ललित गर्ग
देश में स्वास्थ्य सेवा की वर्तमान स्थिति पर विचार करते समय एक अत्यंत चिंताजनक, मानवीय और संवेदनशील प्रश्न सामने आता है-क्या चिकित्सा अब सेवा न रहकर व्यवसाय का कठोर रूप एवं एक त्रासदी बनती जा रही है? विशेष रूप से निजी अस्पतालों के आईसीयू (गहन चिकित्सा कक्ष) से जुड़े मामलों ने इस प्रश्न को और अधिक तीखा बना दिया है। ऐसे अनेक उदाहरण सामने आए हैं, जहां मरीज के चिकित्सकीय रूप से स्थिर हो जाने के बावजूद उसे आईसीयू में रोके रखा जाता है। इसके पीछे का कारण अक्सर चिकित्सा की अनिवार्यता नहीं, बल्कि आर्थिक लाभ की निरंतर चलती प्रक्रिया होती है। यह स्थिति न केवल चिकित्सा के नैतिकता एवं सेवाभावना पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि मानवता की मूल संवेदनाओं को भी झकझोरती है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आईसीयू के लिए एकसमान दिशानिर्देशों की आवश्यकता पर बल देना इस गंभीर समस्या की स्वीकारोक्ति भी है और समाधान की दिशा में एक सार्थक पहल भी। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि जो मरीज चिकित्सकीय रूप से स्थिर हो चुके हैं या जिन्हें गहन निगरानी अथवा जीवन रक्षक उपकरणों की आवश्यकता नहीं है, उन्हें अनावश्यक रूप से आईसीयू में नहीं रखा जाना चाहिए। यह निर्देश केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि गहरे नैतिक आधार पर टिका हुआ है। यह हमें याद दिलाता है कि चिकित्सा का मूल उद्देश्य जीवन की रक्षा और पीड़ा का निवारण है, न कि आर्थिक लाभ का अधिकतमकरण।
सही मायनों में सुप्रीम कोर्ट के ये दिशानिर्देश एक सरल व सामान्य सिद्धांत की पुष्टि करते हुए इस विसंगति को दूर करने का प्रयास करते हैं कि किसी भी अस्पताल का आईसीयू मरीज की अनिश्चितकालीन देखभाल के लिए नहीं होता है। इन दिशानिर्देशों में यह निर्दिष्ट किया गया है कि चिकित्सकीय रूप से स्थिर हो चुके या जिन मरीजों के अंगों को बाहरी सहायता अथवा शारीरिक निगरानी की आवश्यकता नहीं होती, उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी जानी चाहिए। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि शीर्ष अदालत ने समस्या के यथाशीघ्र समाधान की जरूरत पर बल दिया है। अदालत ने डॉक्टरों की प्रतिष्ठा को संरक्षित करते हुए चिकित्सा संस्थानों व अस्पतालों की जवाबदेही सुनिश्चित करने पर बल दिया है। निश्चित तौर पर आधुनिक चिकित्सा खर्चीली हो गई और बेहतर सुविधाओं के लिए बड़ी रकम चुकानी होती है। लेकिन इस व्यवस्था में सेवा का भाव न होकर व्यवसाय की भावना का अधिक होना चिन्ताजनक है। इसी के कारण इसमें अनेक विसंगतियां एवं क्रूरताएं व्याप्त होती जा रही है, इसके नियमन का कार्य यूं तो देश के नीति-नियंताओं और शासन-प्रशासन को करना चाहिए था। लेकिन विडंबना यह है कि अदालत को ऐसे मामलों में पहल करनी पड़ती है।
हाल ही में सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा एक समान गहन चिकित्सा ईकाई दिशानिर्देशों की जरूरत बताना विसंगतियों से जूझती आईसीयू प्रणाली के लिए एक आशा की किरण लेकर आई है। वास्तव में आईसीयू एक विशेष सुविधा है, जिसका उपयोग केवल उन मरीजों के लिए होना चाहिए जिनकी स्थिति गंभीर हो और जिन्हें निरंतर निगरानी या अत्याधुनिक उपकरणों की आवश्यकता हो। किंतु जब इस सुविधा का उपयोग लाभ कमाने के साधन के रूप में होने लगे, तब यह व्यवस्था एक प्रकार की अमानवीयता में परिवर्तित हो जाती है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए आईसीयू का खर्च अक्सर असहनीय होता है। एक दिन का खर्च हजारों से लेकर लाखों तक पहुंच सकता है। ऐसे में यदि मरीज को अनावश्यक रूप से वहां रोका जाता है, तो यह केवल आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक उत्पीड़न भी है। यह स्थिति इसलिए भी जटिल हो जाती है क्योंकि आमजन को चिकित्सा प्रक्रियाओं की गहन जानकारी नहीं होती। मरीज के परिजन डॉक्टरों और अस्पताल प्रबंधन के निर्देशों पर पूरी तरह निर्भर होते हैं। इस निर्भरता का दुरुपयोग तब होता है जब पारदर्शिता का अभाव होता है। कई बार मरीज को वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं कराया जाता और उसे आईसीयू में बनाए रखने के निर्णय को अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत कर दिया जाता है। इस प्रकार एक अस्पष्टता का वातावरण बनता है, जिसमें सत्य और लाभ के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।
यदि हम इस समस्या की जड़ में जाएं, तो पाएंगे कि यह केवल अस्पतालों या डॉक्टरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक व्यवस्थागत विफलता का परिणाम है। आजादी के बाद शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को सरकार के अधीन रखकर यह अपेक्षा की गई थी कि ये क्षेत्र जनसेवा के आदर्श उदाहरण बनेंगे। किंतु समय के साथ आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण के प्रभाव ने इन क्षेत्रों की दिशा बदल दी। शिक्षा जहां एक महंगा व्यवसाय बन गई, वहीं चिकित्सा सेवा भी धीरे-धीरे लाभ कमाने का माध्यम बनती चली गई। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि आज चिकित्सा क्षेत्र में एक प्रकार की “व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा” चल रही है, जिसमें मरीज एक ग्राहक की तरह देखा जाने लगा है। बड़े-बड़े निजी अस्पताल आधुनिक सुविधाओं से लैस होकर तेजी से बढ़ रहे हैं, जो एक दृष्टि से सकारात्मक है, लेकिन जब इन सुविधाओं का उपयोग केवल आर्थिक लाभ के लिए होने लगे, तब यह चिंता का विषय बन जाता है। अस्पतालों की संख्या बढ़ना अच्छा है, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली में लोभ की प्रवृत्ति का बढ़ना जहां गहन घातक है, वही उसमें मानवीय संवेदना और नैतिकता का समावेश होना अधिक आवश्यक है।
इसी संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देश एक आशा की किरण के रूप में सामने आते हैं। इन दिशानिर्देशों में न केवल मरीजों के अधिकारों की रक्षा की बात की गई है, बल्कि अस्पतालों की जवाबदेही भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है।
नर्स और मरीज के अनुपात, विशेषज्ञों की उपलब्धता, बुनियादी ढांचे और प्रशिक्षण जैसे पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह प्रयास स्वास्थ्य सेवा को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और न्यायसंगत बनाने की दिशा में मार्ग प्रशस्त कर सकता है। किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि किसी भी नीति या दिशानिर्देश की सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। भारत में अनेक बार देखा गया है कि अच्छे इरादों से बनाई गई योजनाएं केवल कागजों तक सीमित रह जाती हैं। यदि इन दिशानिर्देशों का पालन भी आधे-अधूरे मन से किया गया, तो यह प्रयास भी अपने उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर पाएगा। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, पर्याप्त वित्तीय संसाधन और मजबूत प्रशासनिक ढांचे की आवश्यकता होगी। साथ ही यह भी आवश्यक है कि इस पूरी प्रक्रिया में मानवीय दृष्टिकोण को केंद्र में रखा जाए। आईसीयू में लंबे समय तक भर्ती रहना केवल आर्थिक बोझ नहीं, बल्कि मानसिक पीड़ा का भी कारण होता है। मरीज और उसके परिवार दोनों ही एक अनिश्चितता और भय के वातावरण में जीते हैं। ऐसे में यदि मरीज को उसकी वास्तविक आवश्यकता के अनुसार उचित वार्ड में स्थानांतरित किया जाता है, तो यह न केवल खर्च को कम करता है, बल्कि उसे मानसिक राहत भी प्रदान करता है।
वर्ष 2047 तक एक विकसित और सशक्त भारत का सपना देखते हुए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था केवल तकनीकी रूप से उन्नत ही न हो, बल्कि नैतिक और मानवीय दृष्टि से भी समृद्ध हो। चिकित्सा सेवा का मूल स्वरूप करुणा, सेवा और संवेदना पर आधारित होना चाहिए। यदि यह आधार कमजोर हो जाता है, तो सारी आधुनिकता और प्रगति भी अधूरी रह जाती है। अंततः यह कहा जा सकता है कि आईसीयू से जुड़े दिशानिर्देश केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि एक नैतिक पुनर्जागरण का संकेत हैं। यह हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करते हैं कि क्या हम वास्तव में एक ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं, जो मानवता के मूल्यों के अनुरूप हो। यदि इस दिशा में ठोस और ईमानदार प्रयास किए गए, तो निश्चित रूप से यह पहल भारत की स्वास्थ्य प्रणाली को अधिक संवेदनशील, पारदर्शी और न्यायसंगत बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।





