदना लेकर आता है। 23 और 24 अप्रैल की वह मध्यरात्रि कोई साधारण तिथि नहीं,बल्कि एक ऐसा दिव्य क्षण है, जब सद्गुरुदेव ने अपने भौतिक शरीर का त्याग कर स्वयं को संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त कर लिया। यह वियोग का क्षण था, किंतु उस वियोग के भीतर एक ऐसा विराट मिलन समाहित था,जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है, शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं। एक सीमित देह से असीम चेतना में विलीन होने की यह प्रक्रिया हमें यह बोध कराती है कि गुरु कभी दूर नहीं होते, वे केवल अपने स्वरूप का विस्तार करते हैं।

विरह सामान्यतः मन को तोड़ देता है, उसे पीड़ा और रिक्तता से भर देता है,किंतु जब यह विरह सद्गुरु से जुड़ा होता है, तब यह पीड़ा नहीं रहता, बल्कि यह साधना का रूप ले लेता है।यह एक ऐसी तपस्या बन जाती है, जिसमें शिष्य का अंतर्मन धीरे-धीरे परिष्कृत होता है। यह विरह भीतर झाँकने के लिए विवश करता है,यह आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करता है और यह सिखाता है कि सच्चा समर्पण क्या होता है।जब यह भाव परिपक्व होता है, तब यह अनुभूति होने लगती है कि सद्गुरु कहीं बाहर नहीं हैं, वे हमारे अपने अंतर्मन में ही विराजमान हैं।सद्गुरु का सान्निध्य केवल उपस्थिति नहीं होता,वह एक अनुभव होता है—ऐसा अनुभव, जिसमें समय की गति मानो थम जाती है और जीवन अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होने लगता है। उनकी दृष्टि में वह शक्ति थी, जो शिष्य के भीतर के सूक्ष्मतम भावों को पढ़ लेती थी; उनके स्पर्श में वह करुणा थी, जो कठोर से कठोर हृदय को भी द्रवित कर देती थी; और उनकी वाणी में वह सत्य था, जो सीधे आत्मा तक पहुँच जाता था। उनके पास बैठना केवल एक भौतिक निकटता नहीं, बल्कि आत्मिक एकत्व का अनुभव होता था।मेरे जीवन की स्मृतियों में एक प्रसंग ऐसा है, जिसने मेरे भीतर गहरा परिवर्तन उत्पन्न किया और मेरे जीवन की दिशा को एक नई चेतना प्रदान की। 8 जून 2001 का वह दिन, जब गुरुग्राम में सद्गुरुदेव और माँ विजया जी का प्रवास था, मेरे लिए केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक जागरण का प्रारंभ बन गया।संयोग से वह मेरा जन्मदिन भी था और मन में एक सहज आकांक्षा थी कि उस दिन मुझे सद्गुरु का विशेष आशीर्वाद प्राप्त हो।मैं नोएडा के सेक्टर-18 से तीन बेंत की छड़ियाँ लेकर पहुँचा और उन्हें सजाकर अत्यंत श्रद्धा के साथ सद्गुरु के आसन पर अर्पित कर दिया। उस समय यह एक सामान्य अर्पण था,किंतु मुझे यह आभास नहीं था कि यही क्षण मेरे भीतर छिपे अहंकार को उजागर करने का माध्यम बनेगा।संध्या के सत्संग में जब सद्गुरुदेव की दृष्टि मुझ पर पड़ी और उन्होंने मुझे अपने समीप बुलाया, तो मेरे भीतर एक अद्भुत उत्साह और श्रद्धा का संचार हुआ।उन्होंने प्रसाद स्वरूप अभिमंत्रित लौंग देने का संकेत किया, किंतु अज्ञानवश मैंने उसे लेने से मना कर दिया। यह एक क्षणिक प्रतिक्रिया थी, किंतु उसमें मेरे भीतर का सूक्ष्म अहंकार छिपा हुआ था।अगले ही क्षण उनका स्वर कठोर हुआ और उन्होंने मेरी हथेलियों पर छड़ी से प्रहार किया। वह दृश्य बाहर से देखने पर दंड का प्रतीत होता था, किंतु भीतर से वह अनंत कृपा का प्रस्फुटन था।उसी क्षण मैंने अनुभव किया कि गुरु का दंड भी उतना ही पवित्र होता है, जितना उनका आशीर्वाद।वह दंड मेरे भीतर के अहंकार का शोधन था, मेरे अज्ञान का परिमार्जन था और मेरे अस्तित्व को एक नई दिशा देने का माध्यम था।फिर उसी क्षण का अगला रूप—करुणा की चरम अभिव्यक्ति। वही सद्गुरु, जिनकी वाणी में अभी कठोरता थी, अगले ही पल मुझे अपने समीप खींचकर मेरी हथेलियों को सहलाने लगे। उनकी करुणामयी वाणी—“मेरे बच्चे को कितना दर्द हो रहा होगा”—आज भी मेरे हृदय में उसी संवेदना के साथ गूँजती है। उस क्षण मैंने जाना कि गुरु का हर व्यवहार केवल शिष्य के कल्याण के लिए होता है, चाहे वह बाहर से कितना ही कठोर क्यों न प्रतीत हो।

माँ विजया जी का स्नेह उस अनुभव को और भी कोमल और पूर्ण बना देता है।उनका वात्सल्य शिष्य के भीतर ऐसी शांति का संचार करता है, जो किसी भी शब्द की सीमा से परे है। उस दिन सद्गुरुदेव का अपने हाथों से केले खिलाना केवल एक प्रसाद नहीं था, बल्कि वह एक ऐसा अनुभव था, जिसमें पिता का स्नेह, माँ का प्रेम और ईश्वर की कृपा एक साथ समाहित हो गए थे। वह क्षण मेरे लिए केवल स्मृति नहीं, बल्कि जीवन की धरोहर बन गया।

समय के साथ यह अनुभूति और भी गहरी होती चली गई कि सद्गुरु केवल उपदेश देने वाले नहीं होते, वे जीवन को गढ़ने वाले शिल्पकार होते हैं। वे शिष्य को भीतर से तोड़ते हैं, उसके अहंकार को भंग करते हैं, उसके भ्रमों को दूर करते हैं और उसके भीतर एक नई चेतना का निर्माण करते हैं। उनका हर स्पर्श, हर दृष्टि और हर वचन एक गहन आध्यात्मिक प्रक्रिया का हिस्सा होता है, जिसे समझना सामान्य बुद्धि के परे है, किंतु अनुभव करना संभव है।आज जब महानिर्वाण का यह चौबीसवाँ वर्ष हमारे समक्ष उपस्थित है, तब यह अनुभूति और भी प्रगाढ़ हो जाती है कि सद्गुरुदेव कहीं गए नहीं हैं। वे हर उस श्वास में हैं, जो श्रद्धा से भरी है; हर उस कर्म में हैं, जो समर्पण से किया जाता है; हर उस विचार में हैं,जो सेवा और करुणा से ओत-प्रोत है। वे हर उस हृदय में हैं, जो उनके प्रति अटूट विश्वास और प्रेम से भरा हुआ है।

यह दिवस केवल स्मरण का अवसर नहीं है, बल्कि आत्मिक जागरण का एक पावन पर्व है।भले ही हम भौतिक रूप से एक स्थान पर एकत्र न हो सकें, किंतु हमारी भावनाएँ, हमारी श्रद्धा और हमारी साधना हमें एक अदृश्य सूत्र में बाँध देती हैं। हर साधक का मन आज उसी गुरुधाम में उपस्थित है, जहाँ से उसे जीवन का वास्तविक अर्थ प्राप्त हुआ।

सद्गुरुदेव ने हमें जो सबसे बड़ा संदेश दिया, वह है—सेवा,साधना और समर्पण का मार्ग।उन्होंने सिखाया कि आस्था केवल पूजा या अनुष्ठान तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह जीवन जीने की एक समग्र शैली होती है। जब हम अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वर को समर्पित कर देते हैं, जब हम हर क्षण को साधना बना लेते हैं और जब हम हर संबंध में सेवा का भाव स्थापित कर लेते हैं,तब हम वास्तव में उस मार्ग पर चल रहे होते हैं, जिसे सद्गुरु ने हमारे लिए निर्धारित किया है।

उनकी वाणी आज भी अंतर्मन में गूँजती है कि यदि माँगना ही है तो संसार की क्षणभंगुर वस्तुओं को क्यों माँगें,यदि माँगना है तो सद्गुरु को माँगें,क्योंकि जब गुरु मिल जाते हैं, तो सब कुछ अपने आप प्राप्त हो जाता है। यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का सार है,जो हर साधक को सही दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है और उसे भीतर से समृद्ध करता है।

अश्रुपूरित नेत्रों और कृतज्ञ हृदय से इस पावन अवसर पर जब मैं अपने सद्गुरुदेव को स्मरण करता हूँ, तो मन स्वयं ही विनम्र हो उठता है। मेरी हथेलियों पर पड़े वे छड़ी के निशान आज भी मेरे लिए पीड़ा का प्रतीक नहीं, बल्कि पहचान का प्रतीक हैं। वे मुझे हर क्षण यह स्मरण कराते हैं कि गुरु की कृपा किस प्रकार शिष्य के जीवन को रूपांतरित कर सकती है।मैं उस समय उनकी महिमा को पूर्णतः समझ नहीं पाया था, किंतु उन्होंने एक ही क्षण में मेरे भीतर एक ऐसा बीज रोपित कर दिया, जो आज भी साधना के रूप में फल- फूल रहा है।समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती रही हैं,जीवन ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं, किंतु सद्गुरु का सान्निध्य कभी समाप्त नहीं हुआ। वह हर उस क्षण में अनुभव होता है,जब मन श्रद्धा से भर जाता है और जब आत्मा समर्पण में झुक जाती है।

जब साधक की विरह वेदना ही उसकी वंदना बन जाती है, तब वही क्षण उसकी साधना का चरम बन जाता है। वही अवस्था उसे उस दिव्य उपस्थिति का अनुभव कराती है,जो सद्गुरु का वास्तविक स्वरूप है। यह अनुभव शब्दों से परे है,यह केवल अनुभूति का विषय है।

हे सद्गुरुदेव, जब आप ही सब कुछ हैं, तो फिर और क्या माँगें। आप ही पथ हैं, आप ही पथिक हैं, आप ही मंज़िल हैं।आप ही श्रद्धा हैं, आप ही साधना हैं और आप ही वह अनंत प्रकाश हैं, जिसमें यह जीवन निरंतर आलोकित होता रहता है।आपकी कृपा की छाया में यह जीवन धन्य है, आपका स्मरण ही मेरी साधना है और आपका आशीर्वाद ही मेरी सबसे बड़ी पूँजी है।

अंतिम नमन के स्वर में एक साधक की मौन प्रार्थना
आस्था की दीपशिखा में,आपकी छवि सदा जलती रहे,सेवा की हर थकी हथेली में,आपकी शक्ति संबल बनती रहे।समर्पण की उस मौन अवस्था में,जहाँ ‘मैं’ का अस्तित्व मिट जाए,वहीं कहीं आपकी कृपा का सागर मेरी आत्मा को स्पर्श कर जाए।साधना की हर श्वास में अब, बस आपका ही नाम बसा है,
हर धड़कन के अंतर में जैसे, गुरुकृपा का ही राग रचा है।
विरह की यह वेदना भी अब, वंदना का स्वर बन जाती है,जब-जब स्मृति में आप उतरते,जीवन ज्योति बन जाती है।आपने जो दंड दिया था मुझको,वह भी अमृत बनकर उतरा,अहंकार के हर अंधकार को,उस क्षण का प्रकाश ही चुरा ले गया सारा।आपका स्पर्श,आपकी वाणी,आज भी पथ को आलोकित करती है,
हर भटके हुए इस मन को,फिर से अपने घर तक ले आती है।
हे सद्गुरुदेव,आपकी छत्र छाया ही अब मेरा एकमात्र सहारा है,आप ही जीवन का सार हैं,आप ही मेरा सारा पसारा है।ना कुछ चाहत, ना कोई अभिलाषा,बस इतनी सी विनती है,हर जन्म में मिले आपका चरण,यही मेरी अंतिम श्रद्धांजलि है।
विरह यदि आपकी स्मृति बन जाए, तो वह भी उत्सव हो जाता है,
और जब समर्पण पूर्ण हो जाए,तो जीवन ही शिव हो जाता है।
सद्गुरुदेव एवं माँ विजया जी के युगल श्रीचरणों में अश्रुपूरित कोटि-कोटि नमन।