तमिलनाडु में “विजय युग” का आगाज़, केरल की सत्ता के “नारियल” से कब निकलेगा मुख्यमंत्री का नाम?

The beginning of the “era of victory” in Tamil Nadu, when will the name of the Chief Minister emerge from the “coconut” of power in Kerala?

  • उत्तरप्रदेश के बाद राजस्थान सहित अन्य राज्यों में भी मंत्रिमंडल की संभावनाएं बढ़ी?
  • प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की देशवासियों से अपील
  • कम से कम एक साल तक सोना नहीं खरीदे और अनावश्यक विदेश यात्राएं भी टाले

एन जी भट्ट

रविवार को देश में कई राजनीतिक संकेत देखने को मिले। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हैदराबाद में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए देशवासियों से पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल संकट की आशंका के बीच राष्ट्रहित में देशवासियों से पेट्रोल-डीजल और गैस का संयमित उपयोग करने, कम से कम एक वर्ष तक सोना नहीं खरीदने और अनावश्यक विदेश यात्राओं से बचने तथा जहां तक संभव हो “वर्क फ्रॉम होम” कार्य पद्धति अपनाने की सलाह दी। इसके साथ ही उन्होंने देश वासियों से खाद्य तेल, दवाइयों और रासायनिक खाद सहित कई क्षेत्रों में किफायत बरतने की अपील भी की हैं।

दक्षिण भारत में ही रविवार को तमिलनाडु में तमिलगा वेट्री कज़गम (टीवीके) के प्रमुख और अभिनेता सी. जोसेफ विजय ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इसके साथ ही तमिलनाडु में द्रविड़ दलों के वर्चस्व को समाप्त कर अब एक नए “विजय युग” का आगाज़ हुआ है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए। जिसकी काफी चर्चा रही।इधर केरल में सभी को अभी भी सत्ता के “नारियल” से कब निकलेगा मुख्यमंत्री का नाम? का इंतजार बना हुआ है। उधर उत्तर पूर्व के अहम राज्य आसाम में जीत की हैट्रिक लगाने वाली भाजपा ने हेमन्त बिस्वा सेरमा को फिर से मुख्यमंत्री बनाना तय किया है। वे 12 मई को शपथ लेंगे।

इसी बीच उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने मंत्रिपरिषद का विस्तार कर उसमें ओबीसी तथा अन्य जातीय सन्तुलन को स्थापित करने का प्रयास किया है। इसके साथ ही राजस्थान सहित अन्य भाजपा शासित प्रदेशों में भी मंत्रिमंडल विस्तार की संभावनाएं बढ़ गई है? राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार पश्चिम बंगाल का किला जीतने के बाद भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आने वाले वर्षों 2027 और 2028 में होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा के अश्वमेध विजयी रथ को आगे बढ़ाने के लिए इसे जरूरी मानता है तभी भाजपा और एनडीए की 22 राज्यों की सरकारों का अन्य प्रदेशों में भी विस्तार हो सजेगा तथा 2029 में होने वाले लोकसभा चुनावों की पटकथा भी तैयार हो सकेगी।

राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा रविवार को दिल्ली दौरा पर रहे। सीएम भजनलाल शर्मा ने पार्टी नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों से मुलाकात की। उन्होंने भाजपा मुख्यालय में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से भी मुलाकात की। साथ ही राष्ट्रीय संगठन मंत्री बीएल संतोष से भी मिले। बताते है उन्होंने प्रदेश में राजनीतिक नियुक्तियां और अन्य संगठनात्मक मुद्दों पर शीर्ष नेतृत्व से चर्चा की। उसके बाद सीएम भजनलाल शर्मा एक के बाद एक कई नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों से भी मिले। वे केंद्रीय मंत्री सीआर पाटिल के आवास पहुंचे। करीब 1 घंटे 10 मिनट तक सीआर पाटील से विभिन्न मुद्दों पर लंबी मंत्रणा हुई। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय मंत्री मनोहरलाल खट्टर से भी मुलाकात की। प्रदेश की विभिन्न परियोजनाओं को लेकर केंद्रीय मंत्री से विस्तृत चर्चा की। इन मैराथन मुलाकातों के बाद सीएम भजनलाल शर्मा दिल्ली से राजस्थान के किशनगढ़ हवाई अड्डा पहुंचे तथा अजमेर जिले के कड़ेल गांव में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा रात्रि चौपाल कर रहे हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का इस बार का दिल्ली दौरा बहुत महत्वपूर्ण है। प्रदेश में आने वाले समय में स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव भी होने है।

तमिलनाडु के नए सीएम विजय थलपति ने चेन्नई के जवाहरलाल नेहरू इंडोर स्टेडियम में शपथ ग्रहण की और स्टेडियम में उपस्थित विशाल जनसमूह को संबोधित किया। शपथ ग्रहण समारोह में राहुल गांधी समेत कई प्रमुख राजनीतिक नेता उपस्थित थे। विजय 1967 के बाद से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले दूसरे ऐसे विधायक बने हैं जिन्होंने राजनीति में पहली बार प्रवेश किया है। दक्षिण भारत की राजनीति इस समय देशभर में चर्चा का विषय बनी हुई है। तमिलनाडु में अभिनेता से राजनेता बने विजय के नेतृत्व में नई राजनीतिक धारा का उदय हुआ है, वहीं पड़ोसी राज्य केरल में चुनाव परिणामों के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर सियासी मंथन अभी तक जारी है। एक ओर तमिलनाडु में “विजय युग” के आगाज़ की चर्चा हो रही है तो दूसरी ओर केरल में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर सत्ता का नारियल किसके सिर फूटेगा और मुख्यमंत्री का नाम कब सामने आएगा।

तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से द्रविड़ दलों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। एम जी रामचंद्रन, एम करुणानिधि, जे जयललिता और बाद में एम के स्टालिन जैसे नेताओं ने राज्य की राजनीति को दिशा दी लेकिन इस बार जनता ने एक नया प्रयोग किया है। विजय ने युवाओं, मध्यम वर्ग, महिलाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं के बीच अपनी अलग पहचान बनाई।

फिल्मी लोकप्रियता को राजनीतिक समर्थन में बदलने की उनकी रणनीति सफल होती दिखाई दी।विजय ने चुनाव प्रचार के दौरान भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा और पारदर्शी शासन को प्रमुख मुद्दा बनाया। उन्होंने खुद को पारंपरिक राजनीति से अलग बताते हुए नई पीढ़ी की आकांक्षाओं का प्रतिनिधि बताया। यही कारण रहा कि चुनाव परिणामों के बाद कई छोटे दलों और सहयोगी पार्टियों ने भी उनका समर्थन किया और वे 121 विधायकों के समर्थन के साथ सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय का उदय केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति में पीढ़ी परिवर्तन का संकेत है। लंबे समय से चली आ रही द्रविड़ राजनीति के बीच अब एक नया चेहरा उभर कर सामने आया है। यह भी माना जा रहा है कि विजय का प्रभाव आने वाले वर्षों में दक्षिण भारत की राजनीति को नई दिशा दे सकता है।हालांकि विजय के सामने चुनौतियां भी कम नहीं होंगी। तमिलनाडु उद्योग, शिक्षा और सामाजिक विकास के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में गिना जाता है। जनता की अपेक्षाएं बहुत अधिक हैं। रोजगार सृजन, निवेश आकर्षित करना, केंद्र और राज्य के संबंधों में संतुलन बनाए रखना तथा क्षेत्रीय अस्मिता को कायम रखना उनकी सरकार की बड़ी परीक्षा होगी।

इधर केरल में स्थिति कुछ अलग दिखाई दे रही है। वहां चुनाव परिणाम आने के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर सस्पेंस बना हुआ है। वाम लोकतांत्रिक मोर्चा और कांग्रेस नेतृत्व दोनों अपने-अपने समीकरण साधने में लगे हुए हैं। केरल की राजनीति हमेशा वैचारिक संघर्ष और गठबंधन की रणनीति के लिए जानी जाती रही है। यहां सत्ता परिवर्तन अक्सर बेहद करीबी मुकाबले के बाद होता है।केरल में मुख्यमंत्री चयन केवल विधायकों की संख्या का मामला नहीं होता, बल्कि जातीय, क्षेत्रीय और संगठनात्मक संतुलन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि परिणाम आने के बाद भी मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा में समय लग रहा है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि पार्टी नेतृत्व अंतिम निर्णय लेने से पहले सभी पक्षों को संतुष्ट करने की कोशिश कर रहा है।

दक्षिण भारत की राजनीति में यह समय बेहद परिवर्तनकारी माना जा रहा है। तमिलनाडु में विजय का उदय जहां नई राजनीति का संकेत दे रहा है, वहीं केरल में मुख्यमंत्री चयन को लेकर जारी मंथन लोकतांत्रिक प्रक्रिया की जटिलताओं को दर्शाता है। दोनों राज्यों की राजनीतिक दिशा आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति पर भी प्रभाव डाल सकती है।

तमिलनाडु में जनता ने बदलाव के नाम पर विजय को अवसर दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि वे अपनी लोकप्रियता को प्रभावी शासन में कितना बदल पाते हैं। दूसरी ओर केरल में सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आखिर सत्ता का “नारियल” किस नेता के नाम फूटेगा और नई सरकार राज्य को किस दिशा में ले जाएगी। दक्षिण भारत की राजनीति का यह नया अध्याय पूरे देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

इधर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के गृह जिले गुजरात में इन दिनों सोमनाथ मंदिर के अमृत महोत्सव की धूम मची हुई है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे एक ऐतिहासिक अवसर बताया है।

सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होना भारतीय सांस्कृतिक चेतना और आस्था के लिए ऐतिहासिक क्षण माना जा रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रेरणा से सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य आरंभ हुआ था। अनेक आक्रमणों और विध्वंस के बावजूद यह मंदिर भारतीय सनातन संस्कृति की अटूट आस्था का प्रतीक बना रहा। 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने मंदिर में ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की थी। आज 75 वर्ष बाद भी सोमनाथ मंदिर राष्ट्र की आध्यात्मिक शक्ति, सांस्कृतिक गौरव और पुनर्जागरण का प्रेरणास्रोत बना हुआ है।