माँ होत सर्वोपरि

mother is supreme

गोवर्द्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’

दुनिया में ऐसा कोई विरला ही होगा जो अपनी जननी को नमन न करता हो। कारण भी स्पष्ट है अर्थात बिना माँ के वह इस इहलोक में पदार्पण कर ही नहीं सकता है।

माँ काली हो, कुरुप हो , दिब्यांग हो या खूबसूरत कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि बिना माँका दूध पिये कोई पुष्टि होता ही नहीं है अर्थात पनपने में माँ का दूध सर्वोत्तम माना गया है। इसलिये ही जब भी सरहद पर अपने पुत्र को भेजती है तो केवल मात्र एक ही सीख देती है –

“एक इंच पीछे मत हटना,भले ही कट जाना पड़े” अर्थात दूध की लाज रखना।

माँ बालक की पहली न केवल गुरु होती है बल्कि पहली दोस्त भी। यही कारण है कि उस बालपन में जो शिक्षा मिलती है वही सबसे उच्च कोटि की शिक्षा मानी गयी है अर्थात माँ हमेशा अपने बच्चे के उज्जवल भविष्य कैसे बने उसी का ध्यान रख शिक्षा प्रारम्भ करती है।और दोस्त होने के नाते हर विपत्ति में उसी तरह साथ खड़ी मिलती है जैसा गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामायण के किष्किन्धाकाण्ड में वर्णन किया है –

जे न मित्र दु:ख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥
निज दु:ख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दु:ख रज मेरु समाना।।

हालाँकि बालपन के बाद बच्चे संगी साथी के साथ माँ की सीख को नज़रअंदाज़ कर गलत रास्ता अपना लेते हैं। फिर आगे चलकर कुख्यात अपराधी भी बन जाते हैं।उसी राह पर चलते एक समय ऐसा भी आता है जब वह किसी भी कारण अपनी माँ की शरण आता है।इसी तथ्य को उजागर करते हुये आदि शंकराचार्य जी ने एक श्लोक के माध्यम से जो सन्देश दिया हुआ है उसका भावार्थ यही है कि “पूत कपूत हो सकता है लेकिन माता कभी कुमाता नहीं हो सकती।”

संक्षेप में संसार में माँ के समान कोई है ही नहीं इस तथ्य को कोई अस्वीकार कर ही नहीं सकता ।