कैमरे के सामने दया, इंसानों के प्रति बेरुख़ी
डॉ. सत्यवान सौरभ
सुबह-सुबह शहरों और कस्बों की गलियों में एक दृश्य अक्सर दिखाई देता है। कोई व्यक्ति बाइक रोकता है, थैले से पाँच रुपये की ब्रेड निकालता है, सड़क किनारे बैठे आवारा कुत्तों की ओर कुछ टुकड़े फेंकता है, फिर मोबाइल कैमरा ऑन करके वीडियो बनाता है। थोड़ी देर बाद वही वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड हो जाता है, कैप्शन लिखा होता है—“जानवरों से प्यार करें, इंसानियत जिंदा रखें।” लोग कमेंट करते हैं—“वाह! आज भी इंसानियत बाकी है।”
सवाल यह है कि क्या सचमुच यही इंसानियत है? क्या पाँच रुपये की ब्रेड और दस रुपये का दूध डाल देना पशु-प्रेम की सबसे बड़ी मिसाल बन गया है? या फिर यह हमारे समय का नया दिखावा है, जहाँ संवेदनाएँ भी कैमरे और लाइक्स के हिसाब से तय होने लगी हैं?
यह सच है कि पशुओं के प्रति दया और करुणा सभ्य समाज की निशानी है। जो समाज जानवरों के प्रति संवेदनशील नहीं होता, वह इंसानों के प्रति भी ज्यादा मानवीय नहीं रह सकता। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब पशु-प्रेम संवेदनशीलता से ज्यादा प्रदर्शन बन जाता है। आज कई लोगों के लिए यह सामाजिक प्रतिष्ठा का नया तरीका बन चुका है। वे आवारा कुत्तों को बिस्किट खिलाते हुए वीडियो डालते हैं, लेकिन उसी सड़क पर बैठा भूखा इंसान उन्हें दिखाई नहीं देता। किसी गरीब बच्चे की फटी चप्पलें उन्हें परेशान नहीं करतीं, लेकिन कुत्ते को दूध पिलाते हुए तस्वीर डालना उन्हें “दयालु” साबित कर देता है।
सोशल मीडिया ने हमारे समाज की भावनाओं को भी बाजार बना दिया है। अब सेवा कम और उसका प्रदर्शन ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। किसी घायल मजदूर को अस्पताल पहुंचाने में कैमरा नहीं चमकता, इसलिए वह काम कम लोग करते हैं। लेकिन किसी कुत्ते को ब्रेड खिलाने का वीडियो वायरल हो सकता है, इसलिए वहाँ संवेदनशीलता अचानक बढ़ जाती है। यह दिखावटी दया धीरे-धीरे समाज को एक अजीब नैतिक भ्रम में धकेल रही है, जहाँ असली समस्याओं से ज्यादा महत्व प्रतीकात्मक कामों को मिलने लगा है।
विडंबना देखिए, जो लोग सड़क पर कुत्तों को खिलाकर खुद को पशु-प्रेमी बताते हैं, वही कई बार अपने घर के बुजुर्ग माता-पिता की दवाइयों की चिंता नहीं करते। पड़ोस में रहने वाले गरीब परिवार की तकलीफ उन्हें नहीं दिखती। किसी बीमार इंसान की मदद के लिए उनके पास समय नहीं होता, लेकिन इंस्टाग्राम रील के लिए उनके पास पूरा समय होता है। यह कैसी करुणा है, जो इंसान से ज्यादा कैमरे के लिए जागती है?
भारत में आवारा कुत्तों की समस्या केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का भी विषय है। हर साल हजारों लोग कुत्तों के काटने का शिकार होते हैं। छोटे बच्चों और बुजुर्गों पर हमले की खबरें लगातार सामने आती हैं। रात में बाइक सवारों का पीछा करते झुंड दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। कई कॉलोनियों में लोग सुबह की सैर तक करने से डरते हैं। लेकिन जब इस समस्या पर चर्चा होती है तो समाज दो हिस्सों में बंट जाता है। एक पक्ष हर कुत्ते को “बेचारा” बताकर सारी जिम्मेदारी जनता पर डाल देता है, जबकि दूसरा पक्ष क्रूरता की भाषा बोलने लगता है। दोनों ही स्थितियाँ गलत हैं।
असल जरूरत संतुलन और जिम्मेदारी की है। केवल ब्रेड डाल देने से समस्या हल नहीं होती। इससे कई बार आवारा कुत्ते एक ही जगह इकट्ठा होने लगते हैं, उनकी संख्या बढ़ती है और आसपास रहने वाले लोगों की परेशानी भी बढ़ती है। यदि सच में पशु-प्रेम है तो नसबंदी, टीकाकरण, शेल्टर होम और जिम्मेदार देखभाल की बात होनी चाहिए। लेकिन यह सब मेहनत और जिम्मेदारी मांगता है। इसलिए आसान रास्ता चुना जाता है—ब्रेड फेंको, फोटो डालो और संवेदनशील कहलाओ।
हमारा समाज आज एक विचित्र दौर से गुजर रहा है। यहाँ इंसान की भूख सामान्य खबर बन चुकी है, लेकिन कुत्ते को बिस्किट खिलाना “इमोशनल कंटेंट” माना जाता है। रेलवे स्टेशन, बस अड्डों और अस्पतालों के बाहर हजारों लोग भूखे बैठे मिल जाएंगे। मजदूरों के बच्चे कूड़े से प्लास्टिक बीनते दिखाई देंगे। गरीब मरीज दवाइयों के बिना तड़पते मिलेंगे। लेकिन उन पर कैमरा कम जाता है, क्योंकि वहाँ केवल फोटो नहीं, जिम्मेदारी उठानी पड़ती है।
यह लेख पशु-प्रेम के खिलाफ नहीं है। जानवरों के प्रति दया जरूरी है, लेकिन अगर समाज की संवेदनशीलता केवल जानवरों तक सीमित होकर इंसानों की पीड़ा से मुंह मोड़ने लगे, तो यह खतरनाक स्थिति है। करुणा का अर्थ संतुलन होता है, दिखावा नहीं। सच्चा पशु-प्रेम वही है जिसमें जिम्मेदारी हो। घायल जानवर का इलाज करवाना, नसबंदी और टीकाकरण अभियान में मदद करना, आसपास के लोगों की सुरक्षा का ध्यान रखना और स्वच्छता बनाए रखना—ये सब वास्तविक संवेदनशीलता के हिस्से हैं। लेकिन आज कई लोग केवल इसलिए कुत्तों को खाना डालते हैं ताकि समाज उन्हें “अच्छा इंसान” समझे।
आधुनिक समाज में नैतिकता भी फैशन बनती जा रही है। जिस तरह कुछ लोग किताबें पढ़ने से ज्यादा किताबों के साथ तस्वीरें डालते हैं, उसी तरह कई लोग सेवा से ज्यादा सेवा का प्रदर्शन करते हैं। दस रुपये का दूध डालकर उन्हें लगता है कि उन्होंने कोई बहुत बड़ा पुण्य कर लिया। लेकिन अगर वास्तव में समाज बदलना है तो प्रतीकात्मक संवेदनाओं से आगे बढ़ना होगा। किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाना, किसी बीमार व्यक्ति की दवा दिलाना, किसी बुजुर्ग का सहारा बनना—ये ऐसे काम हैं जिनके लिए कैमरा नहीं, दिल चाहिए।
सभ्य समाज वही होता है जहाँ इंसान और पशु दोनों सुरक्षित हों। जहाँ न जानवरों पर क्रूरता हो और न इंसानों की सुरक्षा की अनदेखी। लेकिन आज समस्या यह है कि लोग संवेदनशील कम और भावुक ज्यादा हो गए हैं। वे समस्या का समाधान नहीं चाहते, केवल खुद को दयालु साबित करना चाहते हैं। यही कारण है कि पशु-प्रेम भी अब कई जगह सामाजिक प्रदर्शन में बदल गया है।
दस रुपये का दूध और पाँच रुपये की ब्रेड गलत नहीं है। गलत तब होता है जब उसे मानवता का सबसे बड़ा प्रमाण मान लिया जाए। समाज को ऐसे दिखावटी पशु-प्रेम से आगे बढ़ना होगा। इंसानियत केवल कैमरे के सामने दया दिखाने का नाम नहीं है, बल्कि बिना शोर किए किसी की जिंदगी आसान बनाने का नाम है। आखिर में संवेदनशीलता की असली पहचान यह नहीं कि आपने कितने कुत्तों को ब्रेड खिलाई, बल्कि यह है कि आपके कारण कितने इंसान और कितने जीव सुरक्षित, सम्मानित और संतुलित जीवन जी पाए।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)





