पश्चिम बंगाल में ओबीसी कोटे पर नए फैसले से सुलगती सामाजिक और सियासी बिसात

The new decision on the OBC quota in West Bengal has stirred up social and political tensions

संजय सक्सेना

पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए हालिया बदलाव ने देश के सबसे संवेदनशील और पुराने विवाद को एक बार फिर हवा दे दी है आरक्षण, तुष्टिकरण और सामाजिक न्याय का असल चेहरा। राज्य में सत्ता परिवर्तन के तुरंत बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की कैबिनेट ने जिस तरह से ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) सूची को लेकर कड़ा कदम उठाया है, वह महज एक प्रशासनिक आदेश नहीं बल्कि दशकों से चली आ रही ‘वोटबैंक पॉलिटिक्स’ की बुनियाद पर सीधा प्रहार है। मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया है कि उनकी सरकार ने मई 2024 में आए कलकत्ता हाईकोर्ट के उस ऐतिहासिक आदेश को जमीन पर उतारा है, जिसने राज्य में बिना किसी वैज्ञानिक सर्वे और ठोस डेटा के थोक के भाव बांटे गए ओबीसी प्रमाण पत्रों को असंवैधानिक करार दिया था। नई सरकार का पहला बड़ा राजनीतिक दांव यह रहा कि उसने सुप्रीम कोर्ट में पिछली ममता बनर्जी सरकार द्वारा दायर की गई पुनर्विचार याचिका को आधिकारिक तौर पर वापस ले लिया। इस एक फैसले ने साफ कर दिया कि नई व्यवस्था अब अदालत के रुख के साथ खड़ी है और 2012 के बाद से सामाजिक न्याय के नाम पर बुने गए उस जाल को पूरी तरह ध्वस्त करने जा रही है, जिसे विपक्षी दल ‘मुस्लिम सब-कोटा’ का शॉर्टकट बताते रहे हैं।

इस पूरे विवाद की जड़ें साल 2010 से जुड़ी हैं, जब राज्य की तत्कालीन वामपंथी सरकार और उसके बाद सत्ता में आई तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने राज्य के भीतर एक ऐसा सामाजिक समीकरण तैयार करने की कोशिश की, जो चुनावी राजनीति में अजेय किला बन सके। ममता बनर्जी के कार्यकाल के दौरान पिछड़ा वर्ग सूची में 140 से ज्यादा नई उप-जातियों को जोड़ा गया था, जिनमें से करीब 80 फीसदी जातियां केवल एक विशेष समुदाय से थीं। आंकड़ों की बाजीगरी ऐसी थी कि 2011 की जनगणना के अनुसार बंगाल में रहने वाले करीब ढाई करोड़ मुसलमानों में से दो करोड़ से अधिक लोगों को कागजों पर रातों-रात ‘ओबीसी’ घोषित कर दिया गया। अत्यंत पिछड़ों के लिए बनी ‘ओबीसी-ए’ कैटेगरी में बड़े पैमाने पर मुस्लिम उप-जातियों को जगह मिलने का सीधा नतीजा यह हुआ कि नौकरियों और सरकारी शिक्षा संस्थानों में मिलने वाले कोटे पर एक खास वर्ग का वर्चस्व स्थापित होने लगा। इस पूरी प्रक्रिया ने उन मूल हिंदू पिछड़ी जातियों को हाशिए पर धकेल दिया, जो पीढ़ियों से अपने हक का इंतजार कर रही थीं। माहिष्य, सद्गोप, यादव और कुर्मी जैसी बड़ी पिछड़ी जातियां हों या फिर चुनिया और कलवार जैसे छोटे शिल्पी वर्ग, वे सभी संख्याबल और इस नए मुकाबले में पीछे छूटते चले गए।

कलकत्ता हाईकोर्ट ने जब इस पूरे मामले की परतें खोलीं, तो यह स्पष्ट हो गया कि बिना किसी व्यापक सर्वेक्षण या पिछड़ेपन के वैज्ञानिक मूल्यांकन के पूरी की पूरी आबादी को आरक्षण के दायरे में लाना संविधान के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है। अदालत के इसी फैसले को आधार बनाकर सुवेंदु सरकार ने 2012 के बाद की व्यवस्था को पूरी तरह रद कर 2010 की पुरानी व्यवस्था बहाल कर दी है, जिसके तहत केवल 66 जातियां ही वैध रूप से ओबीसी कोटे की हकदार मानी गई हैं। इस सूची में कपाली, कुर्मी, नाई (नापित), तांती, धानुक, कसाई, खंडैत, तुरहा, पहाड़िया मुस्लिम, देवांगा और हज्जाम जैसी पारंपरिक जातियों को शामिल किया गया है। साथ ही, अनुसूचित जाति से ईसाई धर्म अपनाने वाले व्यक्तियों को भी इस सूची में स्थान मिला है। सरकार का अगला कदम और भी आक्रामक है, जिसके तहत 2011 के बाद से जारी किए गए सभी 1.69 करोड़ जाति प्रमाणपत्रों की व्यापक स्तर पर दोबारा जांच (री-वेरिफिकेशन) के आदेश दिए गए हैं। इसमें विशेष रूप से उन प्रमाण पत्रों को खंगाला जाएगा जो ‘द्वारे सरकार’ जैसे लोक-लुभावन कैंपों के जरिए आनन-फानन में बांटे गए थे।

यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई अन्य सूबों में भी ‘मजहब आधारित आरक्षण’ बनाम ‘संवैधानिक मर्यादा’ की इस बहस को नए सिरे से जिंदा करता है। कर्नाटक में 1990 के दशक में मुस्लिमों के लिए ओबीसी सूची के तहत जो 4 फीसदी का सब-कोटा तय किया गया था, उसे मार्च 2023 में तत्कालीन सरकार ने असंवैधानिक बताते हुए खत्म कर दिया और मामला अब शीर्ष अदालत के विचाराधीन है। केरल में 1952 से ही लगभग पूरी मुस्लिम आबादी को पिछड़ा वर्ग का लाभ मिल रहा है, जहां हिंदू पिछड़ी जातियां लगातार आरोप लगाती रही हैं कि कोटे का बड़ा हिस्सा एक खास संपन्न वर्ग हड़प लेता है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी पूरी आबादी को एकमुश्त आरक्षण देने के प्रयासों को अदालतों ने हमेशा खारिज किया है, जिसके बाद चुनिंदा जातियों को पहचान कर अलग कैटेगरी बनाई गई। इसके विपरीत बिहार जैसे राज्य में मंडल आयोग की सिफारिशों के तहत केवल पेशेवर और सामाजिक रूप से पिछड़ी मुस्लिम जातियों (जैसे अंसारी और कुरैशी) को ही अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) में रखा गया है। यह तुलना दिखाती है कि जब भी राज्य सरकारों ने वैज्ञानिक डेटा को दरकिनार कर केवल राजनीतिक लाभ के लिए एकमुश्त समुदायों को पिछड़ेपन का तमगा दिया, वहां कानूनी और सामाजिक टकराव होना तय था।

संविधान का अनुच्छेद 16(2) स्पष्ट रूप से धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव या आरक्षण को प्रतिबंधित करता है, जबकि अनुच्छेद 15(4) केवल सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को ही आरक्षण का वैध आधार मानता है। 1992 के ऐतिहासिक इंद्रा साहनी मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने यह साफ कर दिया था कि गैर-हिंदू जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग में जोड़ा जा सकता है, लेकिन इसके लिए उनका सामाजिक पिछड़ापन एक वैज्ञानिक पद्धति से सिद्ध होना अनिवार्य है। बंगाल में इसी संवैधानिक मर्यादा को ताक पर रखने का आरोप विपक्ष पर लगता रहा है, जहां मुस्लिम वोटबैंक को साधने के लिए जातियों के आंतरिक ढांचे की अनदेखी की गई।

राजनीति की इस बिसात पर दोनों पक्षों के नियम एक-दूसरे से पूरी तरह उलट हैं। एक तरफ जहां बहुसंख्यक समाज को एकजुट रखने और ‘सनातनी पहचान’ के तहत क्षेत्रीय दलों के जातीय कार्ड को बेअसर करने की रणनीति चलती है, वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम समाज के भीतर की उस परत को खोलने का प्रयास हो रहा है जिसे मुख्यधारा की सेक्युलर राजनीति ने हमेशा छिपाकर रखा यानी ‘अशराफ बनाम पसमांदा’ का भेद। समाज के ऊंचे तबके (सैयद, शेख, पठान) ने हमेशा राजनीतिक और सामाजिक मलाई का आनंद लिया, जबकि जुलाहे, कसाई और बुनकर जैसे गरीब पिछड़े मुस्लिम समाज के हाशिए पर ही रहे। इसके विपरीत, क्षेत्रीय दलों का पूरा वजूद ही इस बात पर टिका है कि बहुसंख्यक समाज अपनी जातियों के छोटे-छोटे ब्लॉकों में बंटा रहे, ताकि ‘जितनी आबादी, उतना हक’ का नैरेटिव सेट किया जा सके। लेकिन जब बात अल्पसंख्यक समाज की आती है, तो यही दल कभी नहीं चाहते कि वह जातियों या अशराफ-पसमांदा के भेद में बंटे। वहां कोशिश यही होती है कि आंतरिक अंतर्विरोधों के बावजूद वे एक ‘धार्मिक पहचान’ के तहत एकमुश्त वोटबैंक बने रहें।

इस्लामी धर्मशास्त्र के मुताबिक सैद्धांतिक तौर पर इस्लाम में ऊंच-नीच या जाति व्यवस्था का कोई स्थान नहीं है, और यही तर्क अक्सर आरक्षण के विरोध या समर्थन में धार्मिक मोड़ ले लेता है। लेकिन समाजशास्त्रियों का मानना है कि दक्षिण एशिया और खासकर भारत में, जिन जातियों का धर्मांतरण हुआ, वे अपनी धार्मिक पहचान बदलने के बाद भी अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति और जातिगत पहचान को नहीं छोड़ पाईं। यही कारण है कि वैचारिक स्तर पर जातियों और फिरकों का विरोध करने वाले धार्मिक गुरु भी आरक्षण के सवाल पर चुप हो जाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि जमीनी स्तर पर मंसूरी या अंसारी की हालत किसी भी रूप में सैयद या शेख जैसी नहीं है। मजहब से बड़ी चुनौती व्यावहारिक पिछड़ापन है। बंगाल का यह नया फैसला देश की भांति-भांति की आरक्षण नीतियों के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है, जो यह तय करेगा कि सामाजिक न्याय का तराजू केवल तुष्टिकरण के पलड़े से हिलेगा या फिर संविधान की कसौटी पर परखा जाएगा।